बांसवाड़ा की आशा देवी ने 455 वोटों के अंतर से जीता सरपंच चुनाव, कभी मनरेगा में करती थीं मजदूरी

Jageshwar Prasad | Nov 03, 2026, 18:39 IST
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कभी मनरेगा में मजदूरी करने वाली आशा देवी बनीं मोटा टांडा ग्राम पंचायत की सरपंच।
कभी मनरेगा में मजदूरी करने वाली आशा देवी बनीं मोटा टांडा ग्राम पंचायत की सरपंच।

राजनीति और चुनाव में पैसों या बड़े संसाधनों के वर्चस्व से सभी वाकिफ हैं। लेकिन राजस्थान पंचायत चुनाव में इनको झुठलाती एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो हर किसी को प्रेरित कर रही है। बांसवाड़ा जिले की मोटा टांडा ग्राम पंचायत से नवनिर्वाचित सरपंच आशा देवी की जीत इन दिनों पूरे राज्य में चर्चा का केंद्र बनी हुई है।

कभी अपने परिवार का गुजारा चलाने के लिए मनरेगा में मजदूरी करने और आसपास के गांवों में जाकर दिहाड़ी मजदूरी करने वाली आशा देवी ने आज सरपंच पद के चुनाव में धमाकेदार जीत हासिल कर ली है।

6 प्रत्याशियों को पछाड़कर दर्ज की बड़ी जीत

मोटा टांडा ग्राम पंचायत (Mota Tanda Gram panchayat) में सरपंच पद के लिए कुल छह प्रत्याशियों ने अपनी किस्मत आजमाई थी। मतगणना के बाद जब परिणाम सामने आए, तो आशा देवी को सबसे ज्यादा 652 वोट मिले।

उन्होंने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी डिम्पी (197 वोट) को पीछे छोड़ते हुए कुल 455 मतों के भारी अंतर से यह चुनाव जीत लिया। इस मुकाबले में अन्य प्रत्याशियों की स्थिति इस प्रकार रही- भावना को 63, सुनीता को 45, गंगा राजेंग को 40 और गंगा देवी को 19 वोट मिले।

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राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में एक ऐसा गांव है, जहां आजादी के बाद से अब तक वार्ड पंच चुनने के लिए एक भी वोट नहीं डाला गया। गनोड़ा तहसील की भुवासा ग्राम पंचायत के सज्जन सिंह का गढ़ गांव में लोग हर बार आपसी सहमति से वार्ड पंच चुनते हैं।
राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में एक ऐसा गांव है, जहां आजादी के बाद से अब तक वार्ड पंच चुनने के लिए एक भी वोट नहीं डाला गया। गनोड़ा तहसील की भुवासा ग्राम पंचायत के सज्जन सिंह का गढ़ गांव में लोग हर बार आपसी सहमति से वार्ड पंच चुनते हैं।

कवेलूपोश मकान और सादगी भरी जिंदगी

आशा देवी आज भी कवेलूपोश मकान में रहती हैं। कवेलूपोश मकान का मतलब है मिट्टी की खपरैल वाली छत का घर। उनके पास न मोटरसाइकिल है, न साइकिल और न स्मार्टफोन।

वे साधारण कीपैड मोबाइल का इस्तेमाल करती हैं। कीपैड मोबाइल वह साधारण फोन है जिसमें टच स्क्रीन नहीं होती। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने गांव के लोगों के बीच अपनी जगह बनाई।

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डूंगरपुर जिले में ग्राम पंचायत चुनाव के नतीजों ने कई बड़े नेताओं के सियासी समीकरण बिगाड़ दिए हैं। भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के सांसद राजकुमार रोत को अपनी ही गृह पंचायत खरवरखुनिया में झटका लगा। यहां उनके चाचा सोहनलाल सरपंच का चुनाव हार गए। भगवतीलाल खराड़ी ने उन्हें 15 वोटों से हराया। दूसरी ओर, सागवाड़ा विधायक शंकरलाल डेचा के परिवार ने अपनी राजनीतिक पकड़ बरकरार रखी।
डूंगरपुर जिले में ग्राम पंचायत चुनाव के नतीजों ने कई बड़े नेताओं के सियासी समीकरण बिगाड़ दिए हैं। भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के सांसद राजकुमार रोत को अपनी ही गृह पंचायत खरवरखुनिया में झटका लगा। यहां उनके चाचा सोहनलाल सरपंच का चुनाव हार गए। भगवतीलाल खराड़ी ने उन्हें 15 वोटों से हराया। दूसरी ओर, सागवाड़ा विधायक शंकरलाल डेचा के परिवार ने अपनी राजनीतिक पकड़ बरकरार रखी।

गुड़ से मुंह मीठा, सादगी की चर्चा

सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत और जनसंपर्क के दम पर यह मुकाम हासिल किया है। चुनाव प्रचार के दौरान भी उनका अंदाज बेहद अनोखा रहा, वे लोगों के पास जाकर उन्हें गुड़ खिलाकर अपने पक्ष में वोट की अपील करती थीं।

जनता की उम्मीदों पर खरी उतरने की आस

एक बेहद साधारण और गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली आशा देवी की इस जीत ने यह साबित कर दिया है कि चुनावी मैदान में बड़े संसाधनों से ज्यादा जनता का भरोसा और जुड़ाव मायने रखता है।

ग्रामीणों का मानना है कि चूंकि आशा देवी ने अपने संघर्ष के दिनों में आम और गरीब इंसान की परेशानियों को बहुत करीब से देखा है, इसलिए वे सरपंच बनने के बाद गांव के विकास, मूलभूत सुविधाओं और जनता की जरूरतों पर पूरी संवेदनशीलता के साथ ध्यान देंगी।

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आज पंचायत चुनाव में प्रचार, बैनर, पोस्टर, चुनाव चिह्न और मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें दिखती हैं। लेकिन कभी राजस्थान के गांवों में चुनाव का तरीका कभी इतना सादा हुआ करता था कि प्रत्याशी की जीत का फैसला लोगों के उठे हुए हाथों से हो जाता था। तो कहीं मैदान में बंधी रस्सी के दूसरी तरफ जाकर प्रत्याशी के पक्ष में खड़े हो जाते थे।

मनरेगा से सरपंच तक: जीत के मायने

आशा देवी की जीत इसलिए खास मानी जा रही है। कभी मनरेगा (MGNREGA) में मजदूरी और कभी दिहाड़ी करके उन्होंने परिवार पाला। दिहाड़ी काम वह मजदूरी है, जो रोज के हिसाब से मिलती है। अब वे ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी संभालेंगी।

उनकी जीत बताती है कि जनता का भरोसा बड़े संसाधनों से भी अहम हो सकता है। सरपंच ग्राम पंचायत का निर्वाचित मुखिया होता है। वह गांव के विकास कार्यों और बजट से जुड़े फैसलों में अहम भूमिका निभाता है।

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राजस्थान पंचायत चुनाव में लगभग 4.03 करोड़ मतदाता सक्रिय रूप से भाग लेंगे, जिनके लिए मतपत्रों को तैयार किया जाना आवश्यक है। मतदान दलों को चुनाव चिह्न आवंटन के बाद नाम लिखने में 17 घंटे का समय मिलेगा। जयपुर में 22 पंचायत समितियों के तहत चुनाव कराए जाएंगे, जिसमें कुल 2,094 मतदान केंद्र बनाए गए हैं।
राजस्थान पंचायत चुनाव में लगभग 4.03 करोड़ मतदाता सक्रिय रूप से भाग लेंगे, जिनके लिए मतपत्रों को तैयार किया जाना आवश्यक है। मतदान दलों को चुनाव चिह्न आवंटन के बाद नाम लिखने में 17 घंटे का समय मिलेगा। जयपुर में 22 पंचायत समितियों के तहत चुनाव कराए जाएंगे, जिसमें कुल 2,094 मतदान केंद्र बनाए गए हैं।

बांसवाड़ा और मोटा टांडा का परिचय

बांसवाड़ा जिला राजस्थान के दक्षिणी हिस्से का आदिवासी बहुल इलाका है। टांडा शब्द आमतौर पर बस्ती या डेरे के लिए इस्तेमाल होता है।

FAQs

  1. राजस्थान में मनरेगा वर्कर रहीं आशा देवी ने सरपंच पद के चुनाव में कितने वोट हासिल किए?
    आशा देवी ने सरपंच पद के चुनाव में 652 वोट हासिल किए।
  2. आशा देवी की जीत के क्या मायने हैं?
    आशा देवी की जीत का मतलब है कि साधारण और गरीब परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद जनता का भरोसा और जुड़ाव चुनावी मैदान में बड़े संसाधनों से ज्यादा मायने रखता है।
  3. बांसवाड़ा में मोटा टांडा ग्राम पंचायत में अन्य प्रत्याशियों की स्थिति क्या रही?
    मोटा टांडा ग्राम पंचायत में अन्य प्रत्याशियों की स्थिति कुछ इस प्रकार रही: डिम्पी को 197, भावना को 63, सुनीता को 45, गंगा राजेंग को 40 और गंगा देवी को 19 वोट मिले।
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