कैसे आरएसएस ने ममता के किले में सेंध लगाई और बीजेपी के लिए बनाया रास्ता
Rajesh Lahoti | May 11, 2026, 17:35 IST
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बंगाल में बीजेपी सिर्फ चुनाव नहीं लड़ रही थी… उसके पीछे संघ परिवार का पूरा सामाजिक और संगठन से जुड़ा तंत्र बेहतरीन मैनेजमेंट के साथ मैदान में था। चुनाव के समय यही नेटवर्क बीजेपी के लिए शक्तिशाली बूथ मशीनरी में तब्दील हुआ।
पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझना आसान नहीं है। यह वह राज्य है जहां कभी वामपंथ का कैडर मॉडल अजेय माना जाता था और बाद में ममता बनर्जी ने उसी आक्रामक जमीनी राजनीति के दम पर तृणमूल कांग्रेस का साम्राज्य खड़ा किया। वहीं देखा जाए तो पिछले कुछ वर्षों में बंगाल की राजनीति में एक और संगठित ताकत धीरे-धीरे उभरी। वह है आरएसएस और उसके अनुषंगी संगठनों का नेटवर्क।
बीजेपी की चुनावी सफलता को अक्सर नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, अमित शाह की रणनीति या हिंदुत्व की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। वहीं बंगाल के अंदरूनी राजनीतिक ढांचे को देखने वाले जानते हैं कि असली लड़ाई बूथ, बस्ती, कॉलेज, मंदिर, आदिवासी इलाकों और सीमा क्षेत्रों में लड़ी गई। यह काम अकेली बीजेपी नहीं कर सकती थी। यहीं RSS के अनुषंगी संगठनों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। संघ परिवार से जुड़े दर्जनों संगठन वर्षों से बंगाल में सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और धार्मिक स्तर पर सक्रिय रहे। चुनाव आते-आते यही नेटवर्क बीजेपी के लिए एक विशाल जमीनी मशीनरी में बदल गया।
आरएसएस ने बंगाल में सीधे वोट मांगने से पहले समाज के भीतर जगह बनाई। शाखा, सेवा कार्य, सांस्कृतिक कार्यक्रम, शिक्षा अभियान, धार्मिक आयोजन, युवा संपर्क और आदिवासी क्षेत्रों में काम। इन सबने धीरे-धीरे एक ऐसा माहौल तैयार किया जहाँ बीजेपी को जमीन मिली।संघ परिवार के लगभग 13 प्रमुख अनुषंगी संगठनों में से अधिकांश ने बंगाल में अलग-अलग मोर्चों पर सक्रिय भूमिका निभाई। हर संगठन का अपना लक्ष्य था, अपना वर्ग था और अपनी रणनीति थी। यही कारण है कि बंगाल में बीजेपी का अभियान सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि बहुस्तरीय सामाजिक अभियान बन गया।
कॉलेज कैंपस में वैचारिक कब्जे में इस संगठन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंगाल के कॉलेज और विश्वविद्यालय लंबे समय तक वामपंथी छात्र संगठनों के पास रहे। वहीं पिछले कुछ वर्षों में एबीवीपी ने यहाँ आक्रामक विस्तार किया। जादवपुर विश्वविद्यालय, प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी और कई जिला कॉलेजों में एबीवीपी ने राष्ट्रवाद, भ्रष्टाचार विरोध और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दों को उठाया। सोशल मीडिया और कैंपस अभियानों के जरिए युवा वर्ग में बीजेपी समर्थक सोच तैयार की गई। चुनाव के दौरान एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने पहली बार वोट डालने वाले युवाओं तक पहुंच बनाई। डिजिटल प्रचार, बाइक रैली, छोटे समूहों की चर्चा और सोशल मीडिया वार रूम।इन सबमें एबीवीपी की बड़ी भूमिका रही। यही कारण है कि बीजेपी को बंगाल में युवा वोट सबसे ज़्यादा मिले। उसके पीछे एबीवीपी की लंबी तैयारी थी।
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बंगाल में ट्रेड यूनियन राजनीति लंबे समय तक वामपंथियों की ताकत रही। फैक्ट्री, बंदरगाह, परिवहन और औद्योगिक क्षेत्रों में सीपीएम समर्थित यूनियनों का दबदबा था।भारतीय मजदूर संघ ने धीरे-धीरे श्रमिक वर्ग के बीच अपनी पकड़ बनाई। उसने मजदूर हितों के साथ राष्ट्रवादी विमर्श को जोड़ा।हावड़ा, दुर्गापुर, आसनसोल और औद्योगिक बेल्ट में बीएमएस ने ऐसे मजदूरों को साधा जो वामपंथ से निराश थे। चुनाव के दौरान इन क्षेत्रों में संगठन ने बीजेपी के लिए कैडर सपोर्ट दिया।
बंगाल के ग्रामीण इलाकों में किसान असंतोष, कटमनी, स्थानीय भ्रष्टाचार और पंचायत राजनीति बड़े मुद्दे थे। भारतीय किसान संघ ने छोटे किसानों, ग्रामीण हिंदू समाज और सीमावर्ती इलाकों में लगातार बैठकें कीं। संगठन ने किसान हितों के साथ ग्रामीण हिंदू एकजुटता का संदेश भी फैलाया।चुनाव के समय यही नेटवर्क बूथ प्रबंधन और ग्रामीण वोट जुटाने में काम आया।
अगर बंगाल चुनाव का सबसे बड़ा सामाजिक प्रयोग किसी संगठन ने किया, तो वह वनवासी कल्याण आश्रम था।जंगलमहल और आदिवासी क्षेत्रों में इस संगठन ने वर्षों तक शिक्षा, स्वास्थ्य शिविर, छात्रावास और सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाए। आदिवासी युवाओं को राष्ट्रवादी पहचान से जोड़ने की कोशिश की गई। संगठन ने स्थानीय भाषाओं और संस्कृति को भी अपने अभियान का हिस्सा बनाया। जब चुनाव आया, तो यही इलाका बीजेपी के लिए मजबूत वोट बैंक बन गया।
राम नवमी, हनुमान जयंती और दुर्गा पूजा जैसे आयोजनों को बंगाल में बड़े राजनीतिक प्रतीक में बदलने में वीएचपी की अहम भूमिका रही। वीएचपी ने धार्मिक शोभायात्राओं, मंदिर समितियों और स्थानीय हिंदू संगठनों के जरिए हिंदू पहचान आधारित लामबंदी की। राज्य में जब भी धार्मिक तनाव या विवाद सामने आया, वीएचपी ने उसे हिंदू अस्मिता के सवाल के रूप में पेश किया।इससे बीजेपी को एक मजबूत भावनात्मक मुद्दा मिला।
बजरंग दल ने बंगाल में युवाओं के बीच आक्रामक हिंदुत्व आधारित नेटवर्क खड़ा किया। राम नवमी की रैलियों, धार्मिक आयोजनों और स्थानीय विवादों में बजरंग दल की सक्रिय मौजूदगी दिखाई दी। सोशल मीडिया पर भी संगठन ने छोटे वीडियो, स्थानीय भाषा के संदेश और धार्मिक पहचान वाले कंटेंट के जरिए युवाओं को प्रभावित किया।
सेवा भारती ने बंगाल के गरीब इलाकों, स्लम और सीमावर्ती क्षेत्रों में राहत कार्य, स्वास्थ्य शिविर और शिक्षा सहायता कार्यक्रम चलाए।
कोविड काल के दौरान संगठन की सक्रियता ने कई जगह बीजेपी और संघ परिवार की सकारात्मक छवि बनाई। जहां राजनीतिक भाषण असर नहीं करते थे, वहां सेवा मॉडल ने काम किया।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत महिला वोटर मानी जाती रही हैं। इस ताकत को तोड़ने के लिए संघ परिवार ने इस क्षेत्र में भी धीरे-धीरे काम किया।राष्ट्र सेविका समिति ने महिलाओं के बीच सांस्कृतिक कार्यक्रम, परिवार जागरूकता अभियान और सुरक्षा मुद्दों पर संपर्क बढ़ाया।कई जगह महिलाओं को बूथ स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ता बनाया गया।
विद्या भारती से जुड़े स्कूलों और शैक्षणिक गतिविधियों ने बंगाल में वैचारिक जमीन तैयार करने का काम किया।छात्रों और अभिभावकों के बीच राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति और सांस्कृतिक गौरव के संदेश को मजबूत किया गया।
बंगाल सांस्कृतिक चेतना वाला राज्य है। इसे समझते हुए संस्कार भारती ने कला, संगीत, नाटक और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए अपनी पैठ बनाई।रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिमचंद्र और स्वामी विवेकानंद जैसे प्रतीकों को राष्ट्रवादी व्याख्या के साथ प्रस्तुत किया गया।
स्थानीय उद्योग, छोटे व्यापार और स्वदेशी मॉडल को लेकर संगठन ने व्यापारिक समुदाय के बीच काम किया।कोलकाता और व्यापारिक जिलों में छोटे कारोबारियों के बीच इसका असर देखने को मिला।
छोटे उद्योग और व्यापारी वर्ग को जोड़ने में इस संगठन ने अहम भूमिका निभाई। बंगाल के कारोबारी तबके में स्थिर शासन और राजनीतिक हिंसा से मुक्ति का संदेश दिया गया।
हालांकि बंगाल में इसका प्रभाव सीमित रहा, लेकिन संगठन ने कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों और सीमावर्ती क्षेत्रों में संपर्क अभियान चलाए।इसका उद्देश्य बीजेपी की छवि को पूरी तरह एंटी-मुस्लिम बताने वाले विपक्षी नैरेटिव को कमजोर करना था।
इन सभी संगठनों का सबसे बड़ा प्रभाव यह था कि उन्होंने अलग-अलग सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाई। छात्रों तक एबीवीपी पहुंचा। मजदूरों तक बीएमएस पहुंचा। किसानों तक पहुंचने का काम बीकेएस ने किया। आदिवासियों को समझाने का काम वनवासी कल्याण आश्रम ने किया। महिलाओं तक राष्ट्र सेविका समिति पहुंची। धार्मिक वर्ग को वीएचपी ने साधा। युवाओं तक आक्रामक नेटवर्क के जरिये बजरंग दल पहुंचा। यानी बीजेपी को हर वर्ग तक पहुँचाने के लिए संघ परिवार ने समानांतर सामाजिक मशीनरी खड़ी कर दी।
बंगाल में चुनाव (bangal election) सिर्फ भाषणों से नहीं जीते जाते। यहां बूथ पर टिकने वाला कार्यकर्ता चाहिए।संघ परिवार ने यही किया। जहां बीजेपी का स्थानीय संगठन कमजोर था, संघ के स्वयंसेवकों ने खुद मोर्चा संभाला। कई जगहों पर चुनावी हिंसा के बावजूद कार्यकर्ता डटे रहे।राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बंगाल में बीजेपी की असली ताकत उसका कैडराइजेशन है और यह मॉडल पूरी तरह संघ आधारित है।
बंगाल में बीजेपी की जीत सिर्फ राजनीतिक नहीं, संगठनात्मक विजय थी।पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सफलता को सिर्फ मोदी लहर या हिंदुत्व की राजनीति कह देना अधूरा विश्लेषण होगा।असल कहानी यह है कि आरएसएस और उसके अनुषंगी संगठनों ने वर्षों तक बंगाल की सामाजिक जमीन पर काम किया। चुनाव आया तो वही नेटवर्क वोट में बदल गया। बीजेपी मंच पर दिखाई दे रही थी, लेकिन उसके पीछे संघ परिवार की पूरी संगठनात्मक सेना काम कर रही थी।बंगाल में कमल सिर्फ चुनावी प्रचार से नहीं खिला… उसे संघ परिवार के हजारों कार्यकर्ताओं ने बूथ-बूथ सींचा हैं।
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बीजेपी की चुनावी सफलता को अक्सर नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, अमित शाह की रणनीति या हिंदुत्व की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। वहीं बंगाल के अंदरूनी राजनीतिक ढांचे को देखने वाले जानते हैं कि असली लड़ाई बूथ, बस्ती, कॉलेज, मंदिर, आदिवासी इलाकों और सीमा क्षेत्रों में लड़ी गई। यह काम अकेली बीजेपी नहीं कर सकती थी। यहीं RSS के अनुषंगी संगठनों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। संघ परिवार से जुड़े दर्जनों संगठन वर्षों से बंगाल में सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और धार्मिक स्तर पर सक्रिय रहे। चुनाव आते-आते यही नेटवर्क बीजेपी के लिए एक विशाल जमीनी मशीनरी में बदल गया।
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असली ताकत: अलग-अलग संगठन, एक लक्ष्य
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बंगाल में बीजेपी की जीत सिर्फ राजनीतिक नहीं, संगठनात्मक विजय थी।पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सफलता को सिर्फ मोदी लहर या हिंदुत्व की राजनीति कह देना अधूरा विश्लेषण होगा।असल कहानी यह है कि आरएसएस और उसके अनुषंगी संगठनों ने वर्षों तक बंगाल की सामाजिक जमीन पर काम किया। चुनाव आया तो वही नेटवर्क वोट में बदल गया। बीजेपी मंच पर दिखाई दे रही थी, लेकिन उसके पीछे संघ परिवार की पूरी संगठनात्मक सेना काम कर रही थी।बंगाल में कमल सिर्फ चुनावी प्रचार से नहीं खिला… उसे संघ परिवार के हजारों कार्यकर्ताओं ने बूथ-बूथ सींचा हैं।
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