5 बार फेल होने के बाद भी नहीं मानी हार, बनीं स्वॉर्ड ऑफ ऑनर, आईपीएस रंजीता शर्मा की कहानी
Jageshwar prasad | May 29, 2026, 17:59 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान कैडर की आईपीएस रंजीता शर्मा ने पांच बार असफल होने के बाद भी हार नहीं मानी और छठे प्रयास में ऑल इंडिया रैंक (AIR) 130 हासिल की और IPS बन गईं। उनकी यह कहानी हमें प्रेरणा देती है कि मेहनत, साहस और दृढ़ संकल्प से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
राजस्थान पुलिस के इतिहास में एक नया अध्याय तब जुड़ा, जब जयपुर पुलिस कमिश्नरेट के ईस्ट जिले की डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) के पद पर रंजीता शर्मा को नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति सिर्फ एक पद-स्थानांतरण नहीं थी, बल्कि उस लगातार मेहनत, संकल्प और अदम्य साहस की जीत थी, जिसने हरियाणा के एक छोटे से गांव से निकलकर एक महिला को देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा तक पहुंचाया।
लेकिन यह रास्ता आसान नहीं था। अखबारों की सुर्खियों में आज जो चमकता हुआ सितारा दिखता है, उसकी जड़ें उन गहरे अंधेरों में जमी हैं, जहां एक-एक करके पांच बार असफलता ने दस्तक दी थी। रंजीता शर्मा की कहानी सिर्फ एक IPS अधिकारी की कहानी नहीं है, यह हर उस युवा के लिए प्रेरणा का वह उजियारा है जो थोड़ी-सी नाकामी पर टूट जाता है।
आईपीएस रंजीता शर्मा का जन्म हरियाणा के रेवाड़ी जिले के दाहिना गांव में हुआ, लेकिन उनकी प्रारंभिक शिक्षा फरीदाबाद में हुई। उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि इसी गांव की एक बेटी कभी गांव की पहली IPS अधिकारी बनेगी। जिन गलियों में लड़कियों को घर से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करना पड़ता था, वहां रंजीता ने एक बड़ा सपना देखा- सिविल सेवा का सपना।
लेकिन यह सपना देखना जितना आसान था, उसे पूरा करना उतना ही कठिन था। रंजीता ने पहले दिल्ली के IIMC से मास कम्युनिकेशन किया और करीब 9 सालों तक कॉर्पोटे सेक्टर में PR प्रोफेशनल के रूप में शानदार पैकेज पर काम किया। लेकिन उनके मन में समाज के लिए कुछ करने की ललक थी। अच्छी नौकरी और आलीशान जिंदगी को अलविदा कहकर वह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में जुट गईं।
यहां से शुरू हुआ उनके जीवन का सबसे कठिन, लेकिन सबसे प्रेरणादायक अध्याय। UPSC की तैयारी करने वाले लाखों युवा जानते हैं कि यह परीक्षा कितनी अनप्रेडिक्टेबल है। रंजीता को इसका दंश बार-बार झेलना पड़ा और वे लगातार पांच बार असफल हुईं।
2013: वे प्रीलिम्स भी पास नहीं कर पाईं।
2014: मेहनत की, संघर्ष किया, इंटरव्यू तक पहुंच गईं, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो सका।
2015: फिर से प्रीलिम्स में असफलता।
2016: फिर से इंटरव्यू तक का सफर, लेकिन फिर निराशा हाथ लगी।
2017: एक बार फिर प्रीलिम्स में असफलता।
कल्पना कीजिए पांच बार लगातार असफलता। हर बार उम्मीद जगती, मेहनत की जाती, लेकिन परिणाम दिल तोड़ देता। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती खुद पर भरोसा खोने की होती है। सवाल उठने लगते हैं, रिश्तेदार ताने मारने लगते हैं, और मन में यह विचार आने लगता है - शायद मुझसे नहीं होगा।
लेकिन रंजीता शर्मा ने जो किया, वही उन्हें आम लोगों से असाधारण बनाता है। उन्होंने कहा - अगर साल 2018 में भी नहीं हुआ, तो फिर कभी नहीं करूंगी, लेकिन छठी बार तो पूरी ताकत से लड़ूंगी।
यह साल 2018 था। रंजीता ने अपनी रणनीति बदली। कमजोर विषयों पर ध्यान दिया, टाइम मैनेजमेंट सीखा और सबसे बढ़कर, पिछली असफलताओं से सीखते हुए आत्मविश्वास से भरपूर परीक्षा दी।
जब परिणाम आया, तो इतिहास बन गया। रंजीता शर्मा ने ऑल इंडिया रैंक (AIR) 130 हासिल की और IPS बन गईं। हरियाणा के दाहिना गांव में जश्न का माहौल था। जिस गांव में कभी किसी लड़की के IPS बनने का सपना भी नहीं देखा था, वहां अब तिरंगा लहरा रहा था।
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IPS बनना एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन रंजीता ने अपने प्रशिक्षण काल में ही साबित कर दिया कि वह अपवाद हैं। हैदराबाद स्थित सरदार वल्लभभाई पटेल नेशनल पुलिस अकादमी (SVPNPA) में ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने वो कर दिखाया, जो कोई महिला ट्रेनी पहले कभी नहीं कर पाई थी।
अकादमी में स्वॉर्ड ऑफ ऑनर एक ऐसा पुरस्कार है जो सबसे बेहतरीन आउटडोर प्रदर्शन (शूटिंग, ड्रिल, फिजिकल ट्रेनिंग, हॉर्समैनशिप) करने वाले ट्रेनी को दिया जाता है। परंपरागत रूप से यह पुरस्कार हमेशा पुरुष अधिकारियों को ही मिलता था। क्योंकि ये माना जाता था कि शारीरिक रूप से पुरुष ही इसमें बाजी मार सकते हैं।
रंजीता ने यह मिथक तोड़ दिया। वह अकादमी के इतिहास में स्वॉर्ड ऑफ ऑनर पाने वाली पहली महिला IPS ट्रेनी बनीं। न केवल यह, बल्कि कुल 50 ट्रॉफियों में से उन्होंने 8 ट्रॉफियां अपने नाम कीं। और 2021 में, उन्होंने दीक्षांत परेड की कमान संभाली- जो किसी महिला ट्रेनी के लिए सिर्फ पांचवीं बार था।
![IPS Ranjeeta Sharma Leads The Dikshant Parade. Creates History]()
रंजीता शर्मा के पति सागर राणा भी IPS अधिकारी हैं। सागर राणा 2019 बैच के अधिकारी हैं और मूल रूप से पश्चिम बंगाल कैडर से थे। दोनों की शादी के बाद, सागर राणा ने विवाह के आधार पर राजस्थान कैडर में ट्रांसफर करवा लिया।
असफलता केवल देरी है, अंत नहीं - पांच बार असफल होना रंजीता के लिए अंत नहीं था, बल्कि एक नई शुरुआत की तैयारी थी। आप कितनी बार गिरते हैं, यह मायने नहीं रखता, मायने रखता है कि आप कितनी बार उठते हैं।
लिंग बाधा नहीं है - स्वॉर्ड ऑफ ऑनर का पुरस्कार केवल पुरुषों के लिए समझा जाता था। रंजीता ने साबित किया कि शारीरिक और मानसिक दक्षता लिंग पर निर्भर नहीं करती।
स्थिर नौकरी छोड़ने का साहस - अच्छी सैलरी की नौकरी छोड़कर अनिश्चित रास्ते पर चलना आसान नहीं है। रंजीता ने दिखाया कि अगर सपना बड़ा हो, तो जोखिम लेना जरूरी है।
ग्रामीण क्षेत्र की बेटियां भी बना सकती हैं इतिहास - रंजीता ने साबित किया कि संसाधनों की कमी कभी भी सफलता में बाधा नहीं बन सकती यदि इच्छाशक्ति प्रबल हो।
उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो थोड़ी सी विफलता पर कहता है - अब नहीं होगा, बहुत देर हो चुकी है या मुझसे नहीं होगा। रंजीता शर्मा कहती हैं कि सिर्फ एक चीज है जो सफलता और असफलता के बीच का अंतर तय करती है - वह है हार न मानने की जिद।
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लेकिन यह रास्ता आसान नहीं था। अखबारों की सुर्खियों में आज जो चमकता हुआ सितारा दिखता है, उसकी जड़ें उन गहरे अंधेरों में जमी हैं, जहां एक-एक करके पांच बार असफलता ने दस्तक दी थी। रंजीता शर्मा की कहानी सिर्फ एक IPS अधिकारी की कहानी नहीं है, यह हर उस युवा के लिए प्रेरणा का वह उजियारा है जो थोड़ी-सी नाकामी पर टूट जाता है।
गांव की वो लड़की जिसने सपना देखा
लेकिन यह सपना देखना जितना आसान था, उसे पूरा करना उतना ही कठिन था। रंजीता ने पहले दिल्ली के IIMC से मास कम्युनिकेशन किया और करीब 9 सालों तक कॉर्पोटे सेक्टर में PR प्रोफेशनल के रूप में शानदार पैकेज पर काम किया। लेकिन उनके मन में समाज के लिए कुछ करने की ललक थी। अच्छी नौकरी और आलीशान जिंदगी को अलविदा कहकर वह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में जुट गईं।
पांच बार की असफलता
2013: वे प्रीलिम्स भी पास नहीं कर पाईं।
2014: मेहनत की, संघर्ष किया, इंटरव्यू तक पहुंच गईं, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो सका।
2015: फिर से प्रीलिम्स में असफलता।
2016: फिर से इंटरव्यू तक का सफर, लेकिन फिर निराशा हाथ लगी।
2017: एक बार फिर प्रीलिम्स में असफलता।
कल्पना कीजिए पांच बार लगातार असफलता। हर बार उम्मीद जगती, मेहनत की जाती, लेकिन परिणाम दिल तोड़ देता। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती खुद पर भरोसा खोने की होती है। सवाल उठने लगते हैं, रिश्तेदार ताने मारने लगते हैं, और मन में यह विचार आने लगता है - शायद मुझसे नहीं होगा।
लेकिन रंजीता शर्मा ने जो किया, वही उन्हें आम लोगों से असाधारण बनाता है। उन्होंने कहा - अगर साल 2018 में भी नहीं हुआ, तो फिर कभी नहीं करूंगी, लेकिन छठी बार तो पूरी ताकत से लड़ूंगी।
छठा प्रयास और मिल गई मंजिल
जब परिणाम आया, तो इतिहास बन गया। रंजीता शर्मा ने ऑल इंडिया रैंक (AIR) 130 हासिल की और IPS बन गईं। हरियाणा के दाहिना गांव में जश्न का माहौल था। जिस गांव में कभी किसी लड़की के IPS बनने का सपना भी नहीं देखा था, वहां अब तिरंगा लहरा रहा था।
महेंद्रगढ़ : रंजीता शर्मा को मिला हैदराबाद में पासिंग आउट परेड का नेतृत्व | हरियाणा | Aaj Samaaj
हैदराबाद में मिला स्वॉर्ड ऑफ ऑनर
अकादमी में स्वॉर्ड ऑफ ऑनर एक ऐसा पुरस्कार है जो सबसे बेहतरीन आउटडोर प्रदर्शन (शूटिंग, ड्रिल, फिजिकल ट्रेनिंग, हॉर्समैनशिप) करने वाले ट्रेनी को दिया जाता है। परंपरागत रूप से यह पुरस्कार हमेशा पुरुष अधिकारियों को ही मिलता था। क्योंकि ये माना जाता था कि शारीरिक रूप से पुरुष ही इसमें बाजी मार सकते हैं।
रंजीता ने यह मिथक तोड़ दिया। वह अकादमी के इतिहास में स्वॉर्ड ऑफ ऑनर पाने वाली पहली महिला IPS ट्रेनी बनीं। न केवल यह, बल्कि कुल 50 ट्रॉफियों में से उन्होंने 8 ट्रॉफियां अपने नाम कीं। और 2021 में, उन्होंने दीक्षांत परेड की कमान संभाली- जो किसी महिला ट्रेनी के लिए सिर्फ पांचवीं बार था।
IPS Ranjeeta Sharma Leads The Dikshant Parade. Creates History
पति भी हैं IPS
रंजीता शर्मा से सीखें प्रेरणादायक सबक
लिंग बाधा नहीं है - स्वॉर्ड ऑफ ऑनर का पुरस्कार केवल पुरुषों के लिए समझा जाता था। रंजीता ने साबित किया कि शारीरिक और मानसिक दक्षता लिंग पर निर्भर नहीं करती।
स्थिर नौकरी छोड़ने का साहस - अच्छी सैलरी की नौकरी छोड़कर अनिश्चित रास्ते पर चलना आसान नहीं है। रंजीता ने दिखाया कि अगर सपना बड़ा हो, तो जोखिम लेना जरूरी है।
ग्रामीण क्षेत्र की बेटियां भी बना सकती हैं इतिहास - रंजीता ने साबित किया कि संसाधनों की कमी कभी भी सफलता में बाधा नहीं बन सकती यदि इच्छाशक्ति प्रबल हो।
उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो थोड़ी सी विफलता पर कहता है - अब नहीं होगा, बहुत देर हो चुकी है या मुझसे नहीं होगा। रंजीता शर्मा कहती हैं कि सिर्फ एक चीज है जो सफलता और असफलता के बीच का अंतर तय करती है - वह है हार न मानने की जिद।
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