ADR Report 2026: भारत की संसद और विधानसभाओं में 10 फीसदी पर अटकी महिलाएं
CHAKRESH | Mar 08, 2026, 14:43 IST
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भारत में संसद और विधानसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला संशोधन पास हो चुका है, लेकिन यह लागू नहीं हुआ है। इसके उलट, ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच के विश्लेषण के मुताबिक, चुनावी मैदान में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी केवल 10% है।
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच ने 51,708 उम्मीदवारों के डेटा का विश्लेषण किया।
- इस बड़े सैंपल में महिला उम्मीदवार केवल करीब 10 फीसदी ही पाई गईं।
- वर्तमान लोकसभा और विधानसभाओं में भी महिला सांसद और विधायक लगभग 10 फीसदी हैं।
- यह स्थिति तब है, जब 33 फीसदी महिला आरक्षण वाला संविधान संशोधन पास हो चुका है।
- रिपोर्ट साफ दिखाती है कि समस्या जीतने की नहीं, टिकट देने की राजनीति में छुपी है।
कानून आगे, जमीनी हकीकत पीछे
रिपोर्ट में उम्मीदवार और चुने गए प्रतिनिधि
यानी जहां महिलाओं को मौका मिला, वहां उनकी जीत की संभावना पुरुषों से बहुत अलग नहीं रही। इससे यह धारणा कमजोर होती है कि महिलाएं चुनाव कम जीतती हैं, इसलिए टिकट नहीं मिलना चाहिए। कुछ थर्ड जेंडर उम्मीदवार भी मैदान में थे, लेकिन एक भी सीट तक नहीं पहुंच सका, जो अलग तरह के बहिष्कार को दिखाता है।
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टिकट बंटवारे में छुपा गेटकीपर इफेक्ट
महिला नेताओं को अक्सर या तो कठिन सीट दी जाती है या बिल्कुल बाहर रख दिया जाता है। इस गेटकीपर इफेक्ट की वजह से कई सक्षम महिलाएं चुनावी दौड़ में शामिल ही नहीं हो पाती हैं।
दावों से अलग जमीन की हकीकत
क्षेत्रीय पार्टियों ने बदली इच्छाशक्ति की तस्वीर
राज्यवार डेटा कहां बेहतर, कहां बहुत पीछे
शून्य प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्र और पाइपलाइन संकट
जीतने की क्षमता का मिथक और असली सवाल
आरक्षण से आगे की तैयारी
साथ ही, उन क्षेत्रों पर खास ध्यान देना होगा, जहां अभी तक महिलाएं उम्मीदवार के रूप में सामने नहीं आईं। अगर अभी से स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और नेतृत्व निर्माण शुरू नहीं हुआ, तो आरक्षण भी आधा अधूरा रह जाएगा।
10 फीसदी का ठहराव और लोकतंत्र का इम्तिहान
FAQ
- महिलाओं को लेकर ADR रिपोर्ट 2026 और नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट क्या बताती है?
यह रिपोर्ट भारत भर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के उम्मीदवारों और चुने गए प्रतिनिधियों का लिंग आधारित विश्लेषण पेश करती है। इसमें कुल 51 हजार 708 उम्मीदवारों के डेटा को देखा गया, जिनमें महिलाओं की हिस्सेदारी केवल लगभग 10 फीसदी पाई गई। रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि वर्तमान सांसदों और विधायकों में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 10 फीसदी के आसपास ही है। यानी जहां कानून 33 फीसदी आरक्षण का रास्ता खोल चुका है, वहां जमीन पर भागीदारी अब भी एक तिहाई से काफी कम है। - महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण के बावजूद प्रतिनिधित्व कम क्यों है?
33 फीसदी आरक्षण वाला संविधान संशोधन पारित हो चुका है, लेकिन इसका पूरा लागू होना अभी बाकी है। फिलहाल टिकट बंटवारे की ताकत राजनीतिक दलों के हाथ में है, और इन दलों की संरचना में पुरुष नेतृत्व हावी है। कई बार महिलाएं केवल कठिन या कम सुरक्षित सीटों पर उतारी जाती हैं, जबकि मजबूत मानी जाने वाली सीटों पर पुरुष उम्मीदवार को प्राथमिकता मिलती है। इस कारण चुनावी मैदान में महिलाओं की संख्या सीमित रह जाती है और कुल प्रतिनिधित्व 10 फीसदी के आसपास ही अटका दिखता है। - महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए कौन से कदम जरूरी हैं?
विशेषज्ञों और चुनावी डेटा के मुताबिक, सबसे पहले दलों को अपने टिकट बंटवारे की प्रक्रिया का जेंडर ऑडिट करना होगा। इससे यह साफ होगा कि किस स्तर पर और किन कारणों से महिलाएं बाहर रह जाती हैं। दूसरे, क्षेत्रीय दलों के स्वैच्छिक कोटा मॉडल से सीख लेकर राष्ट्रीय दल भी तय प्रतिशत में टिकट महिलाओं को दे सकते हैं। तीसरे, उन लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में खास कार्यक्रम चलाने होंगे, जहां से आज तक कोई महिला उम्मीदवार नहीं उतरी। इन कदमों के साथ 33 फीसदी आरक्षण का कानून भी लागू होगा, तो आने वाले वर्षों में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या में वास्तविक और स्थायी बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
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