कागजों में करोड़ों का खेल, धरातल पर तबेला; राजस्थान में जर्जर स्कूलों की सच्चाई
Mukesh Sharma | Aug 23, 2026, 10:31 IST
12,500 करोड़ का रोडमैप, जर्जर स्कूलों की हकीकत बदहाल, बच्चे बाड़े में पढ़ रहे
राजस्थान सरकार ने जर्जर स्कूलों के कायाकल्प के लिए 5 साल में ₹12,500 करोड़ खर्च करने का मास्टर प्लान तैयार किया । हालांकि, बगरू स्थित स्कूल का बच्चों को तबेले में पढ़ाने का मामला सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के अंतर को उजागर करता है।
राजस्थान में सरकारी स्कूलों के जर्जर इमारतों को ठीक करने के लिए सरकार ने अगले पांच साल में 12500 करोड़ रुपए खर्च करने का वित्तीय रोडमैप तैयार किया। सरकार के मुताबिक हर साल 2500 करोड़ रुपए स्कूलों की मरम्मत, निर्माण और बुनियादी सुविधाओं पर खर्च किए जाएंगे।
लेकिन जमीनी तस्वीर इससे अलग है। जयपुर के बगरू विधानसभा के रामपुरा-कंवरपुरा गांव में जर्जर स्कूल की इमारत को खाली कराकर बच्चों को फिलहाल पास ही जानवरों के बाड़े में पढ़ाया जा रहा।
जहां बच्चे पढ़ते हैं, वहीं चारा भी रखा जाता। ऐसे में सवाल उठता है कि करोड़ों रुपए की योजनाओं के बीच बच्चों को सुरक्षित स्कूल भवन कब तक तैयार होंगे?
राजस्थान सरकार ने यह जानकारी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के सवाल के जवाब में दी। इसके मुताबिक अगले पांच साल में हर साल 2500 करोड़ रुपए जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत और नए निर्माण पर खर्च किए जाएंगे।
यह रोडमैप हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद तैयार किया गया। इसका मकसद जर्जर स्कूल भवनों को ठीक करना और स्कूलों में जरूरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना है।
राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट में भी 550 करोड़ रुपए मरम्मत और जीर्णोद्धार के लिए तथा 450 करोड़ रुपए भवन विहीन और जर्जर स्कूलों के लिए मंजूर किए हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही संस्था अभ्युथानम के प्रांजल सिंह का सवाल है कि असली चुनौती पैसा जुटाना नहीं, बल्कि काम जमीन पर शुरू करना है। उनका कहना है कि झालावाड़ की घटना को एक साल हो चुका और हाईकोर्ट भी करीब एक साल से इस मामले की सुनवाई कर रहा है।
सरकार बड़े स्तर पर स्कूलों के कायाकल्प की योजना बता रही है, लेकिन जयपुर के आसपास के स्कूलों में अभी भी जर्जर भवन और अस्थायी व्यवस्था की तस्वीर सामने आ रही है।
रामपुरा-कंवरपुरा इसका उदाहरण है। यहां स्कूल की इमारत जर्जर होने के कारण बच्चों को दूसरे स्थान पर पढ़ाया जा रहा था।
द सूत्र की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि बच्चे जानवरों के बाड़े जैसी जगह में पढ़ने को मजबूर थे। वहां टीनशेड के नीचे बच्चों की क्लास चल रही थीं। आसपास चारा रखा हुआ था। शिक्षक बच्चों को पढ़ा रहे थे, लेकिन जगह सामान्य स्कूल जैसी नहीं थी।
सीजेपी कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के बीच विवाद के बाद प्रशासन ने अगले ही दिन स्कूल को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया। इससे पहले बच्चे इसी अस्थायी व्यवस्था में पढ़ रहे थे।
यही तस्वीर सरकार के बड़े वित्तीय रोडमैप पर सवाल खड़ा करती है- जब बजट और योजनाएं मौजूद हैं तो जमीनी स्तर पर स्कूलों का काम अब तक क्यों नहीं पूरा हुआ?
सरकार ने पांच साल में 12500 करोड़ रुपए जुटाने के लिए अलग-अलग वित्तीय स्रोत तय किए हैं।
समग्र शिक्षा: हर साल करीब 500 करोड़ रुपए और पांच साल में 2,500 करोड़ रुपए। इसके लिए पीएबी की बैठकों में हर साल प्रस्ताव भेजे जाएंगे।
नाबार्ड, विश्व बैंक और एडीबी: हर साल 500 करोड़ रुपए और पांच साल में 2,500 करोड़ रुपए ऋण के जरिए खर्च किए जाएंगे।
ग्रामीण विकास विभाग: वीबी-जी-राम-जी योजना के तहत स्कूल निर्माण और मरम्मत पर हर साल 400 करोड़ और पांच साल में 2,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
राज्य बजट: राज्य सरकार हर साल 300 करोड़ और पांच साल में 1,500 करोड़ रुपए देगी।
DMFT: जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट के जरिए हर साल 200 करोड़ और पांच साल में 1,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
सांसद और विधायक निधि: हर साल 200 करोड़ और पांच साल में 1,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
आपदा राहत कोष: हर साल 150 करोड़ और पांच साल में 750 करोड़ रुपए जुटाए जाएंगे।
CSR और जनसहभागिता: सार्वजनिक और निजी उपक्रमों तथा भामाशाहों के सहयोग से हर साल 150 करोड़ और पांच साल में 750 करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य है।
क्षेत्रीय योजनाएं: डांग, मगरा, मेवात, TAD जैसी योजनाओं से हर साल 100 करोड़ और पांच साल में 500 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
UDISE 2025-26 और विधानसभा के अतारांकित सवाल संख्या 900 के जवाब के मुताबिक राजस्थान में अभी भी बड़ी संख्या में स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।
प्रदेश में 611 स्कूल ऐसे हैं जिनके पास अपना भवन नहीं है। इनमें 10 बालिका स्कूल भी शामिल हैं। हालांकि माध्यमिक शिक्षा स्तर का कोई स्कूल बिना बिल्डिंग नहीं है। इसी तरह अपने भवन वाले कुल 64,484 सरकारी स्कूलों में 2,047 स्कूलों में शौचालय की सुविधा नहीं है।
राज्य के सरकारी स्कूलों में भी पीने के साफ पानी की स्थिति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। प्रदेश के 1049 स्कूलों में पेयजल की सुविधा नहीं है।
इन स्कूलों में फिलहाल वैकल्पिक तरीके से पानी की आपूर्ति की जा रही है। यानी समस्या सिर्फ उन स्कूलों की नहीं है जिनकी इमारतें जर्जर हैं। कई स्कूलों में बच्चों को टॉयलेट और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।
सरकार ने पांच साल में 12,500 करोड़ रुपए का बड़ा रोडमैप तैयार कर दिया है। बजट में भी अलग-अलग मदों में राशि स्वीकृत की गई है। पैसा जुटाने के लिए कई स्रोत तय किए गए हैं, लेकिन स्कूलों की तस्वीर बताती है कि योजना और ऐलान के बाद सबसे जरूरी कदम काम शुरू करना है।
बच्चों को सुरक्षित स्कूल बिल्डिंग चाहिए, उन्हें ऐसी जगह पढ़ने की जरूरत है जहां छत हो,पर्याप्त जगह हो और बुनियादी सुविधाएं हों। सरकार का दावा अब कागज से निकलकर जमीन पर कितना उतरता है, आने वाले समय में इसकी तस्वीर स्कूलों में दिखाई देगी।
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लेकिन जमीनी तस्वीर इससे अलग है। जयपुर के बगरू विधानसभा के रामपुरा-कंवरपुरा गांव में जर्जर स्कूल की इमारत को खाली कराकर बच्चों को फिलहाल पास ही जानवरों के बाड़े में पढ़ाया जा रहा।
जहां बच्चे पढ़ते हैं, वहीं चारा भी रखा जाता। ऐसे में सवाल उठता है कि करोड़ों रुपए की योजनाओं के बीच बच्चों को सुरक्षित स्कूल भवन कब तक तैयार होंगे?
हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सरकार का 12500 करोड़ का रोडमैप
यह रोडमैप हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद तैयार किया गया। इसका मकसद जर्जर स्कूल भवनों को ठीक करना और स्कूलों में जरूरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना है।
राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट में भी 550 करोड़ रुपए मरम्मत और जीर्णोद्धार के लिए तथा 450 करोड़ रुपए भवन विहीन और जर्जर स्कूलों के लिए मंजूर किए हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही संस्था अभ्युथानम के प्रांजल सिंह का सवाल है कि असली चुनौती पैसा जुटाना नहीं, बल्कि काम जमीन पर शुरू करना है। उनका कहना है कि झालावाड़ की घटना को एक साल हो चुका और हाईकोर्ट भी करीब एक साल से इस मामले की सुनवाई कर रहा है।
जयपुर में ही दिख रहा है सरकारी दावे और हकीकत में अंतर
रामपुरा-कंवरपुरा इसका उदाहरण है। यहां स्कूल की इमारत जर्जर होने के कारण बच्चों को दूसरे स्थान पर पढ़ाया जा रहा था।
द सूत्र की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि बच्चे जानवरों के बाड़े जैसी जगह में पढ़ने को मजबूर थे। वहां टीनशेड के नीचे बच्चों की क्लास चल रही थीं। आसपास चारा रखा हुआ था। शिक्षक बच्चों को पढ़ा रहे थे, लेकिन जगह सामान्य स्कूल जैसी नहीं थी।
सीजेपी कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के बीच विवाद के बाद प्रशासन ने अगले ही दिन स्कूल को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया। इससे पहले बच्चे इसी अस्थायी व्यवस्था में पढ़ रहे थे।
यही तस्वीर सरकार के बड़े वित्तीय रोडमैप पर सवाल खड़ा करती है- जब बजट और योजनाएं मौजूद हैं तो जमीनी स्तर पर स्कूलों का काम अब तक क्यों नहीं पूरा हुआ?
9 स्रोत से जुटाया जाएगा 12,500 करोड़ का पैसा
समग्र शिक्षा: हर साल करीब 500 करोड़ रुपए और पांच साल में 2,500 करोड़ रुपए। इसके लिए पीएबी की बैठकों में हर साल प्रस्ताव भेजे जाएंगे।
नाबार्ड, विश्व बैंक और एडीबी: हर साल 500 करोड़ रुपए और पांच साल में 2,500 करोड़ रुपए ऋण के जरिए खर्च किए जाएंगे।
ग्रामीण विकास विभाग: वीबी-जी-राम-जी योजना के तहत स्कूल निर्माण और मरम्मत पर हर साल 400 करोड़ और पांच साल में 2,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
राज्य बजट: राज्य सरकार हर साल 300 करोड़ और पांच साल में 1,500 करोड़ रुपए देगी।
DMFT: जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट के जरिए हर साल 200 करोड़ और पांच साल में 1,000 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
सांसद और विधायक निधि: हर साल 200 करोड़ और पांच साल में 1,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
आपदा राहत कोष: हर साल 150 करोड़ और पांच साल में 750 करोड़ रुपए जुटाए जाएंगे।
CSR और जनसहभागिता: सार्वजनिक और निजी उपक्रमों तथा भामाशाहों के सहयोग से हर साल 150 करोड़ और पांच साल में 750 करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य है।
क्षेत्रीय योजनाएं: डांग, मगरा, मेवात, TAD जैसी योजनाओं से हर साल 100 करोड़ और पांच साल में 500 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
बुनियादी सुविधाओं से महरुम हैं हजारों स्कूल
प्रदेश में 611 स्कूल ऐसे हैं जिनके पास अपना भवन नहीं है। इनमें 10 बालिका स्कूल भी शामिल हैं। हालांकि माध्यमिक शिक्षा स्तर का कोई स्कूल बिना बिल्डिंग नहीं है। इसी तरह अपने भवन वाले कुल 64,484 सरकारी स्कूलों में 2,047 स्कूलों में शौचालय की सुविधा नहीं है।
राज्य के सरकारी स्कूलों में भी पीने के साफ पानी की स्थिति भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। प्रदेश के 1049 स्कूलों में पेयजल की सुविधा नहीं है।
इन स्कूलों में फिलहाल वैकल्पिक तरीके से पानी की आपूर्ति की जा रही है। यानी समस्या सिर्फ उन स्कूलों की नहीं है जिनकी इमारतें जर्जर हैं। कई स्कूलों में बच्चों को टॉयलेट और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।
अब असली परीक्षा जमीन पर होगी
बच्चों को सुरक्षित स्कूल बिल्डिंग चाहिए, उन्हें ऐसी जगह पढ़ने की जरूरत है जहां छत हो,पर्याप्त जगह हो और बुनियादी सुविधाएं हों। सरकार का दावा अब कागज से निकलकर जमीन पर कितना उतरता है, आने वाले समय में इसकी तस्वीर स्कूलों में दिखाई देगी।
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