जहां नुकसान के घाव गहरे, पर तेंदुए के लिए दिल में नफरत नहीं, अरावली की पहाड़ियों में पक रही एक अनूठी कहानी
Ashish Bhardwaj | Apr 13, 2026, 16:54 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान के उदयपुर क्षेत्र में इंसान और तेंदुए के बीच टकराव और सह अस्तित्व का अनोखा मिश्रण बनकर सामने आया है। एक शोध में खुलासा हुआ है कि भारी आर्थिक नुकसान के बावजूद स्थानीय समुदायों में तेंदुए के प्रति सहनशीलता बनी हुई है।
News In Short
- जयसमंद अभयारण्य में इंसान और तेंदुए के बीच टकराव और सह अस्तित्व का अनोखा मिश्रण।
- शोध में खुलासा कि भारी नुकसान के बावजूद ग्रामीणों में तेंदुए के प्रति सहनशीलता बनी हुई है।
- 13 साल में मानव-तेंदुए संघर्ष की 572 घटनाएं, लेकिन ग्रामीणों ने सहनशीलता दिखाई।
- नुकसान की घटनाओं में से केवल 31 फीसदी मामलों में ही मुआवजे के लिए दावा।
- शोध के अनुसार शिक्षा प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने के लिए भी अनिवार्य।
News In Detail
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के एक विस्तृत शोध ने इस रिश्ते की परतों को खोलकर रख दिया है। इसमें खुलासा हुआ है कि शिक्षा और सांस्कृतिक जड़ें वन्यजीव संरक्षण का असली आधार हैं।
13 साल का सफर: 572 संघर्ष की घटनाएं
इनमें से 98 प्रतिशत मामले सीधे तौर पर पशुधन के शिकार से जुड़े थे। यानी संघर्ष का मुख्य बिंदु इंसान नहीं, बल्कि उसकी आजीविका (गाय, बछड़े और बकरियां) है। शोध में पाया गया कि ऊंचाई पर बसे गांवों और अभयारण्य की सीमा से सटे इलाकों में खतरा सबसे ज्यादा है, क्योंकि वहां इंसान और वनराज की सीमाएं आपस में मिल गई हैं।
रात का सन्नाटा और असुरक्षित बाड़े
अध्ययन का एक स्याह पहलू सरकारी मुआवजा प्रणाली है। आंकड़ों के अनुसार कुल नुकसान की घटनाओं में से केवल 31 फीसदी मामलों में ही ग्रामीणों ने मुआवजे के लिए दावा किया। इसका कारण बेहद जटिल कागजी प्रक्रिया, जागरूकता का अभाव और बाजार मूल्य से काफी कम मिलने वाली सहायता राशि है।
ग्रामीणों का कहना है कि जितनी भाग-दौड़ और कागजी खानापूर्ति करनी पड़ती है, उससे कहीं कम पैसा हाथ आता है। इस आर्थिक दबाव के बावजूद, ग्रामीणों का संयम शोधकर्ताओं के लिए सबसे बड़े आश्चर्य का विषय रहा।
नफरत नहीं, तटस्थता
विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान की मिट्टी में रची-बसी सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं इसका मुख्य कारण हैं। यहां के लोग वन्यजीवों को केवल जानवर नहीं, बल्कि प्रकृति और ईश्वरीय व्यवस्था का हिस्सा मानते हैं। यह जियो और जीने दो की भावना ही तेंदुए को अरावली की गुफाओं में सुरक्षित रखे हुए है।
सह-अस्तित्व का नया औजार
केवल जंगल बचाना काफी नहीं
संघर्ष कम करने के लिए ये सुझाव
चराई में बदलाव: जंगल के गहरे हिस्सों में जाने के बजाय गांव के सुरक्षित क्षेत्रों में चराई को बढ़ावा देना।
मुआवजा सुधार: दावों की प्रक्रिया को सरल और डिजिटल बनाया जाए, और मुआवजा राशि को बाजार भाव के करीब लाया जाए।
जागरूकता शिविर: ग्रामीणों को तेंदुए के व्यवहार की जानकारी दी जाए ताकि वे डर के बजाय सावधानी से काम ले सकें।
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