जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026: सोमाया ने कहा - मेरे लिए कराची भाई-बहन जैसा

Ashish Bhardwaj | Jan 19, 2026, 17:22 IST
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Photograph: (the sootr)

राजस्थान में आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के सत्र ‘विभाजन की कथाएं’ 1947 के बंटवारे को समझा गया। इस सत्र में वक्ता लेखिका भावना सोमाया और फिल्म पत्रकार किश्वेर देसाई ने अपनी स्मृतियों, दर्द और उम्मीद की कहानियां साझा कीं।

News In Short

  • जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के ‘विभाजन की कथाएं’ सत्र में 1947 के बंटवारे को मानवीय नजर से समझा गया।
  • मॉडरेटर ताबिना अंजूम ने कहा कि विभाजन आज भी स्मृतियों और परिवारों की कहानियों में जीवित है।
  • किश्वेर देसाई ने लाहौर से भारत आए अपने माता-पिता के दर्दनाक अनुभव साझा किए।
  • भावना सोमाया ने कराची से जुड़े पारिवारिक रिश्तों और भावनात्मक स्मृतियों का जिक्र किया।
  • सत्र में महिलाओं की पीड़ा और युवाओं के लिए उम्मीद का संदेश प्रमुख रहा।

News In Detail

राजस्थान के जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में आयोजित 'विभाजन की कथाएं 1947' सत्र में इतिहास से जुडी यादों को मानवीय दृष्टि से समझने का प्रयास किया गया। इसमें श्रोताओं ने विभाजन के दर्द को करीब से महसूस किया। सत्र का संचालन ताबिना अंजूम ने किया। वक्ताओं में लेखिका और फिल्म पत्रकार किश्वेर देसाई और भावना सोमाया शामिल रहीं।

सोमाया का कराची से रिश्ता

लेखिका और फिल्म पत्रकार भावना सोमाया ने कहा कि उनका जन्म विभाजन के बाद हुआ था। इसके बावजूद कराची उनके लिए एक शहर नहीं, बल्कि एक बिछड़ा हुआ रिश्तेदार है। उनके माता-पिता कराची से भारत आए थे। घर में कराची की बातें हमेशा होती थीं। इसलिए आज भी कराची भाई-बहन जैसा लगता है।

जब स्मृतियां लिखना जरुरी

सोमाया ने बताया कि जब परिवार के बड़े सदस्य एक-एक कर दुनिया से जाने लगे, तब उन्हें लगा कि इन कहानियों को लिखना जरूरी है। अगर उन्होंने नहीं लिखा, तो शायद कोई नहीं लिखेगा। किताब लिखते समय कई बार वह भावुक हो गईं। यह अनुभव उनके लिए बेहद कठिन रहा।

कराची के घर की यादें और भावुक क्षण

उन्होंने अपने ननिहाल के कराची स्थित घर का वर्णन पढ़ा। उसमें उस समय की जीवनशैली, कला, सुगंध और रिश्तों की गर्माहट झलकती थी।इस अंश को सुनकर श्रोता भावुक हो उठे। पूरा सभागार खामोशी में डूब गया। देसाई और सोमाया ने कहा कि विभाजन के इतिहास में महिलाओं की पीड़ा लंबे समय तक अनकही रही। महिलाओं ने अत्याचार झेले, लेकिन परिवार को संभालती रहीं। पार्टिशन म्यूजियम में महिलाओं की कहानियों के लिए अलग खंड बनाए गए हैं। यहां उनके संघर्ष और साहस को दर्ज किया गया है।

युवा पीढ़ी के लिए क्या संदेश है

वक्ताओं ने कहा कि ये कहानियां आज के युवाओं को सहानुभूति और धैर्य सिखाती हैं। जिन्होंने सब कुछ खोकर भी जीवन दोबारा खड़ा किया, वे प्रेरणा बनते हैं। विभाजन का दर्द कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता। लेकिन स्मृतियों को सहेजकर आगे बढ़ा जा सकता है।

किश्वेर देसाई की यादें

लेखिका किश्वेर देसाई ने अपने माता-पिता के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उनके माता-पिता लाहौर के रहने वाले थे। 1947 से पहले लाहौर एक शांत और सांस्कृतिक शहर था। हिंदू और मुस्लिम समुदाय साथ मिलकर रहते थे। उनकी मां उस समय केवल 13 साल की थीं। अचानक बदले हालात में परिवार को रातों-रात सब कुछ छोड़कर भारत आना पड़ा। उनके पिता जीवन के अंतिम दिनों तक आंखें बंद करते ही खुद को अनारकली बाजार में घूमते हुए महसूस करते थे। यह स्मृति उनके मन में गहराई से बसी रही।

पार्टिशन म्यूजियम की नींव कैसे पड़ी

देसाई ने कहा कि 2017 में स्वतंत्रता और विभाजन की 70वीं वर्षगांठ पर उन्हें एक कमी महसूस हुई। देश में ऐसा कोई स्थान नहीं था, जहां विभाजन की स्मृतियों को संजोया गया हो। इसी सोच से पार्टिशन म्यूजियम की नींव पड़ी। यह संग्रहालय पूरी तरह लोगों के सहयोग से बना है।

स्मृतियों का संग्रह और उम्मीद की गैलरी

म्यूजियम में शरणार्थियों की वस्तुएं, मौखिक इतिहास और व्यक्तिगत कहानियां संग्रहित हैं। अमृतसर और दिल्ली में बने इन संग्रहालयों का अंतिम कक्ष ‘गैलरी ऑफ होप’ है। यह कक्ष संदेश देता है कि ऐसा विभाजन दोबारा कभी नहीं होना चाहिए। यह उम्मीद और भविष्य की ओर देखने की प्रेरणा देता है।

विभाजन नहीं है सिर्फ तारीख

ताबिना अंजूम ने कहा कि विभाजन केवल सीमाओं और आंकड़ों का इतिहास नहीं है। यह आज भी लोगों की यादों, परिवारों की कहानियों और खामोशी में जीवित है। उन्होंने कहा कि विभाजन की पीड़ा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। यही कारण है कि इन कहानियों को दर्ज करना जरूरी है।

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