असफलता ने दिखाई सफलता की राह, आईएएस डॉ. रविंद्र गोस्वामी आज हैं युवाओं के लिए प्रेरणा
Jageshwar prasad | May 02, 2026, 08:03 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान कैडर के आईएएस डॉ. रविंद्र गोस्वामी की कहानी प्रेरणादायी है। असफलता के बाद उन्होंने कामयाबी की इबारत लिखी। रोचक बात यह है कि वे उसी जिले के कलेक्टर बने, जहां से असफल होकर लौटे थे।
राजस्थान कैडर के आईएएस डॉ. रविंद्र गोस्वामी आज उस मुकाम पर हैं, जहां पहुंचने का सपना हर युवा देखता है। वर्तमान में पाली जिले के कलेक्टर के रूप में तैनात डॉ. गोस्वामी ने यह साबित कर दिया है कि यदि आपके पास एक बैकअप प्लान और अटूट इच्छाशक्ति हो, तो पहली हार के बाद भी जीत का इतिहास लिखा जा सकता है।
डॉ. गोस्वामी का जन्म जोबनेर जयपुर में हुआ। उनकी कहानी साल 2001 में शिक्षा की नगरी कोटा से शुरू होती है। एक सामान्य युवा की तरह वे भी आंखों में डॉक्टर बनने का सपना लिए मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने कोटा पहुंचे थे। दिन-रात एक करने के बावजूद पहले प्रयास में उन्हें असफलता हाथ लगी। निराशा के उस दौर में वे घर लौट गए, लेकिन उनके मन में हार स्वीकार करने का कोई विचार नहीं था।
उन्होंने अपनी गलतियों से सीखा और दूसरे प्रयास में न केवल परीक्षा पास की, बल्कि सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेकर एमबीबीएस (MBBS) की डिग्री हासिल की। यह उनकी पहली बड़ी जीत थी, जिसने उन्हें सिखाया कि असफलता केवल एक पड़ाव है, मंजिल नहीं।
डॉक्टरी के साथ
एमबीबीएस पूरा करने के बाद डॉ. गोस्वामी ने एक निजी अस्पताल में प्रैक्टिस शुरू की। एक डॉक्टर के रूप में उनका करियर सुरक्षित और सफल था, लेकिन उनके भीतर कुछ और बड़ा करने का जज्बा बाकी था। उन्होंने डॉक्टरी की व्यस्त नौकरी के साथ-साथ दुनिया की सबसे कठिन मानी जाने वाली यूपीएससी (UPSC) की तैयारी शुरू की।
अस्पताल की ड्यूटी और किताबों के बीच सामंजस्य बिठाना आसान नहीं था, लेकिन उनकी एकाग्रता का फल साल 2015 में मिला। अपने पहले ही प्रयास में उन्होंने 152वीं रैंक हासिल कर सबको चौंका दिया और देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा में प्रवेश किया।
छात्रों के लिए चलाया
डॉ. गोस्वामी जब कोटा के जिला कलेक्टर बने, तो उन्होंने वहां के छात्रों की मानसिक पीड़ा और तनाव को महसूस किया। उन्होंने कामयाब कोटा अभियान की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य कोचिंग छात्रों को अवसाद और सुसाइड जैसे घातक विचारों से बाहर निकालना है।
इस अभियान के तहत उन्होंने स्वयं हॉस्टल जाकर छात्रों के साथ डिनर किया और उनके साथ गपशप की। उन्होंने छात्रों को समझाया कि जिंदगी अनमोल है और कोई भी प्रतियोगी परीक्षा जीवन से बढ़कर नहीं है। एक पूर्व कोचिंग छात्र होने के नाते, वे उनकी समस्याओं को गहराई से समझते थे।
छात्रों और भावी अभ्यर्थियों के साथ संवाद के दौरान डॉ. गोस्वामी ने अपनी सफलता के कुछ सूत्र साझा किए हैं:
सेल्फ स्टडी और रूटीन: वे मानते हैं कि दूसरों के समझाने की अपेक्षा स्वयं पढ़कर समझना अधिक प्रभावशाली होता है। वे सप्ताह में एक बार निबंध लिखते थे और उसे दोस्तों से क्रॉस-चेक करवाते थे।
संडे रेस्ट का महत्व: वे पढ़ाई के समय बेहद गंभीर रहते थे, लेकिन रविवार को पूरी तरह विश्राम करते थे। इस दिन वे परिवार के साथ मूवी देखते और बातें करते थे ताकि मानसिक तरोताजगी बनी रहे।
बैकअप प्लान की अनिवार्यता: वे युवाओं को हमेशा एक बैकअप प्लान रखने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि यूपीएससी या मेडिकल आखिरी करियर नहीं है। यदि आप असफल होते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप काबिल नहीं हैं, बल्कि यह महज एक प्रतियोगिता का हिस्सा है।
वर्तमान में पाली कलेक्टर के रूप में डॉ. गोस्वामी प्रशासन को संवेदनशील और विकासोन्मुख बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने पदभार संभालते ही जिले की सबसे बड़ी समस्या, पानी की किल्लत, को अपनी प्राथमिकता सूची में शीर्ष पर रखा है। वे मानते हैं कि प्रशासन का काम केवल दफ्तर चलाना नहीं, बल्कि जनता की बुनियादी समस्याओं का पुख्ता समाधान करना है।
डॉ. गोस्वामी की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए एक संजीवनी है जो एक असफलता के बाद खुद को हारा हुआ मान लेते हैं। उनकी कहानी सिखाती है कि:
असफलता का अर्थ यह नहीं है कि आपने मेहनत नहीं की।
प्रयासों की एक सीमा होनी चाहिए, जिसके बाद वैकल्पिक रास्तों पर भी विचार करना चाहिए।
अगर इरादा मजबूत हो, तो एक डॉक्टर भी प्रशासनिक सेवा का शीर्ष अधिकारी बन सकता है।
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कोटा की गलियां और पहली असफलता का सबक
उन्होंने अपनी गलतियों से सीखा और दूसरे प्रयास में न केवल परीक्षा पास की, बल्कि सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेकर एमबीबीएस (MBBS) की डिग्री हासिल की। यह उनकी पहली बड़ी जीत थी, जिसने उन्हें सिखाया कि असफलता केवल एक पड़ाव है, मंजिल नहीं।
डॉक्टरी के साथ यूपीएससी का कठिन संघर्ष
अस्पताल की ड्यूटी और किताबों के बीच सामंजस्य बिठाना आसान नहीं था, लेकिन उनकी एकाग्रता का फल साल 2015 में मिला। अपने पहले ही प्रयास में उन्होंने 152वीं रैंक हासिल कर सबको चौंका दिया और देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा में प्रवेश किया।
छात्रों के लिए चलाया कामयाब कोटा अभियान
इस अभियान के तहत उन्होंने स्वयं हॉस्टल जाकर छात्रों के साथ डिनर किया और उनके साथ गपशप की। उन्होंने छात्रों को समझाया कि जिंदगी अनमोल है और कोई भी प्रतियोगी परीक्षा जीवन से बढ़कर नहीं है। एक पूर्व कोचिंग छात्र होने के नाते, वे उनकी समस्याओं को गहराई से समझते थे।
डॉ. गोस्वामी के सफलता के मूल मंत्र
सेल्फ स्टडी और रूटीन: वे मानते हैं कि दूसरों के समझाने की अपेक्षा स्वयं पढ़कर समझना अधिक प्रभावशाली होता है। वे सप्ताह में एक बार निबंध लिखते थे और उसे दोस्तों से क्रॉस-चेक करवाते थे।
संडे रेस्ट का महत्व: वे पढ़ाई के समय बेहद गंभीर रहते थे, लेकिन रविवार को पूरी तरह विश्राम करते थे। इस दिन वे परिवार के साथ मूवी देखते और बातें करते थे ताकि मानसिक तरोताजगी बनी रहे।
बैकअप प्लान की अनिवार्यता: वे युवाओं को हमेशा एक बैकअप प्लान रखने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि यूपीएससी या मेडिकल आखिरी करियर नहीं है। यदि आप असफल होते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप काबिल नहीं हैं, बल्कि यह महज एक प्रतियोगिता का हिस्सा है।
पाली कलेक्टर के रूप में नया संकल्प
हारना मना है
असफलता का अर्थ यह नहीं है कि आपने मेहनत नहीं की।
प्रयासों की एक सीमा होनी चाहिए, जिसके बाद वैकल्पिक रास्तों पर भी विचार करना चाहिए।
अगर इरादा मजबूत हो, तो एक डॉक्टर भी प्रशासनिक सेवा का शीर्ष अधिकारी बन सकता है।
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