चीन की यूनिवर्सिटी क्रांति और भारत की अधूरी तैयारी
Rajesh Lahoti | Jul 30, 2026, 18:47 IST
चीन की यूनिवर्सिटी क्रांति
चीन ने पिछले तीन दशकों में उच्च शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का मजबूत आधार बनाया है। उसने विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय, मजबूत रिसर्च और उद्योग-अकादमिक साझेदारी पर लगातार निवेश किया। भारत के लिए यह बड़ी सीख है।
परीक्षा की शुचिता से लेकर एआई तक, दुनिया की शिक्षा व्यवस्था में चीन ने जिस तरह छलांग लगाई, भारत के सामने अब सिर्फ सुधार नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था बदलने की चुनौती है। भारत में उच्च शिक्षा पर बहस अक्सर सीटों की संख्या, नई यूनिवर्सिटी, कॉलेजों की इमारतों और परीक्षाओं में होने वाली गड़बड़ियों तक सिमट जाती है। वहीं दुनिया के दूसरे छोर पर चीन ने पिछले तीन दशकों में उच्च शिक्षा को सिर्फ विस्तार देने का काम नहीं किया, बल्कि उसे राष्ट्रीय शक्ति के सबसे महत्वपूर्ण औजारों में बदल दिया। आज चीन की यूनिवर्सिटी दुनिया की शीर्ष संस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। रिसर्च में अरबों डॉलर लगा रही हैं और AI, रोबोटिक्स, बायोटेक्नोलॉजी, मटेरियल साइंस, ऊर्जा और कृषि जैसी रणनीतिक तकनीकों को आगे बढ़ा रही हैं।
भारत के लिए चीन की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों की चुनौती लगभग एक जैसी है। विशाल युवा आबादी, असमान सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियां, करोड़ों विद्यार्थियों की शिक्षा की जरूरत और दुनिया की अगली आर्थिक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा। अंतर सिर्फ इतना है कि चीन ने उच्च शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा बनाया, जबकि भारत अभी भी परीक्षा, प्रवेश, डिग्री और रोजगार के बीच फंसा हुआ दिखाई देता है।
भारत में नीट जैसी परीक्षाओं को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर बहस छेड़ी है। हालांकि असली सवाल इससे कहीं बड़ा है। सवाल यह है कि क्या भारत ऐसी उच्च शिक्षा व्यवस्था तैयार कर सकता है जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के बराबर खड़ी हो और देश की आर्थिक, तकनीकी तथा सामाजिक जरूरतों को पूरा कर सके?
चीन की सफलता को समझने के लिए सबसे पहले उसकी स्कूली शिक्षा को देखना होगा। 20वीं सदी के अंतिम वर्षों तक चीन ने अनिवार्य शिक्षा को बड़े पैमाने पर सार्वभौमिक बनाया। इसका अर्थ था कि विश्वविद्यालयों के लिए आने वाले विद्यार्थियों का आधार धीरे-धीरे मजबूत होता गया। यही पहला सबक भारत के लिए है। विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय अचानक नहीं बनते। उनकी नींव प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में तैयार होती है। भारत में आज भी सरकारी और निजी स्कूलों के बीच गुणवत्ता का बड़ा अंतर है। कई जगह स्कूल में शिक्षक हैं लेकिन पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं। भवन है लेकिन प्रयोगशाला नहीं। किताबें हैं लेकिन सीखने का वातावरण नहीं।
ऐसे में विश्वविद्यालयों से विश्वस्तरीय शोध और नवाचार की उम्मीद करना वैसा ही है जैसे कमजोर नींव पर गगनचुंबी इमारत बनाने की कोशिश। चीन ने धीरे-धीरे स्कूल शिक्षा में पहुंच और गुणवत्ता बढ़ाई और फिर उच्च शिक्षा के बड़े विस्तार की ओर बढ़ा। भारत को भी इसी क्रम को समझना होगा। दूसरी बड़ी सीख है हर विश्वविद्यालय को एक जैसा बनाने की जरूरत नहीं है। चीन ने अपनी उच्च शिक्षा व्यवस्था में चयनित संस्थानों को विशेष संसाधन दिए। इसका सबसे चर्चित उदाहरण प्रोजेक्ट 211 और प्रोजेक्ट 985 रहे।
इनके जरिए कुछ चुनिंदा विश्वविद्यालयों को बड़े पैमाने पर वित्तीय और संस्थागत समर्थन दिया गया ताकि वे विश्वस्तरीय संस्थाओं से प्रतिस्पर्धा कर सकें। बाद में इसी सोच को आगे बढ़ाया गया। नतीजा सामने है। 2004 में चीन का कोई भी विश्वविद्यालय दुनिया के शीर्ष 100 में नहीं था। बाद के वर्षों में चीन की कई यूनिवर्सिटी वैश्विक रैंकिंग के शीर्ष स्तर तक पहुंचीं। आज त्सिंगहुआ विश्वविद्यालय और पीकिंग विश्वविद्यालय (बीजिंग विश्वविद्यालय) जैसी संस्थाएं दुनिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों के साथ प्रतिस्पर्धा करती हैं।
यहां भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबक छिपा है। भारत अक्सर यह मानने की कोशिश करता है कि हर विश्वविद्यालय को समान तरीके से विकसित किया जाए, लेकिन संसाधन सीमित हैं। इसलिए रणनीतिक प्राथमिकता जरूरी है। देश को 50-100 ऐसे विश्वविद्यालय और संस्थानों की पहचान करनी होगी जिनमें विश्वस्तरीय रिसर्च की वास्तविक क्षमता है और उन्हें लंबी अवधि के लिए संसाधन, स्वतंत्रता और स्पष्ट लक्ष्य देने होंगे। हर विश्वविद्यालय आईआईटी नहीं बन सकता और हर कॉलेज ऑक्सफ़ोर्ड बनने की कोशिश करे, यह भी जरूरी नहीं। भारत को कम से कम कुछ दर्जन ऐसे विश्वविद्यालय जरूर चाहिए जो एमआईटी, हार्वर्ड, स्टेनफोर्ड, त्सिंगहुआ और दूसरे वैश्विक संस्थानों से सीधे मुकाबला कर सकें।
भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार हुआ है। विश्वविद्यालय और कॉलेज बढ़े हैं। विद्यार्थियों की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन संख्या और गुणवत्ता एक ही चीज नहीं हैं। भारत को इंजीनियर चाहिए, डॉक्टर चाहिए, वैज्ञानिक चाहिए, डेटा विशेषज्ञ चाहिए, डिजाइनर चाहिए, शिक्षक चाहिए और उद्यमी चाहिए। उससे भी ज्यादा जरूरत ऐसे लोगों की है जो नई समस्या को पहचानकर उसका समाधान खोज सकें। यही अंतर ब्रेड्थ और डेप्थ का है। भारत में व्यापक शिक्षा जरूरी है, लेकिन उसके साथ कुछ संस्थानों में अत्यधिक गहराई वाली विशेषज्ञता भी विकसित करनी होगी। AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, बायोटेक्नोलॉजी, एडवांस्ड मटेरियल, ऊर्जा भंडारण, जलवायु विज्ञान, रोबोटिक्स और रक्षा तकनीक जैसे क्षेत्रों में भारत को केवल हजारों डिग्रीधारी नहीं चाहिए। उसे ऐसे शोधकर्ता चाहिए जो दुनिया की अगली तकनीक बना सकें।
चीन की अगली महत्वपूर्ण रणनीति विश्वविद्यालय और उद्योग के बीच मजबूत संबंध बनाना रही है। वहां कई प्रमुख विश्वविद्यालयों का संबंध औद्योगिक क्लस्टर्स और रणनीतिक तकनीकी मिशनों से जोड़ा गया। इसका सीधा फायदा हुआ। विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में पैदा होने वाला ज्ञान सिर्फ शोधपत्र तक सीमित नहीं रहा। वह उद्योग, उत्पाद और तकनीक में बदलने लगा। भारत में यह संबंध अभी भी कमजोर है। कई विश्वविद्यालयों में शोध होता है, लेकिन उसका उद्योग तक पहुंचना कठिन है।
दूसरी तरफ उद्योग को जिस तरह के कौशल की जरूरत है, विश्वविद्यालय कई बार उसी दिशा में पाठ्यक्रम विकसित नहीं करते। नतीजा यह निकलता है कि एक तरफ बेरोजगार डिग्रीधारी और दूसरी तरफ कंपनियों को योग्य कर्मचारी नहीं मिलते। यह विरोधाभास खत्म करना होगा। विश्वविद्यालयों को उद्योग की जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह चलाना भी गलत होगा, क्योंकि विश्वविद्यालय का काम सिर्फ बाजार के लिए कर्मचारी तैयार करना नहीं है, लेकिन उद्योग, विश्वविद्यालय और सरकार के बीच मजबूत साझेदारी जरूरी है।
चीन की व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं। वहां अत्यधिक केंद्रीकरण और अकादमिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठते हैं। भारत को उसका मॉडल हूबहू अपनाने की जरूरत नहीं है। भारत को चीन से सीखते समय यह भी समझना होगा कि क्या नहीं अपनाना है। भारत के लिए बेहतर रास्ता हो सकता है रणनीतिक निवेश के साथ अकादमिक स्वतंत्रता। विश्वविद्यालयों को यह तय करने की आजादी मिलनी चाहिए कि वे किस क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करना चाहते हैं, किन शोध परियोजनाओं पर काम करना चाहते हैं और किन अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ साझेदारी करना चाहते हैं, लेकिन स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। अगर सरकार किसी विश्वविद्यालय को हजारों करोड़ रुपए देती है तो सवाल भी होना चाहिए कि उससे कितने पेटेंट आए, कितनी नई तकनीक विकसित हुई, कितने शोधपत्र उच्च गुणवत्ता वाले जर्नल में प्रकाशित हुए, कितने स्टार्टअप निकले और कितने वैश्विक सहयोग बने। स्वायत्तता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं है।
नीट या किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में पेपर लीक, गड़बड़ी या प्रशासनिक लापरवाही जैसी घटनाएं सिर्फ परीक्षा की समस्या नहीं हैं। यह पूरे शिक्षा तंत्र में विश्वास की समस्या पैदा करती हैं। अगर विद्यार्थी यह मानने लगे कि मेहनत से ज्यादा व्यवस्था में पहुंच महत्वपूर्ण है, तो शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी विश्वास खत्म हो जाता है। यही कारण है कि परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से मजबूत करना होगा। प्रश्नपत्र सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, डेटा सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी और जिम्मेदारी पूर्ण व्यवस्था मजबूत करनी होगी। यहां यह ध्यान रखना जरुरी है कि परीक्षा को सुरक्षित बना देना शिक्षा व्यवस्था को उत्कृष्ट नहीं बनाता। एक पूरी तरह सुरक्षित परीक्षा भी उस विद्यार्थी को ऐसी शिक्षा नहीं दे सकती जो उसे नई खोज करने, सवाल पूछने और समस्या हल करने के लिए तैयार करे। भारत को परीक्षा सुधार के साथ शिक्षा सुधार करना होगा।
चीन ने हाल के वर्षों में विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों को तेजी से बदलने की दिशा में कदम उठाए हैं। कमजोर मांग वाले या गुणवत्ता में गिरावट वाले कार्यक्रमों को हटाने और नई तकनीकों से जुड़े विषयों को बढ़ाने पर जोर दिया गया। भारत में आज भी कई जगह ऐसे पाठ्यक्रम चल रहे हैं जिनका उद्योग और भविष्य की तकनीकी जरूरतों से सीमित संबंध है। दूसरी तरफ एआई इतनी तेजी से बदल रहा है कि विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम कई बार बाजार से पीछे रह जाता है। अब यह सवाल नहीं है कि कंप्यूटर साइंस पढ़ाया जाए या नहीं। सवाल यह है कि एआई के दौर में कंप्यूटर साइंस कैसे पढ़ाया जाए। एआई को सिर्फ एक अलग विषय बनाकर समस्या हल नहीं होगी। इंजीनियरिंग, मेडिकल, कानून, पत्रकारिता, कृषि, अर्थशास्त्र और डिजाइन यानी हर क्षेत्र में एआई की भूमिका बढ़ेगी, इसलिए एआई एजुकेशन को पूरे उच्च शिक्षा तंत्र में शामिल करना होगा। एआई भारत के लिए खतरा नहीं, शिक्षा सुधार का सबसे बड़ा अवसर भी है। भारत के सामने एक असाधारण अवसर है। एआई शिक्षकों का विकल्प नहीं है, लेकिन यह अच्छे शिक्षक की क्षमता को कई गुना बढ़ा सकता है। व्यक्तिगत सीखने, भाषा अनुवाद, शोध सहायता, डेटा विश्लेषण और कमजोर विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त सहायता जैसे क्षेत्रों में एआई बड़ी भूमिका निभा सकता है। इसके साथ जोखिम भी है। अगर विश्वविद्यालय एआई को समझे बिना सिर्फ एआई टूल्स के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने लगेंगे, तो वे समस्या का समाधान नहीं करेंगे।
भारत के लिए अब एक स्पष्ट राष्ट्रीय लक्ष्य होना चाहिए। अगले 10-15 वर्षों में कम से कम 50 से 100 विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय शोध संस्थानों में बदलने की योजना बनाई जा सकती है, लेकिन सिर्फ रैंकिंग के लिए नहीं। इन संस्थानों को अलग-अलग रणनीतिक क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी जा सकती है। किसी को AI और कंप्यूटिंग, किसी को सेमीकंडक्टर, किसी को बायोटेक्नोलॉजी, किसी को ऊर्जा, किसी को जलवायु विज्ञान, किसी को कृषि तकनीक और किसी को रक्षा तकनीक में उत्कृष्टता हासिल करने का लक्ष्य दिया जाए। इन विश्वविद्यालयों को पर्याप्त फंडिंग, प्रशासनिक स्वायत्तता और वैश्विक प्रतिभा आकर्षित करने की स्वतंत्रता मिले। दुनिया के श्रेष्ठ प्रोफेसरों को भारत में लाने के लिए वेतन और शोध सुविधाओं को प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। भारतीय वैज्ञानिक जो विदेशों में हैं, उन्हें वापस लाने के लिए सिर्फ भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं होगी। उन्हें बेहतर प्रयोगशालाएं, फंडिंग और स्वतंत्रता भी देनी होगी।
शिक्षा का परिणाम पांच महीने में नहीं मिलता न ही पांच साल में पूरा मिलता है। चीन की विश्वविद्यालय यात्रा कई दशकों की कहानी है। उसने संस्थानों को संसाधन दिए, उनकी क्षमता विकसित की और फिर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उतारा। भारत में समस्या यह है कि शिक्षा नीति अक्सर राजनीतिक और प्रशासनिक चक्रों में फंस जाती है। सरकार बदलती है तो प्राथमिकताएं बदलती हैं। योजना बनती है तो बजट सीमित हो जाता है। बजट मिलता है तो क्रियान्वयन धीमा पड़ जाता है।
भारत को शिक्षा में 15-20 साल की निरंतरता वाली राष्ट्रीय रणनीति चाहिए। भारत को चीन की सफलता से सीखना चाहिए, लेकिन चीन की व्यवस्था की नकल नहीं करनी चाहिए। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएं, विविधता, निजी क्षेत्र, अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में वैश्विक संपर्क और दुनिया के साथ खुला शैक्षणिक वातावरण है। भारत को इन ताकतों का इस्तेमाल करना चाहिए। चीन का केंद्रीकरण तेजी से फैसले लेने में मदद कर सकता है, लेकिन उसकी कीमत अकादमिक स्वतंत्रता हो सकती है। भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें रणनीतिक दिशा मजबूत हो लेकिन विचारों की स्वतंत्रता उससे भी मजबूत हो।
भारत ने IIT, IIM, AIIMS और दूसरे उत्कृष्ट संस्थानों के जरिए विश्वस्तरीय संस्थान बनाने की अपनी क्षमता पहले ही साबित कर दी है। समस्या यह है कि इन संस्थानों की संख्या और प्रभाव देश की विशाल जरूरतों की तुलना में अभी भी सीमित है। अब समय आ गया है कि भारत कुछ चुनिंदा संस्थानों की सफलता को पूरे उच्च शिक्षा तंत्र में फैलाए। यह काम सिर्फ नई यूनिवर्सिटी खोलकर नहीं होगा। इसके लिए शिक्षक प्रशिक्षण, शोध फंडिंग, पाठ्यक्रम सुधार, उद्योग साझेदारी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, एआई इंटीग्रेशन और सबसे बढ़कर संस्थागत स्वायत्तता की जरूरत होगी। सबसे पहले जरूरत होगी उस मानसिकता को बदलने की जिसमें शिक्षा का अंतिम लक्ष्य परीक्षा पास करना और डिग्री हासिल करना मान लिया गया है। विश्वविद्यालय का काम सिर्फ नौकरी पाने वाला युवा तैयार करना नहीं है।
उसका काम ऐसा युवा तैयार करना है जो नई नौकरी पैदा कर सके, नई तकनीक बना सके, नई समस्या का समाधान खोज सके और जरूरत पड़ने पर पूरी दुनिया को नई दिशा दे सके। चीन की विश्वविद्यालय क्रांति भारत के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि अगर भारत सिर्फ अपनी पुरानी व्यवस्था को थोड़ा-बहुत सुधारता रहा तो वैश्विक तकनीकी दौड़ में पीछे छूट सकता है। अवसर इसलिए कि भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा प्रतिभाओं में से एक है। अब फैसला यह करना है कि यह प्रतिभा सिर्फ परीक्षाओं में नंबर लाएगी या दुनिया के भविष्य की तकनीक भी बनाएगी। चीन ने विश्वविद्यालयों को राष्ट्रीय शक्ति का इंजन बना दिया है। भारत के सामने अब चुनौती है कि वह अपनी यूनिवर्सिटी को सिर्फ डिग्री बांटने वाली संस्थाओं से निकालकर ज्ञान, शोध और नवाचार की वैश्विक प्रयोगशालाओं में बदल सके। यही असली शिक्षा सुधार होगा और शायद आने वाले दशक की सबसे बड़ी राष्ट्रीय जरूरत भी।
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भारत के लिए चीन की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों की चुनौती लगभग एक जैसी है। विशाल युवा आबादी, असमान सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियां, करोड़ों विद्यार्थियों की शिक्षा की जरूरत और दुनिया की अगली आर्थिक महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा। अंतर सिर्फ इतना है कि चीन ने उच्च शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा बनाया, जबकि भारत अभी भी परीक्षा, प्रवेश, डिग्री और रोजगार के बीच फंसा हुआ दिखाई देता है।
भारत में नीट जैसी परीक्षाओं को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर बहस छेड़ी है। हालांकि असली सवाल इससे कहीं बड़ा है। सवाल यह है कि क्या भारत ऐसी उच्च शिक्षा व्यवस्था तैयार कर सकता है जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के बराबर खड़ी हो और देश की आर्थिक, तकनीकी तथा सामाजिक जरूरतों को पूरा कर सके?
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ऐसे में विश्वविद्यालयों से विश्वस्तरीय शोध और नवाचार की उम्मीद करना वैसा ही है जैसे कमजोर नींव पर गगनचुंबी इमारत बनाने की कोशिश। चीन ने धीरे-धीरे स्कूल शिक्षा में पहुंच और गुणवत्ता बढ़ाई और फिर उच्च शिक्षा के बड़े विस्तार की ओर बढ़ा। भारत को भी इसी क्रम को समझना होगा। दूसरी बड़ी सीख है हर विश्वविद्यालय को एक जैसा बनाने की जरूरत नहीं है। चीन ने अपनी उच्च शिक्षा व्यवस्था में चयनित संस्थानों को विशेष संसाधन दिए। इसका सबसे चर्चित उदाहरण प्रोजेक्ट 211 और प्रोजेक्ट 985 रहे।
इनके जरिए कुछ चुनिंदा विश्वविद्यालयों को बड़े पैमाने पर वित्तीय और संस्थागत समर्थन दिया गया ताकि वे विश्वस्तरीय संस्थाओं से प्रतिस्पर्धा कर सकें। बाद में इसी सोच को आगे बढ़ाया गया। नतीजा सामने है। 2004 में चीन का कोई भी विश्वविद्यालय दुनिया के शीर्ष 100 में नहीं था। बाद के वर्षों में चीन की कई यूनिवर्सिटी वैश्विक रैंकिंग के शीर्ष स्तर तक पहुंचीं। आज त्सिंगहुआ विश्वविद्यालय और पीकिंग विश्वविद्यालय (बीजिंग विश्वविद्यालय) जैसी संस्थाएं दुनिया के प्रमुख विश्वविद्यालयों के साथ प्रतिस्पर्धा करती हैं।
यहां भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबक छिपा है। भारत अक्सर यह मानने की कोशिश करता है कि हर विश्वविद्यालय को समान तरीके से विकसित किया जाए, लेकिन संसाधन सीमित हैं। इसलिए रणनीतिक प्राथमिकता जरूरी है। देश को 50-100 ऐसे विश्वविद्यालय और संस्थानों की पहचान करनी होगी जिनमें विश्वस्तरीय रिसर्च की वास्तविक क्षमता है और उन्हें लंबी अवधि के लिए संसाधन, स्वतंत्रता और स्पष्ट लक्ष्य देने होंगे। हर विश्वविद्यालय आईआईटी नहीं बन सकता और हर कॉलेज ऑक्सफ़ोर्ड बनने की कोशिश करे, यह भी जरूरी नहीं। भारत को कम से कम कुछ दर्जन ऐसे विश्वविद्यालय जरूर चाहिए जो एमआईटी, हार्वर्ड, स्टेनफोर्ड, त्सिंगहुआ और दूसरे वैश्विक संस्थानों से सीधे मुकाबला कर सकें।
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दूसरी तरफ उद्योग को जिस तरह के कौशल की जरूरत है, विश्वविद्यालय कई बार उसी दिशा में पाठ्यक्रम विकसित नहीं करते। नतीजा यह निकलता है कि एक तरफ बेरोजगार डिग्रीधारी और दूसरी तरफ कंपनियों को योग्य कर्मचारी नहीं मिलते। यह विरोधाभास खत्म करना होगा। विश्वविद्यालयों को उद्योग की जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह चलाना भी गलत होगा, क्योंकि विश्वविद्यालय का काम सिर्फ बाजार के लिए कर्मचारी तैयार करना नहीं है, लेकिन उद्योग, विश्वविद्यालय और सरकार के बीच मजबूत साझेदारी जरूरी है।
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भारत को शिक्षा में 15-20 साल की निरंतरता वाली राष्ट्रीय रणनीति चाहिए। भारत को चीन की सफलता से सीखना चाहिए, लेकिन चीन की व्यवस्था की नकल नहीं करनी चाहिए। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएं, विविधता, निजी क्षेत्र, अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में वैश्विक संपर्क और दुनिया के साथ खुला शैक्षणिक वातावरण है। भारत को इन ताकतों का इस्तेमाल करना चाहिए। चीन का केंद्रीकरण तेजी से फैसले लेने में मदद कर सकता है, लेकिन उसकी कीमत अकादमिक स्वतंत्रता हो सकती है। भारत को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें रणनीतिक दिशा मजबूत हो लेकिन विचारों की स्वतंत्रता उससे भी मजबूत हो।
संख्या नहीं, क्षमतावान संस्थान जरुरी
उसका काम ऐसा युवा तैयार करना है जो नई नौकरी पैदा कर सके, नई तकनीक बना सके, नई समस्या का समाधान खोज सके और जरूरत पड़ने पर पूरी दुनिया को नई दिशा दे सके। चीन की विश्वविद्यालय क्रांति भारत के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि अगर भारत सिर्फ अपनी पुरानी व्यवस्था को थोड़ा-बहुत सुधारता रहा तो वैश्विक तकनीकी दौड़ में पीछे छूट सकता है। अवसर इसलिए कि भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा प्रतिभाओं में से एक है। अब फैसला यह करना है कि यह प्रतिभा सिर्फ परीक्षाओं में नंबर लाएगी या दुनिया के भविष्य की तकनीक भी बनाएगी। चीन ने विश्वविद्यालयों को राष्ट्रीय शक्ति का इंजन बना दिया है। भारत के सामने अब चुनौती है कि वह अपनी यूनिवर्सिटी को सिर्फ डिग्री बांटने वाली संस्थाओं से निकालकर ज्ञान, शोध और नवाचार की वैश्विक प्रयोगशालाओं में बदल सके। यही असली शिक्षा सुधार होगा और शायद आने वाले दशक की सबसे बड़ी राष्ट्रीय जरूरत भी।
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