तापमान बढ़ा तो महंगी हो जाएगी रोटी! तीन डिग्री गर्मी बढ़ने पर तीन गुना तक पहुंच सकती है गेहूं की कीमत

Arun Tiwari | Oct 10, 2026, 13:49 IST
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ग्लोबल वार्मिंग का गेहूं की कीमतों पर प्रभाव<br>
ग्लोबल वार्मिंग का गेहूं की कीमतों पर प्रभाव

जलवायु परिवर्तन और सूखे का बढ़ता खतरा, दुनिया के गेहूं उत्पादन पर पड़ेगा असर, भारत में भी पैदावार घटने और कीमतें बढ़ने की आशंका है। जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल मौसम और पर्यावरण तक सीमित नहीं रह गया है। आने वाले समय में इसका सीधा असर आम आदमी की रसोई और खाने-पीने के खर्च पर पड़ेगा।

गेहूं से सिर्फ रोटी ही नहीं बनती बल्कि बिस्किट, ब्रेड जैसी कई खाने पीने की चीजें बनती हैं। इन सबकी कीमतें बढ़ जाएंगी। नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक, यदि दुनिया का औसत तापमान तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की औसत कीमत वर्ष 2010 के स्तर के मुकाबले करीब तीन गुना तक पहुंच सकती है।

यह चेतावनी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि गेहूं दुनिया की प्रमुख खाद्य फसलों में शामिल है। करोड़ों लोग अपनी रोजाना की जरूरतों के लिए इस अनाज पर निर्भर हैं। ऐसे में गेहूं की पैदावार घटने और कीमतें बढ़ने का असर किसानों से लेकर आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।

कई देशों में बढ़ेगा संकट:

वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में बताया है कि गेहूं की कीमतों पर सूखे का बड़ा असर पड़ता है। समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब दुनिया के कई प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में एक ही समय पर या लगातार कुछ वर्षों तक सूखे की स्थिति बनी रहे। उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया के कई हिस्सों में गेहूं की बड़े पैमाने पर खेती होती है। यदि इन क्षेत्रों में पानी की कमी हो जाए, तो फसल की पैदावार प्रभावित होती है। इससे बाजार में गेहूं की उपलब्धता कम हो सकती है और कीमतें बढ़ सकती हैं।

अमेरिका, यूरोप या एशिया के किसी एक क्षेत्र में फसल खराब होने का असर दूसरे देशों तक भी पहुंच सकता है। लेकिन जब कई बड़े उत्पादक क्षेत्र एक साथ सूखे की गिरफ्त में आते हैं तो इसका सीधा असर गेंहू के अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ता है। यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका ‘अर्थ्स फ्यूचर’ में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने जलवायु से जुड़े आंकड़ों, गेहूं उगाने वाले क्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनाज की कीमतों का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 2000 से 2021 के बीच गेहूं की वैश्विक कीमतों में सालाना होने वाले उतार-चढ़ाव के करीब 74 प्रतिशत हिस्से का संबंध गंभीर जल संकट से था।


तीन डिग्री तापमान बढ़ने पर कितनी होगी कीमत:

शोधकर्ताओं ने भविष्य में तापमान बढ़ने की स्थिति को समझने के लिए जलवायु मॉडल का इस्तेमाल किया। इसके आधार पर गेहूं की संभावित कीमतों का अनुमान लगाया गया है।

अध्ययन के अनुसार, वैश्विक तापमान में लगभग दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर गेहूं की औसत कीमत करीब 273 डॉलर प्रति टन तक पहुंच सकती है। वहीं, तापमान में तीन डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर यह कीमत लगभग 364 डॉलर प्रति टन तक पहुंचने का अनुमान है।यह कीमत वर्ष 2010 की महंगाई के हिसाब से समायोजित वैश्विक कीमत की तुलना में करीब तीन गुना बताई गई है। हालांकि, ये भविष्य के जलवायु परिदृश्यों पर आधारित अनुमान हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि गेहूं की कीमत निश्चित रूप से इसी स्तर तक पहुंचेगी। वास्तविक कीमतें उत्पादन, मांग, व्यापार और दूसरे आर्थिक कारणों पर भी निर्भर करेंगी।

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गेहूं, चना, सरसों समेत 6 रबी फसलों का MSP बढ़ा, जानें किसानों को अब कितना मिलेगा नया भाव
01 Oct 2026 ,
By Sumit Kumar
केंद्र सरकार ने रबी मार्केटिंग सीजन 2027-28 के लिए छह प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP में बढ़ोतरी को मंजूरी दी है। इनमें गेहूं, जौ, चना, मसूर, रेपसीड-सरसों और कुसुम शामिल हैं। सरकार के मुताबिक इन फसलों की खरीद पर कुल अनुमानित भुगतान 90 हजार 962 करोड़ रुपए रह सकता है।
केंद्र सरकार ने रबी मार्केटिंग सीजन 2027-28 के लिए छह प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP में बढ़ोतरी को मंजूरी दी है। इनमें गेहूं, जौ, चना, मसूर, रेपसीड-सरसों और कुसुम शामिल हैं। सरकार के मुताबिक इन फसलों की खरीद पर कुल अनुमानित भुगतान 90 हजार 962 करोड़ रुपए रह सकता है।

सूखे की चपेट में आ रहे गेहूं उत्पादक क्षेत्र:

अध्ययन में सामने आया कि सामान्य वर्षों में दुनिया के लगभग पांच प्रतिशत गेहूं उत्पादक क्षेत्र गंभीर जल संकट का सामना करते हैं। दुनिया के खाद्य बाजार पर इसका असर और गहरा हो सकता है। गेहूं की फसल के विकास के दौरान पर्याप्त पानी मिलना जरूरी है। लंबे समय तक बारिश न होने और मिट्टी में नमी कम होने से पौधों की बढ़वार प्रभावित होती है। इससे दाने बनने और फसल की कुल पैदावार में कमी आ सकती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में सूखे को केवल स्थानीय समस्या मानकर नहीं देखा जा सकता। इसके लिए अलग-अलग देशों को मिलकर खाद्य उत्पादन और आपूर्ति से जुड़े जोखिमों को समझना होगा।


भारत पर पड़ेगा बड़ा असर:

भारत गेंहू उत्पादक देश है ऐसे यह संकट देश पर ज्यादा असर डालेगा। देश की अधिकांश आबादी का खानपान गेंहू आधारित ही है। पंजाब, हरियाणा समेत उत्तर भारत के प्रदेशों में गेंहू की खेती का बड़ा रकबा है।

ऐसे में तापमान बढ़ने, सिंचाई के पानी की कमी और मौसम में बदलाव का असर किसानों की फसल पर पड़ सकता है। ‘वन अर्थ’ पत्रिका में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार टेम्प्रेचर 2 डिग्री बढ़ने से देश में पैदावार में 7 फीसदी की कमी हो सकती है। गेहूं की कीमतों में 36 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी का जोखिम भी जताया गया है।

यदि उत्पादन कम होता है और बाजार में मांग बनी रहती है, तो गेहूं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर आटा, ब्रेड और गेहूं से बनने वाले दूसरे खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी पड़ने की आशंका है। हालांकि, इन वस्तुओं की कीमतों में कितनी वृद्धि होगी, यह कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करेगा।

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