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5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच ने 51,708 उम्मीदवारों के डेटा का विश्लेषण किया।
- इस बड़े सैंपल में महिला उम्मीदवार केवल करीब 10 फीसदी ही पाई गईं।
- वर्तमान लोकसभा और विधानसभाओं में भी महिला सांसद और विधायक लगभग 10 फीसदी हैं।
- यह स्थिति तब है, जब 33 फीसदी महिला आरक्षण वाला संविधान संशोधन पास हो चुका है।
- रिपोर्ट साफ दिखाती है कि समस्या जीतने की नहीं, टिकट देने की राजनीति में छुपी है।
कानून आगे, जमीनी हकीकत पीछे
ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच के ताजा विश्लेषण में दिखा कि चुनावी मैदान में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी केवल 10 फीसदी के आसपास ही है। कुल 51 हजार 708 उम्मीदवारों में से सिर्फ 5 हजार से थोड़ी ज्यादा महिलाएं चुनाव लड़ पाईं, जबकि बाकी ज्यादातर टिकट पुरुषों को मिले। इससे साफ लगता है कि कागज पर इरादा बदल गया है, मगर दलों की पुरानी सोच अभी भी वही है।
रिपोर्ट में उम्मीदवार और चुने गए प्रतिनिधि
ADR रिपोर्ट के अनुसार कुल 51 हजार 708 उम्मीदवारों में लगभग 46 हजार 500 से ज्यादा पुरुष और करीब 5 हजार 95 महिलाएं थीं, जो लगभग 10 फीसदी बैठता है। यही अनुपात उन सांसदों और विधायकों में भी दिखता है, जो चुनाव जीतकर सदन तक पहुंचे हैं।
यानी जहां महिलाओं को मौका मिला, वहां उनकी जीत की संभावना पुरुषों से बहुत अलग नहीं रही। इससे यह धारणा कमजोर होती है कि महिलाएं चुनाव कम जीतती हैं, इसलिए टिकट नहीं मिलना चाहिए। कुछ थर्ड जेंडर उम्मीदवार भी मैदान में थे, लेकिन एक भी सीट तक नहीं पहुंच सका, जो अलग तरह के बहिष्कार को दिखाता है।
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टिकट बंटवारे में छुपा गेटकीपर इफेक्ट
रिपोर्ट से यह बात साफ निकलती है कि असली रुकावट टिकट बंटवारे की शुरुआत में ही खड़ी हो जाती है। बड़े दलों की प्रदेश और केंद्रीय इकाइयों पर ज्यादातर नियंत्रण पुरुष नेताओं के हाथ में है। ऐसे में टिकट उन लोगों तक ही पहुंचता है, जो पुराने नेटवर्क और संरक्षण से जुड़े होते हैं।
महिला नेताओं को अक्सर या तो कठिन सीट दी जाती है या बिल्कुल बाहर रख दिया जाता है। इस गेटकीपर इफेक्ट की वजह से कई सक्षम महिलाएं चुनावी दौड़ में शामिल ही नहीं हो पाती हैं।
दावों से अलग जमीन की हकीकत
कुछ राष्ट्रीय दल अपने घोषणापत्र और मंच से महिलाओं की राजनीति में भागीदारी की बात करते हैं, लेकिन जमीन पर तस्वीर सीमित है। लोकसभा और विधानसभा के लिए कुल टिकटों में महिलाओं की हिस्सेदारी (राजनीति में महिलाओं की भागीदारी) अक्सर 10 से 15 फीसदी के बीच ही रह जाती है। कोई दल किसी चुनाव में थोड़ा बेहतर प्रदर्शन कर लेता है, तो दूसरे चुनाव में वापस पुराने स्तर पर लौट आता है। इससे पता चलता है कि अभी तक कोई स्थायी और स्पष्ट नीति लागू नहीं की गई है।
क्षेत्रीय पार्टियों ने बदली इच्छाशक्ति की तस्वीर
कुछ क्षेत्रीय दलों ने स्वैच्छिक कोटा जैसी नीति अपनाकर अलग उदाहरण पेश किया है। कई राज्यों में ऐसे दल दिखते हैं, जिन्होंने कुल उम्मीदवारों में 25 से 50 फीसदी तक टिकट महिलाओं को दिए हैं। यह मॉडल दिखाता है कि संवैधानिक आरक्षण लागू हुए बिना भी महिलाएं आधी साझेदार बन सकती हैं। जब दल खुद ठान लें कि आधा टिकट महिलाओं को देना है, तो पूरी राजनीति की भाषा बदल जाती है।
राज्यवार डेटा कहां बेहतर, कहां बहुत पीछे
रिपोर्ट के डेटा से पता चलता है कि कुछ राज्यों में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी राष्ट्रीय औसत से बेहतर रही है। कई बड़े राज्यों में यह हिस्सा 13 से 14 फीसदी तक पहुंचता है, जो बदलाव की शुरुआती झलक देता है। दूसरी ओर, कुछ उत्तर पूर्वी और पहाड़ी राज्यों में महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत बहुत कम है। यह विरोधाभास बताता है कि समाज में महिलाओं की भागीदारी और राजनीति में उनके मौके के बीच सीधा संबंध नहीं बन पाया है।
शून्य प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्र और पाइपलाइन संकट
रिपोर्ट में ऐसे लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की संख्या भी गिनाई गई है, जहां से एक भी महिला विधायक उम्मीदवार नहीं उतरी। देश के सैकड़ों निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाएं केवल मतदाता हैं, उम्मीदवार नहीं। यह स्थिति आने वाले समय के लिए पाइपलाइन संकट पैदा करती है, यानी भावी महिला नेतृत्व तैयार ही नहीं हो पा रहा। जब आरक्षण पूरी तरह लागू होगा, तब भी कई क्षेत्रों में अनुभवी महिला चेहरों की कमी महसूस हो सकती है।
जीतने की क्षमता का मिथक और असली सवाल
दल अक्सर कहते हैं कि वे सिर्फ वही उम्मीदवार चुनते हैं, जिनकी जीतने की संभावना ज्यादा हो। लेकिन ADR के आंकड़े बताते हैं कि जहां महिलाओं को टिकट मिला, वहां उनकी जीत की दर पुरुषों से बहुत कम नहीं रही। यानी समस्या जीतने की नहीं, मौके तक पहुंचने की है। यह मिथक केवल एक ढाल की तरह इस्तेमाल होता है, ताकि टिकट बंटवारे पर सवाल न उठें।
आरक्षण से आगे की तैयारी
रिपोर्ट संकेत देती है कि 33 फीसदी आरक्षण का कानून अपने आप तस्वीर नहीं बदलेगा। जब तक राजनीतिक दल अपनी आंतरिक संरचना में बदलाव न करें। पार्टी स्तर पर जेंडर ऑडिट जैसे कदम से यह पता चल सकता है कि टिकट समितियों और प्रमुख पदों पर कितनी महिलाएं हैं।
साथ ही, उन क्षेत्रों पर खास ध्यान देना होगा, जहां अभी तक महिलाएं उम्मीदवार के रूप में सामने नहीं आईं। अगर अभी से स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और नेतृत्व निर्माण शुरू नहीं हुआ, तो आरक्षण भी आधा अधूरा रह जाएगा।
10 फीसदी का ठहराव और लोकतंत्र का इम्तिहान
कुल मिलाकर, 10 फीसदी का आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सीमा रेखा जैसा दिखता है। इतने बड़े देश में आधी आबादी का प्रतिनिधित्व लगातार इतने कम स्तर पर बने रहना चिंता की बात है। ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच की यह रिपोर्ट नीति निर्माण और दलों की रणनीति के लिए बुनियादी दस्तावेज साबित हो सकती है। आने वाले चुनावों में यह देखना होगा कि क्या दल इस डेटा को गंभीरता से लेकर टिकट बंटवारे की सोच में बदलाव करते हैं या नहीं।
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