छोटे से गांव से UPSC रैंक 62 तक का सफर, आईएएस जोगाराम की कहानी
Jageshwar prasad | Apr 20, 2026, 16:20 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान कैडर के आईएएस जोगाराम की कहानी गुदड़ी के लाल की तरह है। न कोई कोचिंग और न ही शहरों जैसे संसाधन। बहुत पहले अभावों में रहकर उन्होंने आईएएस बनने का सफर पूरा किया।
राजस्थान के पश्चिमी छोर पर बसा बाड़मेर जिले का एक छोटा सा गांव है गंगाला। भारत-पाक सीमा से महज 60 किलोमीटर दूर यह गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से दूर है। 2017 तक यहां मोबाइल नेटवर्क भी नहीं पहुंचा था।
ऐसे गांव में जन्मे एक साधारण ग्राम सेवक ने बिना कोचिंग और बिना किसी बड़े शहर के संसाधनों के संघर्ष की जो मिसाल कायम की, वह किसी फिल्मी प्रेरणा से कम नहीं है।
यह कहानी है आईएएस जोगाराम जांगिड़ की है, जो आज राजस्थान के बेहद शांत और मेहनती आईएएस अफसरों में गिने जाते हैं। उन्होंने जयपुर, दौसा, भरतपुर, कोटा और झुंझुनू जैसे जिलों में कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद को सुशोभित किया। वर्तमान में राजस्थान सरकार के सचिव और पंचायतीराज आयुक्त हैं।
17 जनवरी 1981 को अर्जुनराम जांगिड़ के घर पहली संतान के रूप में जोगाराम का जन्म हुआ। परिवार की पुश्तैनी आजीविका फर्नीचर का काम थी, लेकिन जोगाराम की रुचि बचपन से ही किताबों में अधिक थी। गांव के सरकारी स्कूल से उनकी शुरूआती पढ़ाई हुई, फिर बाड़मेर के स्कूल में आगे की पढ़ाई की।
छोटी-सी उम्र में ही उनके अंदर कुछ अलग करने की चाह थी, लेकिन रास्ता आसान नहीं था। गांव में अखबार दो दिन बाद आता था, रोजगार समाचार तो एक हफ्ते बाद हाथ लगता था। न तो कोचिंग संस्थान थे, न इंटरनेट, न ही कोई मार्गदर्शक। फिर भी जोगाराम ने पढ़ाई पूरी लगन के साथ की।
वर्ष 1999 में 12वीं पास करने के बाद जोगाराम की ग्राम सेवक के रूप में सरकारी नौकरी लग गई। पोस्टिंग अपनी ही पंचायत समिति के सेतरउ गांव में मिली। एक ऐसी सरकारी नौकरी, जिसे अक्सर लोग स्थायित्व समझकर आगे बढ़ने का सपना छोड़ देते हैं, लेकिन जोगाराम ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनाया।
ग्राम सेवक रहते हुए भी उन्होंने स्वयंपाठी (प्राइवेट) विद्यार्थी के रूप में कॉलेज की पढ़ाई जारी रखी। इसी दौरान उनके मन में यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा पास करने का जुनून पनपने लगा। उनके छोटे भाई नाथूराम जांगिड़ (जो सरपंच रहे हैं) बताते हैं कि जोगाराम ने करीब पांच साल बाड़मेर में ही रहकर तैयारी की।
आज के दौर में यूपीएससी की तैयारी के लिए लाखों रुपये की कोचिंग, ऑनलाइन स्टडी मटेरियल और मेंटरशिप को जरूरी माना जाता है, लेकिन जोगाराम ने इनमें से किसी का सहारा नहीं लिया। उनका सहारा बाड़मेर का पुस्तकालय, किताबें, अखबार और रेडियो पर बीबीसी की खबरें थीं।
वह रोजाना दो दिन पुराने अखबार पढ़ते, रेडियो पर करेंट अफेयर्स सुनते और अपने हाथों से करंट अफेयर्स के नोट्स बनाते। गाँव की मिट्टी में पले-बढ़े जोगाराम ने यह साबित कर दिया कि संसाधनों की कमी कभी इच्छाशक्ति के आगे नहीं टिकती।
वर्ष 2005 का यूपीएससी का नतीजा आया। जोगाराम ने 62वीं रैंक हासिल की और भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के लिए चयनित हुए। बाड़मेर जिले से आईएएस बनने वाले वह दूसरे व्यक्ति थे। ललित पंवार बाड़मेर जिले से आने वाले पहले आईएएस थे।
लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि उनके गांव गंगाला के कई लोगों को तब यह भी पता नहीं था कि आईएएस क्या होता है। कुछ ने तो यह समझ लिया था कि जोगाराम का ग्राम सेवक से अफसर बनना सिर्फ प्रमोशन है।
उनकी पहली फुल साइज की तस्वीर भी तब खिंची थी, जब वह आईएएस बने। इससे पहले केवल फॉर्म के लिए पासपोर्ट साइज फोटो ही खिंचवाई थी।
जोगाराम के संघर्ष में उनके परिवार की भूमिका भी कम अहम नहीं है। पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े जोगाराम ने अपने छोटे भाई शंकर जांगिड़ को भी प्रेरित किया, जिनका वर्ष 2013 में आईआरएस अधिकारी (इंडियन रेवेन्यू सर्विस) के रूप में चयन हुआ। मझले भाई नाथूराम आज गांव के सरपंच हैं और विकास कार्यों में जुटे हैं।
वर्ष 2001 में जोगाराम का विवाह मोहरी देवी से हुआ। उनके दो बच्चे हैं बेटे का नाम अमृत है और बेटी का नाम शीतल। उनका परिवार सादगी की मिसाल है।
![जोगाराम जांगिड़ की कहानी की सीखें]()
आईएएस बनने के बाद भी जोगाराम ने अपनी जड़ों से नाता नहीं तोड़ा। वह गांव के हर शुभ अवसर जैसे शादी, जागरण, पारिवारिक समारोह आदि में शामिल होते हैं। उनके गांव में आज भी बुनियादी सुविधाएं सीमित हैं, लेकिन जोगाराम की सफलता ने पूरे क्षेत्र में पढ़ाई की एक नई लहर पैदा कर दी है।
जोगाराम जांगिड़ की यह कहानी सिर्फ एक आईएएस अधिकारी की जीवनी नहीं, बल्कि उस अटूट संकल्प और जुनून की मिसाल है जो संसाधनों की कमी, भौगोलिक विकटता और अभावों के बीच भी मंज़िल पा सकता है।
उन्होंने साबित किया कि सफलता के लिए कोचिंग या शहर के बड़े संसाधन नहीं, बल्कि लगन, अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति सबसे बड़ा जरिया होती है।
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ऐसे गांव में जन्मे एक साधारण ग्राम सेवक ने बिना कोचिंग और बिना किसी बड़े शहर के संसाधनों के संघर्ष की जो मिसाल कायम की, वह किसी फिल्मी प्रेरणा से कम नहीं है।
यह कहानी है आईएएस जोगाराम जांगिड़ की है, जो आज राजस्थान के बेहद शांत और मेहनती आईएएस अफसरों में गिने जाते हैं। उन्होंने जयपुर, दौसा, भरतपुर, कोटा और झुंझुनू जैसे जिलों में कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद को सुशोभित किया। वर्तमान में राजस्थान सरकार के सचिव और पंचायतीराज आयुक्त हैं।
बचपन से पढ़ाई की ललक
छोटी-सी उम्र में ही उनके अंदर कुछ अलग करने की चाह थी, लेकिन रास्ता आसान नहीं था। गांव में अखबार दो दिन बाद आता था, रोजगार समाचार तो एक हफ्ते बाद हाथ लगता था। न तो कोचिंग संस्थान थे, न इंटरनेट, न ही कोई मार्गदर्शक। फिर भी जोगाराम ने पढ़ाई पूरी लगन के साथ की।
ग्राम सेवक से यूपीएससी तक का सफर
ग्राम सेवक रहते हुए भी उन्होंने स्वयंपाठी (प्राइवेट) विद्यार्थी के रूप में कॉलेज की पढ़ाई जारी रखी। इसी दौरान उनके मन में यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा पास करने का जुनून पनपने लगा। उनके छोटे भाई नाथूराम जांगिड़ (जो सरपंच रहे हैं) बताते हैं कि जोगाराम ने करीब पांच साल बाड़मेर में ही रहकर तैयारी की।
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बिना कोचिंग, सिर्फ किताबों और रेडियो के सहारे
वह रोजाना दो दिन पुराने अखबार पढ़ते, रेडियो पर करेंट अफेयर्स सुनते और अपने हाथों से करंट अफेयर्स के नोट्स बनाते। गाँव की मिट्टी में पले-बढ़े जोगाराम ने यह साबित कर दिया कि संसाधनों की कमी कभी इच्छाशक्ति के आगे नहीं टिकती।
वह दिन जब सपना बना हकीकत
लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि उनके गांव गंगाला के कई लोगों को तब यह भी पता नहीं था कि आईएएस क्या होता है। कुछ ने तो यह समझ लिया था कि जोगाराम का ग्राम सेवक से अफसर बनना सिर्फ प्रमोशन है।
उनकी पहली फुल साइज की तस्वीर भी तब खिंची थी, जब वह आईएएस बने। इससे पहले केवल फॉर्म के लिए पासपोर्ट साइज फोटो ही खिंचवाई थी।
परिवार के अन्य सदस्यों को भी किया प्रेरित
वर्ष 2001 में जोगाराम का विवाह मोहरी देवी से हुआ। उनके दो बच्चे हैं बेटे का नाम अमृत है और बेटी का नाम शीतल। उनका परिवार सादगी की मिसाल है।
जोगाराम जांगिड़ की कहानी की सीखें
गांव से सीख, गाँव के लिए समर्पण
जोगाराम जांगिड़ की यह कहानी सिर्फ एक आईएएस अधिकारी की जीवनी नहीं, बल्कि उस अटूट संकल्प और जुनून की मिसाल है जो संसाधनों की कमी, भौगोलिक विकटता और अभावों के बीच भी मंज़िल पा सकता है।
उन्होंने साबित किया कि सफलता के लिए कोचिंग या शहर के बड़े संसाधन नहीं, बल्कि लगन, अनुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति सबसे बड़ा जरिया होती है।
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