जर्जर स्कूलों के लिए यह राशि ऊंट के मुंह​ में जीरा समान, हाई कोर्ट ने क्यों यह बोला?

Mukesh Sharma | Feb 16, 2026, 19:32 IST
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Photograph: (the sootr)

राजस्थान हाई कोर्ट ने जर्जर स्कूलों को लेकर सरकार के आए जवाब पर तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि 20 हजार करोड़ का प्रावधान ऊंट के मुंह​ में जीरा के समान है।

News in Short

  • ऊंट के मुंह​ में जीरा है 550 करोड़ स्कूलों की दशा सुधारने को-हाईकोर्ट
  • राजस्थान में जर्जर स्कूलों पर सरकार के जवाब पर हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
  • झालावाड़ में स्कूल भवन गिरने पर बच्चों की मौत पर हाई कोर्ट ने लिया था प्रसंज्ञान
  • सरकार ने जर्जर स्कूलों के लिए बजट में किया है 550 करोड़ रुपयों का प्रावधान
  • कोर्ट ने कहा, ऊंट के मुंह​ में जीरा है 550 करोड़ स्कूलों की दशा सुधारने के लिए

News in Detail

राजस्थान के सरकारी स्कूल के भवनों की मरम्मत व हालात सुधारने को बजट में 550 करोड़ रुपए का प्रावधान करने को हाई कोर्ट ने ऊंट के मुंह में जीरा बताया है। सोमवार को सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद ने कोर्ट को यह जानकारी दी थी। इस पर जस्टिस महेंद्र गोयल व जस्टिस अशोक कुमार जैन की बैंच ने मौखिक तौर पर तल्ख टिप्पणी की। बैंच ने कहा कि जरुरत तो करीब 20 हजार करोड़ रुपए की है, लेकिन सरकार 2000 करोड़ रुपये भी नहीं जुटा पा रही है। पिछले साल 25 जुलाई को झालावाड़ में एक स्कूल भवन गिरने से 7 बच्चों की मौत पर हाई कोर्ट ने स्व:प्रेरणा प्रसंज्ञान लेकर जनहित याचिका दर्ज की थी।

लगातार कर रहे हैं सुधार

महाधिवक्ता ने कोर्ट केा बताया कि 2026—27 के बजट में राजस्थान सरकार ने स्कूलों की मरम्मत व रखरखाव के लिए 550 करोड़, नए स्कूल भवन बनाने के लिए 450 करोड़ और स्कूलों में प्रयोगशालाएं बनाने के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। सरकार लगातार स्कूलों के हालात सुधारने के लिए चरणबद्ध तरीके से प्रयास कर रही है।

कम है यह पैसा तो

सरकार के जवाब से असंतुष्ट बैंच ने कहा कि राज्य के स्कूल भवनों की जर्जर हालत को देखते हुए यह बहुत कम पैसा है। एक्सपर्ट और प्रशासनिक अधिकारियों की रिपोर्टों के अनुसार करीब 20 हजार करोड़ रुपए चाहिएं। लेकिन, सरकार का 2 हजार करोड़ रुपए की व्यवस्था भी न कर पाना चिंताजनक है।

आने वाली पीढ़ियों का भी है मामला

बैंच ने कहा कि शैक्षणिक व्यवस्था की मजबूती केवल भवन निर्माण का प्रश्न नहीं है बल्कि, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है। समय रहते स्कूलों की मरम्मत और आधारभूत सुविधाओं को बेहतर नहीं बनाया गया तो शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव होगा।

सरकार चाहे तो आ सकता है पैसा

बैंच ने सुनवाई के दौरान अन्य तरीकों से भी पैसा जुटाने का सुझाव दिया। बैंच ने कहा कि भामाशाह,जनसहयोग और दान से पैसा जुटाया जाए। विधायक तथा सांसद निधि के तहत मिलने वाले पैसे का कुछ हिस्सा स्कूलों की मरम्मत व निर्माण में लगाया जाए। बैंच ने कहा कि यदि इस बारे में पारदर्शी तरीक से सही योजना बने तो बड़ी मात्रा में अतिरिक्त संसाधन जुटाए जा सकते हैं।

जब मंदिरों व धार्मिक संस्थान को दे सकते हैं तो

बैंच ने सुनवाई के दौरान मौखिक रुप से कहा कि जब समाज मंदिरों व धार्मिक संस्थानों को सैकड़ों करोड़ों रुपए दान में दे सकता है तो शिक्षा के लिए दान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है,बल्कि उससे भी बड़ा और पुण्य का काम है। समाज और सरकार मिलकर प्रयास करें तो स्कूलों की स्थिति में सुधार हो सकता है।

बना सकते हैं मॉनिटरिंग कमेटी

सुनवाई के दौरान बैंच ने मॉनिटरिंग बनाने के संकेत भी दिए। बैंच का कहना है कि मात्र फंड देना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि उसके उचित व ईमानदारी से खर्च की निगरानी करना भी जरुरी है। बैंच ने कहा कि जरुरी होने पर वह अगली सुनवाई पर मॉनिटरिंग कमेटी के गठन व अधिकारों केा लेकर निर्देश जारी कर सकती है। बैंच ने मामले में अगली सुनवाई के लिए 5 मार्च की तारीख तय की है।

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