राजस्थान में खाद-बीज के 2,220 सैंपल फेल, किसानों को मुआवजे का प्रावधान नहीं, अब जांच में मिलीभगत रोकने की तैयारी
Raghvendra Singh Rathore | Oct 23, 2026, 21:16 IST
राजस्थान में खाद-बीज के 2,220 सैंपल फेल, अब फेसलेस जांच; किसानों के मुआवजे पर सवाल
राजस्थान में बीज, खाद और कीटनाशकों की गुणवत्ता जांच की व्यवस्था बदलेगी। कृषि विभाग ने डाक विभाग से तीन साल का समझौता किया है। अब इंस्पेक्टर अपनी पसंद की लैब में सैंपल नहीं भेज सकेंगे। नई व्यवस्था से पुरानी जांच प्रक्रिया की खामियों और किसानों को होने वाले नुकसान पर सवाल उठ रहे हैं।
राजस्थान में किसानों को मिलने वाले बीज, खाद और कीटनाशकों की गुणवत्ता पर बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। प्रदेश में 2023-24 से जनवरी 2026 तक कृषि आदानों के 2,220 नमूने जांच में अमानक पाए गए। यानी ये नमूने तय गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे।
इसके बावजूद खराब बीज, खाद या कीटनाशक के कारण फसल को नुकसान होने पर किसानों को एसडीआरएफ या संबंधित कंपनियों के माध्यम से मुआवजा देने का प्रावधान नहीं होने की बात सरकार विधानसभा में बता चुकी है।
अब राज्य सरकार ने कृषि आदानों की जांच व्यवस्था बदलने का फैसला किया है। शुक्रवार, 23 अक्टूबर को जयपुर के पंत कृषि भवन में कृषि विभाग और भारतीय डाक विभाग के बीच तीन साल का समझौता हुआ। नई व्यवस्था में नमूना लेने वाले इंस्पेक्टर को पता नहीं होगा कि उसकी जांच किस लैब में होगी। वहीं, लैब को भी संबंधित डीलर या निर्माता की पहचान नहीं बताई जाएगी।
मार्च 2026 में विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 से जनवरी 2026 तक राजस्थान में बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के कुल 2,220 नमूने अमानक मिले। इन मामलों में 466 प्रकरणों में अदालत में वाद दायर किए गए, जबकि 117 एफआईआर दर्ज होने की जानकारी दी गई।
ये आंकड़े बताते हैं कि बाजार में तय मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले कृषि उत्पादों की समस्या मौजूद है। इसलिए केवल 2,220 नमूनों के आधार पर प्रदेश में बिकने वाले सभी कृषि उत्पादों की गुणवत्ता का आकलन नहीं किया जा सकता।
किसान बीज, खाद और कीटनाशक खरीदने के लिए अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च करता है। यदि बीज ठीक नहीं निकले या कीटनाशक तय गुणवत्ता का नहीं हो, तो फसल प्रभावित होने का खतरा रहता है।
कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने विधानसभा में बताया था कि अमानक कृषि आदानों के कारण नुकसान पर एसडीआरएफ या संबंधित कंपनी के माध्यम से किसानों को क्षतिपूर्ति देने का मौजूदा प्रावधान नहीं है। ऐसे में किसानों के सामने बड़ा सवाल है कि यदि घटिया कृषि उत्पाद के कारण उनकी फसल खराब हो जाए, तो नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
नई जांच व्यवस्था से घटिया उत्पादों की पहचान बेहतर हो सकती है, लेकिन किसानों को मुआवजा दिलाने के लिए अलग कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत पड़ सकती है।
नई व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव प्रयोगशालाओं के आवंटन में होगा। अब कृषि आदान निरीक्षक नमूना तो लेंगे, लेकिन यह तय नहीं कर सकेंगे कि उसे किस प्रयोगशाला में भेजा जाए। AgriQMS प्रणाली अधिकृत प्रयोगशालाओं में से किसी एक का चयन सिस्टम के जरिए करेगी।
वहीं, लैब को जांच के लिए भेजे गए नमूने से संबंधित डीलर या निर्माता की पहचान नहीं बताई जाएगी। सरकार का दावा है कि इससे किसी खास नमूने की जांच प्रभावित करने और व्यक्तिगत हस्तक्षेप की संभावनाएं कम होंगी।
कृषि विभाग ने अपने प्रेस नोट में बताया है कि अब तक नमूनों के संग्रहण, पैकिंग, परिवहन, लैब आवंटन और जांच परिणाम तैयार करने के दौरान कई स्तरों पर मानवीय हस्तक्षेप की संभावना रहती थी। इसी वजह से अब पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाने की तैयारी है।
नई व्यवस्था में सैंपल की पहचान के लिए QR कोड बनेगा। नमूना लेते समय जीपीएस लोकेशन और उत्पाद की तस्वीरें भी दर्ज की जाएंगी। नमूनों को ऐसी पैकिंग में रखा जाएगा, जिससे छेड़छाड़ होने पर उसका पता लगाया जा सके। इससे सैंपल बदलने या जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की संभावनाएं कम करने में मदद मिल सकती है।
नई व्यवस्था में भारतीय डाक विभाग की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। कृषि विभाग के अनुसार, प्रदेशभर से लिए गए नमूनों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत जयपुर भेजा जाएगा। यहां नमूनों की पहचान छिपाने की व्यवस्था होगी।
इसके बाद डाक विभाग स्पीड पोस्ट और बिजनेस पोस्ट सेंटर सेवाओं के जरिए नमूने अधिकृत प्रयोगशालाओं तक पहुंचाएगा। नमूनों की ट्रैकिंग भी की जा सकेगी। लेकिन इस व्यवस्था में एक सवाल जांच रिपोर्ट मिलने की समयसीमा का भी है।
केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय और डाक विभाग ने 7 जनवरी 2026 को कृषि आदानों के नमूनों के परिवहन के लिए समझौता किया था। इसके बाद राजस्थान सरकार ने 23 अक्टूबर को राज्य स्तर पर कृषि विभाग और डाक विभाग के बीच समझौता किया।
दोनों समझौतों के बीच करीब साढ़े नौ महीने का अंतर है। अब यह जांच का विषय है कि राजस्थान में नई व्यवस्था लागू करने के लिए कितना समय लगा और इस दौरान किन तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा किया गया।
कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने नई व्यवस्था को लेकर कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल कृषि आदानों के नमूनों की जांच करना नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें किसी भी स्तर पर अनुचित हस्तक्षेप की गुंजाइश कम से कम हो।
उन्होंने कहा कि तकनीक के माध्यम से जांच को निष्पक्ष बनाना और किसानों के हितों की सुरक्षा करना सरकार की प्राथमिकता है। कृषि आयुक्त नरेश कुमार गोयल ने कहा कि बीज, खाद और कीटनाशकों की गुणवत्ता का सीधा संबंध किसानों की लागत, फसल उत्पादन और आय से है। इसलिए गुणवत्ता जांच का विश्वसनीय होना जरूरी है।
राजस्थान सरकार की नई व्यवस्था से बीज, खाद और कीटनाशकों की जांच अधिक पारदर्शी होने की उम्मीद है। लेकिन किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात केवल नमूने की जांच नहीं, बल्कि अमानक उत्पाद मिलने पर समय पर कार्रवाई होना है।
यदि जांच रिपोर्ट आने से पहले ही खराब बीज या खाद किसानों तक पहुंच जाता है, तो नुकसान रोकना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में नई व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नमूनों की जांच कितनी जल्दी होती है, अमानक उत्पादों की बिक्री कितनी तेजी से रोकी जाती है और प्रभावित किसानों को राहत कैसे मिलती है।
इसके बावजूद खराब बीज, खाद या कीटनाशक के कारण फसल को नुकसान होने पर किसानों को एसडीआरएफ या संबंधित कंपनियों के माध्यम से मुआवजा देने का प्रावधान नहीं होने की बात सरकार विधानसभा में बता चुकी है।
अब राज्य सरकार ने कृषि आदानों की जांच व्यवस्था बदलने का फैसला किया है। शुक्रवार, 23 अक्टूबर को जयपुर के पंत कृषि भवन में कृषि विभाग और भारतीय डाक विभाग के बीच तीन साल का समझौता हुआ। नई व्यवस्था में नमूना लेने वाले इंस्पेक्टर को पता नहीं होगा कि उसकी जांच किस लैब में होगी। वहीं, लैब को भी संबंधित डीलर या निर्माता की पहचान नहीं बताई जाएगी।
तीन साल में 2,220 सैंपल फेल, 117 एफआईआर
ये आंकड़े बताते हैं कि बाजार में तय मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले कृषि उत्पादों की समस्या मौजूद है। इसलिए केवल 2,220 नमूनों के आधार पर प्रदेश में बिकने वाले सभी कृषि उत्पादों की गुणवत्ता का आकलन नहीं किया जा सकता।
खराब बीज से फसल बर्बाद हुई तो किसान को मुआवजा कैसे मिलेगा?
कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने विधानसभा में बताया था कि अमानक कृषि आदानों के कारण नुकसान पर एसडीआरएफ या संबंधित कंपनी के माध्यम से किसानों को क्षतिपूर्ति देने का मौजूदा प्रावधान नहीं है। ऐसे में किसानों के सामने बड़ा सवाल है कि यदि घटिया कृषि उत्पाद के कारण उनकी फसल खराब हो जाए, तो नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
नई जांच व्यवस्था से घटिया उत्पादों की पहचान बेहतर हो सकती है, लेकिन किसानों को मुआवजा दिलाने के लिए अलग कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत पड़ सकती है।
अब इंस्पेक्टर अपनी पसंद की लैब में नहीं भेज सकेंगे सैंपल
वहीं, लैब को जांच के लिए भेजे गए नमूने से संबंधित डीलर या निर्माता की पहचान नहीं बताई जाएगी। सरकार का दावा है कि इससे किसी खास नमूने की जांच प्रभावित करने और व्यक्तिगत हस्तक्षेप की संभावनाएं कम होंगी।
पहले जांच प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश
नई व्यवस्था में सैंपल की पहचान के लिए QR कोड बनेगा। नमूना लेते समय जीपीएस लोकेशन और उत्पाद की तस्वीरें भी दर्ज की जाएंगी। नमूनों को ऐसी पैकिंग में रखा जाएगा, जिससे छेड़छाड़ होने पर उसका पता लगाया जा सके। इससे सैंपल बदलने या जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की संभावनाएं कम करने में मदद मिल सकती है।
सैंपल पहले जयपुर आएंगे, फिर जांच लैब जाएंगे
इसके बाद डाक विभाग स्पीड पोस्ट और बिजनेस पोस्ट सेंटर सेवाओं के जरिए नमूने अधिकृत प्रयोगशालाओं तक पहुंचाएगा। नमूनों की ट्रैकिंग भी की जा सकेगी। लेकिन इस व्यवस्था में एक सवाल जांच रिपोर्ट मिलने की समयसीमा का भी है।
केंद्र ने जनवरी में किया था समझौता, राजस्थान ने अक्टूबर में अपनाई व्यवस्था
दोनों समझौतों के बीच करीब साढ़े नौ महीने का अंतर है। अब यह जांच का विषय है कि राजस्थान में नई व्यवस्था लागू करने के लिए कितना समय लगा और इस दौरान किन तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा किया गया।
कृषि मंत्री बोले- जांच में अनुचित हस्तक्षेप की गुंजाइश कम होगी
उन्होंने कहा कि तकनीक के माध्यम से जांच को निष्पक्ष बनाना और किसानों के हितों की सुरक्षा करना सरकार की प्राथमिकता है। कृषि आयुक्त नरेश कुमार गोयल ने कहा कि बीज, खाद और कीटनाशकों की गुणवत्ता का सीधा संबंध किसानों की लागत, फसल उत्पादन और आय से है। इसलिए गुणवत्ता जांच का विश्वसनीय होना जरूरी है।
किसानों को फायदा तभी, जब अमानक उत्पादों पर कार्रवाई हो
यदि जांच रिपोर्ट आने से पहले ही खराब बीज या खाद किसानों तक पहुंच जाता है, तो नुकसान रोकना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में नई व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नमूनों की जांच कितनी जल्दी होती है, अमानक उत्पादों की बिक्री कितनी तेजी से रोकी जाती है और प्रभावित किसानों को राहत कैसे मिलती है।
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