अक्षय तृतीया पर धणी अनुष्ठान से तय होगा भविष्य का मिजाज, पता लगेगा कि अकाल रहेगा या सुकाल
Mukesh Sharma | Apr 17, 2026, 15:05 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान के जोधपुर में अक्षय तृतीया पर घांची समाज का होने होने वाला धणी अनुष्ठान मारवाड़ की अनूठी सांस्कृतिक विरासत है। अबोध बालकों और प्राचीन मंत्रोच्चार के माध्यम से आने वाले वर्ष के मानसून, फसल की पैदावार और राजनीतिक स्थिरता की भविष्यवाणी की जाती है।
News In Short
- अक्षय तृतीया पर 19 अप्रैल को जोधपुर में 'धणी' परंपरा से तय होगा भविष्य।
- घांची समाज की 890 साल पुरानी है यह परंपरा, लोगों का इस पर विश्वास।
- आयोजन जोधपुर के बाईजी का तालाब स्थित घांची समाज की बगीची में होगा।
- यज्ञ वेदी के पास दो खंभ लगाए जाते हैं, जो देते हैं आगे के लिए संकेत।
News In Short
जोधपुर के घांची समाज की 890 साल पुरानी धणी परंपरा मात्र सामान्य अनुष्ठान नहीं है। इस पर मारवाड़ के जनमानस का अटूट विश्वास है। यह अनुष्ठान सदियों से अकाल-सुकाल और सत्ता के गलियारों में होने वाली हलचल का पूर्वाभास देता आया है।
19 अप्रेल को अक्षय तृतीया के दिन होने वाला यह आयोजन एक बार फिर तय करेगा कि आने वाले साल में बादलों की मेहरबानी कैसी होगी और देश की राजनीति किस करवट बैठेगी।
धणी अनुष्ठान की विधि
बताया जाता है कि मंत्रोचार के साथ दोनों पट्टिकाएं स्वतः ऊपर-नीचे हिलने लगती हैं। खंभ पर बबूल का कांटा लगाया जाता है। यदि कुमकुम लगी पट्टी कांटे को छू ले तो वर्षा और शांति का संकेत माना जाता है। यदि काजल लगी पट्टी कांटे को तोड़े तो विपदाओं, आपदाओं और राजनीतिक संकट की आशंका मानी जाती है। हालांकि समाज के बुजुर्ग संकेतों के आधार पर अनुमान लगाते हैं और भविष्यवाणी करते है।
890 साल का इतिहास
आधुनिक विज्ञान के युग में मारवाड़ के लोग आज भी इस प्राचीन पद्धति पर भरोसा करते हैं और इसे अक्सर सटीक पाते हैं। यह आयोजन जोधपुर के बाईजी का तालाब स्थित घांची समाज की बगीची में किया जाता है। इस वर्ष भी 19 अप्रैल अक्षय तृतीया को यह आयोजन होने जा रहा है। इसमें अगले एक वर्ष के भविष्य की तस्वीर साफ होगी।
अकाल-सुकाल का अनुमान
कुछ साल पहले जब धणी में अकाल का संकेत मिला था। तब न केवल बारिश कम हुई थी बल्कि मारवाड़ के किसानों को टिड्डी दल के हमले का भी सामना करना पड़ा था और फसलों को भारी नुकसान हुआ था।
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