हाईकोर्ट की कलक्टर-एसपी को फटकार, क्या अदालत को समझ रखा है पोस्ट ऑफिस?

Mukesh Sharma | Mar 06, 2026, 19:56 IST
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court payroll
Photograph: (the sootr)

राजस्थान हाई कोर्ट ने एक हैड कांस्टेबल की रिपोर्ट पर पैरोल खारिज करने पर भरतपुर के कलेक्टर और एसपी को फटकार लगाई है। कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि क्या आप लोगों ने अदालत को पोस्ट ऑफिस समझ रखा है।

News In Short

  • कैदियों की पैरोल याचिका बगैर ठोस आधार पर खारिज करने पर हाई कोर्ट सख्त।
  • कोर्ट ने भरतपुर कलक्टर और एसपी को फटकार लगाते हुए किया तलब।
  • खंडपीठ ने कहा, आप लोगों ने क्या कोर्ट को पोस्ट ऑफिस समझ रखा है!
  • हैड कांस्टेबल की रिपोर्ट के आधार पर खारिज कर दी थी ओपन जेल के कैदी की पैरोल।
  • कोर्ट ने अधिकारियों से कहा कि आप अपना माइंड अप्लाई क्यों नहीं करते।

News In Detail

Jaipur: राजस्थान हाई कोर्ट ने कैदियों की पैरोल याचिकाएं बिना किसी ठोस आधार के खारिज करने के रवैये पर सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस महेंद्र गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने भरतपुर कलक्टर और एसपी को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में तलब करते हुए तीखी टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, आप लोगों ने कोर्ट को पोस्ट ऑफिस समझ रखा है! बिना दिमाग लगाए पैरोल खारिज कर देते हैं, जिससे अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। हम जरूरी मामलों की सुनवाई नहीं कर पाते।

​12 साल से सजा काट रहे कैदी की पैरोल का

यह पूरा विवाद भरतपुर सेंट्रल जेल में बंद कैदी अनिल कपूर उर्फ रिंकू की याचिका से जुड़ा है। रिंकू 12 साल से जेल में है। पिछले 4 साल से अच्छे आचरण के कारण उसे ओपन जेल में रखा गया है। नियमों के अनुसार ओपन जेल के कैदियों को पैरोल मिलने में सामान्यतः बाधा नहीं आती, लेकिन भरतपुर प्रशासन ने उसकी अर्जी खारिज कर दी थी।

​पुलिस की 'कॉपी-पेस्ट' रिपोर्ट पर नाराजगी

​सुनवाई के दौरान कोर्ट उस वक्त बिफर पड़ा, जब पैरोल खारिज करने का आधार ​हेड कांस्टेबल की रिपोर्ट को मान लिया। एसपी ने एक हेड कांस्टेबल स्तर के कर्मचारी की रिपोर्ट को आधार बनाकर लिख दिया कि कैदी फरार हो सकता है।
रिपोर्ट में टिप्पणी की गई कि कैदी अपने बीमार माता-पिता से मिलने के लिए पैरोल मांग रहा है, जबकि उसके पिता स्वस्थ हैं, अन्य तीन भाई उनकी देखभाल के लिए मौजूद हैं। बेंच ने कहा, अगर आप किसी के फरार होने की आशंका जता रहे हैं तो उसके ठोस तथ्य पेश करें। क्या एक हेड कांस्टेबल की रिपोर्ट आपके लिए अंतिम सत्य है? आप अपना 'माइंड अप्लाई' क्यों नहीं करते?

​सिफारिश के बावजूद क्यों हुई अनदेखी

कैदी के अधिवक्ता गोविंद प्रसाद रावत ने दलील दी कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग राजस्थान के संयुक्त निदेशक ने पैरोल की सकारात्मक सिफारिश की थी। कैदी का रिकॉर्ड भी बेदाग था। इसके बावजूद एसपी की गलत टिप्पणी के आधार पर कलक्टर की अध्यक्षता वाली जिला पैरोल कमेटी ने आवेदन निरस्त कर दिया। अदालत की सख्ती के बाद कलक्टर ने आनन-फानन में जानकारी दी कि कैदी की 20 दिन की पैरोल अब मंजूर कर ली गई है।

​एसीएस होम और डीजीपी को कड़ा संदेश

अदालत ने कहा कि उन्होंने कई बार अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह और डीजीपी को इस प्रक्रिया में सुधार के निर्देश दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं दिख रहा। कोर्ट ने कहा कि

अधिकारी अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाते, इसीलिए कैदियों को छोटी-छोटी राहत के लिए हाईकोर्ट आना पड़ता है। इससे न्यायपालिका का कीमती समय बर्बाद होता है।

सुनवाई में एसीएस होम और डीजीपी विधानसभा सत्र के कारण पेश नहीं हो सके। इसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। हालांकि, उन्हें 16 मार्च को अगली सुनवाई पर उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही रोकने के लिए क्या सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे।

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