खाड़ी में जंग, भारत में मुसीबत: मध्यप्रदेश में फार्मा और खेती पर मार, राजस्थान का चावल फंसा, मसालों के बाजार टूटे
Anjali Dwivedi | Apr 02, 2026, 15:17 IST
gulf war impact
अमेरिका-ईरान तनाव से भारत का निर्यात तंत्र ठप हो गया है। पोर्ट्स पर हजारों कंटेनर अटके हैं। कृषि निर्यात में 12 अरब डॉलर के नुकसान की आशंका है। इसका सीधा असर एमपी, राजस्थान और गुजरात पर पड़ रहा है।
दुनिया के नक्शे पर खाड़ी क्षेत्र में भले गोलियां और मिसाइलें चल रही हों, पर उसका सबसे गहरा असर भारत के बाजार, खेत और फैक्ट्रियों में साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका, इजराइल और ईरान (अमेरिका-इजराइल और ईरान जंग) के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक व्यापार की धुरी को हिला दिया है। ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ जैसे अहम समुद्री रास्ते के बाधित होते ही भारत का निर्यात तंत्र जैसे ठहर गया है।
हालात ऐसे बन गए हैं कि देश के बड़े-बड़े बंदरगाहों पर हजारों कंटेनर अटके हैं। इनमें भरे फल, सब्जियां और अन्य खाद्य उत्पाद खराब होने की कगार पर हैं। व्यापारियों का कहना है कि एक तो माल का नुकसान हो रहा है। दूसरा, पूरी सप्लाई चेन टूट रही है। शुरुआती आकलन में ही कृषि निर्यात में 8 से 12 अरब डॉलर तक के नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
इस संकट को और गहरा कर रही है लाल सागर की स्थिति। हूती हमलों के डर से यूरोप से आने-जाने वाले जहाज अब स्वेज नहर का रास्ता छोड़कर अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर गुजर रहे हैं। इससे ट्रांजिट समय 15 से 20 दिन तक बढ़ गया है। नतीजा यह कि ऑर्डर रद्द हो रहे हैं। समय पर डिलीवरी नहीं हो पा रही है और कारोबारियों का भरोसा डगमगा रहा है। कई निर्यातकों ने नए ऑर्डर लेना ही बंद कर दिया है।
युद्ध के बीच द सूत्र ने राज्यों पर पड़ रहे असर की पड़ताल की तो चौंकाने वाली स्थिति सामने आई है। इस वैश्विक उथल-पुथल का सबसे ज्यादा असर देश के उन राज्यों पर पड़ रहा है, जिनकी अर्थव्यवस्था निर्यात और कृषि पर टिकी है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हालात तेजी से बदल रहे हैं।
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युद्ध का असर मध्य प्रदेश में नजर आने लगा है। इंदौर-पीथमपुर का फार्मा हब कच्चे माल की महंगाई से जूझ रहा है। पैरासिटामॉल समेत कई दवाओं में इस्तेमाल होने वाले एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट महंगे हो गए हैं।
फेडरेशन ऑफ फार्मा इंटरप्रेन्योर के हिमांशु शाह का कहना है कि मध्यप्रदेश का दवा बाजार निर्यात में पिछड़ रहा है। पेमेंट भी समय पर नहीं हो रहा। रॉ मटेरियल की कीमतें बढ़ने से स्थिति डगमगा रही है।
कारोबारियों का कहना है कि हालात नहीं सुधरे तो एक से डेढ़ महीने में दवाओं की कीमत और सप्लाई दोनों प्रभावित होंगी। उधर, बुरहानपुर और बड़वानी में केला उत्पादकों के सामने बड़ा संकट खड़ा है। हर साल अप्रैल-मई में खाड़ी देशों से आने वाली मांग इस बार नहीं आई।
करीब 13 हजार मीट्रिक टन केले का निर्यात प्रभावित होने का अनुमान है। कीमतें गिर रही हैं और किसानों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो सकता है। केला निर्यात करने वाले राजेन्द्र चौकसे कहते हैं, बाग तैयार थे, लेकिन मांग शुरू ही नहीं हुई।
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राजस्थान में स्थिति और गंभीर हो गई है। बूंदी और कोटा क्षेत्र की मिलों में तैयार 3.75 लाख क्विंटल बासमती चावल बंदरगाहों और गोदामों में अटका है, जिसकी कीमत 300 से 350 करोड़ रुपए आंकी जा रही है। निर्यात ठप होने से 10 हजार से ज्यादा श्रमिक बेरोजगार हो गए हैं।
राज्य का ग्वार सेक्टर भी दबाव में है। जोधपुर, नागौर, बीकानेर और गंगानगर जैसे प्रमुख केंद्रों में ग्वार गम की मांग घट गई है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय तेल-गैस सेक्टर में सुस्ती से इसका उपयोग कम हुआ है। इससे ग्वार के दाम नीचे आ गए हैं।
नागौर और आसपास के इलाकों में जीरा, धनिया और मैथी जैसी मसाला फसलें भी संकट में हैं। खाड़ी देशों को निर्यात प्रभावित होने से मंडियों में दबाव बढ़ा है। बाड़मेर मंडी में जीरे के भाव 15 से 20 रुपए प्रति किलो तक गिर गए, वहीं इसबगोल भी 10 से 15 रुपए तक सस्ता हुआ है। व्यापारी गौतम चमन के अनुसार, निर्यात नहीं होने से बाजार में मांग कमजोर पड़ गई है, जिसका सीधा असर कीमतों पर दिख रहा है।
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गुजरात में औद्योगिक सेक्टर पर सीधा असर पड़ा है। केमिकल और पेट्रोकेमिकल उद्योग कच्चे तेल और गैस पर निर्भर है और कीमतों में उछाल ने उत्पादन लागत बढ़ा दी है। कई यूनिट्स ने उत्पादन घटाया है और नए ऑर्डर लेने में सतर्कता बरती जा रही है।
टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर, जो राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, खाड़ी देशों से ऑर्डर न मिलने के कारण दबाव में है। सूरत, अहमदाबाद और राजकोट जैसे हब में उत्पादन की रफ्तार धीमी पड़ गई है, खासकर छोटे यूनिट्स ज्यादा प्रभावित हैं।
उधर, मेहसाणा के उंझा का जीरा बाजार, जो एशिया के बड़े मसाला बाजारों में गिना जाता है, पहले से कमजोर मांग के बीच अब और दबाव में आ गया है। निर्यात घटने से स्टॉक बढ़ रहा है और कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
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महाराष्ट्र में मुंबई बंदरगाह पर कंटेनर अटके हैं, जिससे बासमती चावल, अंगूर, केला और प्याज का निर्यात प्रभावित हुआ है। कीमतों में गिरावट से किसानों और व्यापारियों दोनों को नुकसान हो रहा है, जबकि लॉजिस्टिक्स चेन टूटने से भुगतान और शिपमेंट में भी दिक्कतें बढ़ी हैं।
तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ में ऑयलमील, चमड़ा और इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात में बाधाएं आई हैं। माल समय पर नहीं पहुंच रहा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों की विश्वसनीयता पर असर पड़ रहा है।
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इस पूरे संकट के बीच उर्वरक को लेकर नई चिंता सामने आ रही है। भारत अपनी यूरिया जरूरत का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने से गैस सप्लाई प्रभावित होने का खतरा है, जो उर्वरक उत्पादन के लिए जरूरी है।
वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की कीमतें 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं और यूरिया के दाम 650 डॉलर प्रति टन के पार पहुंच गए हैं। फिलहाल देश में यूरिया (60 लाख टन+) और डीएपी (करीब 25 लाख टन) का स्टॉक संतोषजनक है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आयात में देरी हुई तो मई से दबाव बढ़ेगा और जून-जुलाई के खरीफ सीजन में स्थिति गंभीर हो सकती है।
ऐसी स्थिति में किसान उर्वरकों का उपयोग कम कर सकते हैं या फसल पैटर्न बदल सकते हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित होगा। पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव सिराज हुसैन का कहना है कि यूरिया वितरण प्रणाली में बदलाव कर जरूरत वाले राज्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
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हालात ऐसे बन गए हैं कि देश के बड़े-बड़े बंदरगाहों पर हजारों कंटेनर अटके हैं। इनमें भरे फल, सब्जियां और अन्य खाद्य उत्पाद खराब होने की कगार पर हैं। व्यापारियों का कहना है कि एक तो माल का नुकसान हो रहा है। दूसरा, पूरी सप्लाई चेन टूट रही है। शुरुआती आकलन में ही कृषि निर्यात में 8 से 12 अरब डॉलर तक के नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
इस संकट को और गहरा कर रही है लाल सागर की स्थिति। हूती हमलों के डर से यूरोप से आने-जाने वाले जहाज अब स्वेज नहर का रास्ता छोड़कर अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर गुजर रहे हैं। इससे ट्रांजिट समय 15 से 20 दिन तक बढ़ गया है। नतीजा यह कि ऑर्डर रद्द हो रहे हैं। समय पर डिलीवरी नहीं हो पा रही है और कारोबारियों का भरोसा डगमगा रहा है। कई निर्यातकों ने नए ऑर्डर लेना ही बंद कर दिया है।
राज्यों पर क्या असर...
मध्यप्रदेश: फार्मा और खेती पर दोहरी मार
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युद्ध का असर मध्य प्रदेश में नजर आने लगा है। इंदौर-पीथमपुर का फार्मा हब कच्चे माल की महंगाई से जूझ रहा है। पैरासिटामॉल समेत कई दवाओं में इस्तेमाल होने वाले एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट महंगे हो गए हैं।
फेडरेशन ऑफ फार्मा इंटरप्रेन्योर के हिमांशु शाह का कहना है कि मध्यप्रदेश का दवा बाजार निर्यात में पिछड़ रहा है। पेमेंट भी समय पर नहीं हो रहा। रॉ मटेरियल की कीमतें बढ़ने से स्थिति डगमगा रही है।
कारोबारियों का कहना है कि हालात नहीं सुधरे तो एक से डेढ़ महीने में दवाओं की कीमत और सप्लाई दोनों प्रभावित होंगी। उधर, बुरहानपुर और बड़वानी में केला उत्पादकों के सामने बड़ा संकट खड़ा है। हर साल अप्रैल-मई में खाड़ी देशों से आने वाली मांग इस बार नहीं आई।
करीब 13 हजार मीट्रिक टन केले का निर्यात प्रभावित होने का अनुमान है। कीमतें गिर रही हैं और किसानों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो सकता है। केला निर्यात करने वाले राजेन्द्र चौकसे कहते हैं, बाग तैयार थे, लेकिन मांग शुरू ही नहीं हुई।
राजस्थान: चावल फंसा, मसाला और ग्वार बाजार टूटे
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राजस्थान में स्थिति और गंभीर हो गई है। बूंदी और कोटा क्षेत्र की मिलों में तैयार 3.75 लाख क्विंटल बासमती चावल बंदरगाहों और गोदामों में अटका है, जिसकी कीमत 300 से 350 करोड़ रुपए आंकी जा रही है। निर्यात ठप होने से 10 हजार से ज्यादा श्रमिक बेरोजगार हो गए हैं।
राज्य का ग्वार सेक्टर भी दबाव में है। जोधपुर, नागौर, बीकानेर और गंगानगर जैसे प्रमुख केंद्रों में ग्वार गम की मांग घट गई है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय तेल-गैस सेक्टर में सुस्ती से इसका उपयोग कम हुआ है। इससे ग्वार के दाम नीचे आ गए हैं।
नागौर और आसपास के इलाकों में जीरा, धनिया और मैथी जैसी मसाला फसलें भी संकट में हैं। खाड़ी देशों को निर्यात प्रभावित होने से मंडियों में दबाव बढ़ा है। बाड़मेर मंडी में जीरे के भाव 15 से 20 रुपए प्रति किलो तक गिर गए, वहीं इसबगोल भी 10 से 15 रुपए तक सस्ता हुआ है। व्यापारी गौतम चमन के अनुसार, निर्यात नहीं होने से बाजार में मांग कमजोर पड़ गई है, जिसका सीधा असर कीमतों पर दिख रहा है।
गुजरात: तेल-गैस महंगे, उद्योग और टेक्सटाइल सुस्त
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गुजरात में औद्योगिक सेक्टर पर सीधा असर पड़ा है। केमिकल और पेट्रोकेमिकल उद्योग कच्चे तेल और गैस पर निर्भर है और कीमतों में उछाल ने उत्पादन लागत बढ़ा दी है। कई यूनिट्स ने उत्पादन घटाया है और नए ऑर्डर लेने में सतर्कता बरती जा रही है।
टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर, जो राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, खाड़ी देशों से ऑर्डर न मिलने के कारण दबाव में है। सूरत, अहमदाबाद और राजकोट जैसे हब में उत्पादन की रफ्तार धीमी पड़ गई है, खासकर छोटे यूनिट्स ज्यादा प्रभावित हैं।
उधर, मेहसाणा के उंझा का जीरा बाजार, जो एशिया के बड़े मसाला बाजारों में गिना जाता है, पहले से कमजोर मांग के बीच अब और दबाव में आ गया है। निर्यात घटने से स्टॉक बढ़ रहा है और कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु की संकट में
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महाराष्ट्र में मुंबई बंदरगाह पर कंटेनर अटके हैं, जिससे बासमती चावल, अंगूर, केला और प्याज का निर्यात प्रभावित हुआ है। कीमतों में गिरावट से किसानों और व्यापारियों दोनों को नुकसान हो रहा है, जबकि लॉजिस्टिक्स चेन टूटने से भुगतान और शिपमेंट में भी दिक्कतें बढ़ी हैं।
तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ में ऑयलमील, चमड़ा और इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात में बाधाएं आई हैं। माल समय पर नहीं पहुंच रहा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पादों की विश्वसनीयता पर असर पड़ रहा है।
यूरिया संकट की आहट, खेती पर हो सकता है असर
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इस पूरे संकट के बीच उर्वरक को लेकर नई चिंता सामने आ रही है। भारत अपनी यूरिया जरूरत का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने से गैस सप्लाई प्रभावित होने का खतरा है, जो उर्वरक उत्पादन के लिए जरूरी है।
वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की कीमतें 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं और यूरिया के दाम 650 डॉलर प्रति टन के पार पहुंच गए हैं। फिलहाल देश में यूरिया (60 लाख टन+) और डीएपी (करीब 25 लाख टन) का स्टॉक संतोषजनक है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आयात में देरी हुई तो मई से दबाव बढ़ेगा और जून-जुलाई के खरीफ सीजन में स्थिति गंभीर हो सकती है।
ऐसी स्थिति में किसान उर्वरकों का उपयोग कम कर सकते हैं या फसल पैटर्न बदल सकते हैं, जिससे उत्पादन प्रभावित होगा। पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव सिराज हुसैन का कहना है कि यूरिया वितरण प्रणाली में बदलाव कर जरूरत वाले राज्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
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