गेहूं खरीदी के जख्म भरे नहीं, अब खाद की महंगाई ने बढ़ाई किसानों की मुश्किलें
Ramanand Tiwari | Jun 07, 2026, 23:27 IST
Photograph: (thesootr)
BHOPAL. गेहूं खरीदी की परेशानियों के बाद खाद की महंगाई ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है। इधर डीजल और बीज महंगे होने से खरीफ सीजन में खेती करना मुश्किल हो रहा है।
ऐसे समझें पूरा मामला...
- एनपीके 12-32-16 में 550 रुपए प्रति बोरी बढ़ोतरी हुई।
- एनपीके 16-16-16 का दाम 325 रुपए बढ़ा।
- एनपीके 19-19-19 में सबसे ज्यादा 800 रुपए की बढ़ोतरी।
- पोटाश की कीमत 175 रुपए प्रति बोरी बढ़ गई।
- डीजल, बीज और खाद महंगे होने से खेती की लागत बढ़ी।
अब खाद की कीमतों में भारी बढ़ोतरी ने उनकी चिंता कई गुना बढ़ा दी है। डीजल की महंगाई पहले से खेती की लागत बढ़ा चुकी थी, अब खाद और बीज के बढ़ते दाम किसानों की कमर तोड़ने लगे हैं।
- खरीफ सीजन शुरू होने से पहले खाद के दामों में बड़ी बढ़ोतरी।
- एनपीके खाद के रेट में 325 से 800 रुपए प्रति बोरी तक इजाफा।
- पोटाश 175 रुपए प्रति बोरी महंगा हुआ।
- 10 से 12 बैग खाद खरीदने पर किसान पर करीब 5 हजार रुपए का अतिरिक्त बोझ।
खरीफ की तैयारी पर महंगाई का हमला
खाद के नए रेट ने बढ़ाई लागत
mp farmers crisis
एक एकड़ खेती में भी बढ़ गया खर्च
चूंकि एनपीके और पोटाश दोनों महंगे हो चुके हैं, इसलिए प्रति एकड़ लागत सीधे बढ़ेगी। किसानों का कहना है कि पहले डीजल महंगा हुआ, फिर बीजों की कीमत बढ़ी और अब खाद के दामों ने खेती को और महंगा बना दिया है।
सरकारी राहत अधूरी क्यों?
सरकारी दावों और हकीकत में फर्क
अब खरीफ सीजन शुरू होने से पहले खाद की महंगाई ने किसानों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। सवाल यह है कि यदि लागत लगातार बढ़ती रही तो खेती लाभ का सौदा कैसे बनेगी?
किसानों का दर्द
किसान कल्याण सिंह कुशवाह का कहना है कि गेहूं खरीदी के दौरान भी कई परेशानियां सामने आई थीं। अब खाद की बढ़ी कीमतों ने नई चिंता पैदा कर दी है। खेती करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है।
किसान एवं अधिवक्ता अजय सिंह कुशवाह का कहना है कि डीजल से लेकर खाद तक हर चीज महंगी हो रही है। ऐसी स्थिति में सरकार को किसानों के हित में हस्तक्षेप कर राहत देने वाले निर्णय लेने चाहिए।
खेती पहले ही मौसम, बाजार और लागत के दबाव से जूझ रही है। ऐसे समय में खाद की कीमतों में हुई बड़ी बढ़ोतरी ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है। सरकारी आंकड़े भले संतोषजनक तस्वीर पेश करें, लेकिन खेतों में खड़ा किसान पूछ रहा है कि बढ़ती लागत का बोझ आखिर कब तक उठाएगा?
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