वन्यजीव बोर्ड का बड़ा फैसला, वन क्षेत्रों में चरागाहों के लिए होगा देशव्यापी अध्ययन
Jinesh Jain | Apr 21, 2026, 19:19 IST
Photograph: (the sootr)
राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने बड़ा फैसला लिया है। संरक्षित वन क्षेत्र में चराई की इजाजत देने के लिए देशव्यापी अध्ययन करने का निर्णय लिया है। कड़े नियमों के कारण पशुपालकों को अक्सर अपने पशुओं को चराने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
News In Short
- संरक्षित वन क्षेत्रों के भीतर चरागाह बनाने को लेकर होगा अध्ययन।
- राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति का बड़ा फैसला।
- अभी नियमों में पशुओं के वन क्षेत्रों में चराई पर है प्रतिबंध।
- अभी राजस्थान, एमपी, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और यूपी पर फोकस।
- अध्ययन में यह भी देखेंगे कि चराई से वनों पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा।
News In Detail
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) को निर्देश दिया गया है कि वह इन समुदायों की संरक्षित क्षेत्रों पर निर्भरता को लेकर एक व्यापक और विस्तृत अध्ययन करे। यह कदम न केवल लाखों पशुपालकों की आजीविका को सुरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पारिस्थितिक संतुलन के नए आयाम भी खोल सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन?
ये समुदाय पारंपरिक रूप से अपनी आजीविका के लिए घास के मैदानों, झाड़ियों और पठारों पर निर्भर रहते हैं। हालांकि, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के कड़े नियमों के कारण इन्हें अक्सर अपने पशुओं को चराने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
अध्ययन के मुख्य बिंदु:
छह राज्यों पर रहेगा विशेष फोकस
डब्ल्यूआईआई को निर्देश दिया गया है कि वह जल्द ही एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट प्रस्तुत करे, जिसके लिए राष्ट्रीय कैम्पा कोष से वित्त पोषण की मांग की जाएगी।
प्रशासनिक जटिलता और मौसमी प्रवास
राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने माना है कि विभिन्न प्रशासनिक अधिकार क्षेत्रों के कारण संसाधनों के उपयोग और चराई के अधिकारों तक पहुंच बनाने में समुदायों को व्यावहारिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। समिति ने एक्सेस अरेंजमेंट्स के संस्थागतकरण की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसका अर्थ है कि एक ऐसा सिस्टम बनाया जाए जिससे पशुपालकों को भटकना न पड़े और वन प्रबंधन के साथ उनका समन्वय बना रहे।
चराई: संकट या समाधान?
हालांकि, समिति ने एक गंभीर चिंता भी जताई है। उपलब्ध चरागाहों की कमी और शेष भूमि पर पशुओं के अत्यधिक जमाव के कारण गंभीर गिरावट देखी जा रही है। यह प्रवृत्ति न केवल पशुपालकों के लिए बल्कि वन्यजीवों के लिए भी संसाधनों का संकट पैदा कर रही है।
रेंजलैंड्स का वैश्विक संकट
ये क्षेत्र न केवल डेयरी, मांस, ऊन और चमड़ा उद्योग के लिए रीढ़ की हड्डी हैं, बल्कि भारत की पशुधन अर्थव्यवस्था में इनका योगदान अतुलनीय है।
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