नीट पेपर लीक में खो दिया बेटा, कैसे एक परिवार तलाश रहा नई राह, जानिए पूरी कहानी
Jinesh Jain | Aug 04, 2026, 20:08 IST
NEET पेपर लीक ने छीन ली कहान की जान, परिवार तलाश रहा नई राह
नीट पेपर लीक के कारण कहान पटेल ने जिंदगी खो दी। उसकी मृत्यु ने उसके परिवार को हमेशा के लिए बदल दिया। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि शोक क्यों खत्म नहीं होता। यादें किस प्रकार उपचार का हिस्सा बन सकती हैं।
किताबों का वह ढेरों वाला साम्राज्य अब गायब हो चुका है। बायोलॉजी के नोट्स, मॉक टेस्ट के पन्ने और पुस्तकों ने कभी कहान पटेल के पूरे कमरे को अपने आगोश में ले रखा था। उनकी मौत के डेढ़ महीने बाद एक अलमारी के गहरे अंधेरे में बंद कर दी गई हैं।
लेकिन वह गिटार... वह आज भी बिल्कुल उसी कोने में रखा है, जहां कहान उसे आखिरी बार छोड़कर गया था। उनके पिता एडवोकेट प्रशांत पटेल ने इस बिखराव के बीच कड़वी हकीकत सीखी है। शोक किसी गणित या तर्क का मोहताज नहीं होता। यह आपसे कुछ चीज़ों को हमेशा के लिए समेट देने को कहता है। कुछ चीजों को छूने तक की इजाज़त नहीं देता। ठीक उसी गिटार की तरह।
45 साल के प्रशांत अपने 17 वर्षीय बेटे की यादों के पन्ने पलटते हुए बताते हैं। जब वह 18 का होता तो मैं उसे एक कार गिफ्ट करने वाला था। लेकिन, वह 18 का कभी हो ही नहीं सका। पेपर लीक और फिर नीट (NEET) रद्द होने के बाद री-टेस्ट के तनाव को वह बर्दाश्त नहीं कर पाया। उसने जिंदगी का दामन छोड़ दिया।
प्रशांत 'इंडियन एक्सप्रेस' को बताते हैं, मैंने तो गाड़ी की डिग्गी में एक खास गिटार स्टैंड बनवाने की प्लानिंग भी कर ली थी, ताकि कहान जहां भी जाए, अपना संगीत अपने साथ ले जा सके। उन्होंने नीट के नतीजों के बाद अपने दिल में एक और खूबसूरत सपना पाल रखा था। कहान के नाम से उकेरा हुआ स्पेशल कस्टमाइज्ड स्टेथोस्कोप उसे देने का।
मेडिसिन यानी डॉक्टरी की पढ़ाई जब तक उसकी ज़िंदगी का इकलौता मकसद नहीं बनी थी, तब तक कहान बस एक जिज्ञासु और जीवंत बच्चा था। वह लेगो (Lego) से नई-नई आकृतियां बनाता, खिलौना हवाई जहाजों के कलपुर्जे खोलकर देखता कि वे उड़ते कैसे हैं, परिवार के साथ पहाड़ों पर ट्रैकिंग का लुत्फ उठाता।
फिर उसकी जिंदगी में फुटबॉल, उक्युलेले और हैवी मेटल म्यूज़िक का दौर आया। वह शानदार इलेक्ट्रिक गिटार खरीदना चाहता था, लेकिन उसने खुद ही इस ख्वाहिश को टाल दिया। क्योंकि प्रवेश परीक्षाएं सिर पर थीं।
उसे लगा था कि जिंदगी बहुत बड़ी है और इन चीज़ों के लिए आगे ढेरों वक्त मिलेगा। 11वीं कक्षा में आते-आते कहान ने नीट की तैयारी के लिए स्कूल तक बदल लिया। अगले दो साल तक उसकी पूरी दुनिया बस एक ही परीक्षा के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई।
छुट्टियों का वजूद खत्म हो गया। उसके सारे शौक और खुशियां उस भविष्य के नाम पर गिरवी रख दी गईं, जो अभी आया ही नहीं था। उसकी हर सांस, हर लम्हा बस एक सपने को सच करने में खर्च हो रहा था।
जब 3 मई को वह मुस्कुराते हुए परीक्षा हॉल से बाहर निकला तो लगा कि बरसों का वह सपना अब कुछ ही दूरी पर है। उसकी सबसे करीबी दोस्त ध्रुवी बताती है कि कहान को पूरा भरोसा था कि वह 720 में से कम से कम 650 अंक हासिल कर लेगा। उसे किसी बेहतरीन सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट मिल जाएगी।
महीनों की घुटने तोड़ मेहनत के बाद पहली बार उसने खुद को थोड़ी ढील दी। दोस्तों के साथ सूरत के पास एक फार्महाउस में छुट्टियां बिताने चला गया। लेकिन तभी नीट पेपर लीक की खबर ने पूरे देश में भूचाल ला दिया।
कहान वापस तो लौटा, लेकिन उसका बेफिक्र बचपन गायब हो चुका था। वह गहरे तनाव और अनिश्चितता के दलदल में धंस गया। उसे लगातार यह डर सताने लगा कि क्या वह दोबारा होने वाले री-टेस्ट में उतने ही शानदार अंक ला पाएगा? प्रदर्शन की इसी खौफनाक चिंता ने उसे जिंदगी की अंतिम सीमा के पार धकेल दिया।
नैना शाहरी अनुभवी काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट हैं। उन्होंने सुसाइड क्राइसिस हेल्पलाइन पर लंबा वक्त बिताने के बाद अब नीट से प्रभावित छात्रों को ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड सपोर्ट देना शुरू किया है। इस स्थिति का विश्लेषण करते हुए कहती हैं कि अत्यधिक तनाव इंसान के सोचने और उम्मीद करने के पूरे ढांचे को ध्वस्त कर देता है।
वे कहती हैं, जब कोई बच्चा सालों तक अपनी पूरी ऊर्जा किसी एक मुकाम को पाने में लगा देता है, अचानक उसके सामने कोई ऐसी अनहोनी घटती है, जो पूरी तरह अन्यायपूर्ण और उसके बस से बाहर हो तो उसके भीतर एक भयानक बेबसी जन्म लेती है।
ऐसे में वह यह सोचने के बजाय कि पूरी व्यवस्था ही सड़ चुकी है और नाकाम रही है, यह मानने लगता है कि कमी उसी के अंदर थी। वह खुद असफल हो गया है। मनोविज्ञान की यही बारीक परत कहान के लिए वह अंतिम तिनका साबित हुई होगी, जिसने उसकी हिम्मत तोड़ दी।
कहान के चले जाने के बाद के हफ्तों में उसका शोक घर के कोने-कोने में समा गया। प्रशांत खुद को उन पुरानी बातचीत को बार-बार अपने दिमाग में दोहराते हुए पाते हैं, जो कभी बेहद आम लगा करती थीं।
वे रात-रात भर सोचते कि क्या री-एग्जाम से पहले के तनावपूर्ण हफ्तों में उन्हें अपने बेटे को बार-बार फोन करना चाहिए था? वे इस डर से चुप रहे कि कहीं उनका फोन उसकी पढ़ाई का कीमती वक्त न छीन ले। वे पिछले साल की उस फैमिली हॉलिडे को याद करके तड़प उठते हैं।
इसके बारे में कहान ने बाद में हंसते हुए कहा था कि उस ट्रिप की वजह से उसकी पढ़ाई का काफी नुकसान हो गया। आज हर बीती याद अजीब मुकदमे का गवाह बन गई है, जहां प्रशांत खुद ही कटघरे में खड़े गवाह हैं। खुद ही जज बनकर अपने आप पर आरोप लगा रहे हैं।
शाहरी कहती हैं, अपने ही बच्चे को खो देने का गम इतना भयानक होता है कि इसे सहना इंसान के वश में नहीं होता। माता-पिता अक्सर पुरानी बातों और मुलाकातों के टेप को दिमाग में बार-बार रिवाइंड करते हैं। यह सोचकर कि काश वे कुछ बदल पाते।
वे उन अनदेखे इशारों या संकेतों को ढूंढने की नाकाम कोशिश करते हैं जो शायद उनसे छूट गए थे। लेकिन गम कभी सीधे रास्ते पर नहीं चलता। यह बार-बार उन्हीं तकलीफदेह सवालों पर आकर टिक जाता है। क्योंकि हमारा दिमाग एक ऐसी दर्दनाक घटना को समझने की बेताब कोशिश कर रहा होता है जिसे समझना नामुमकिन है।
मनोवैज्ञानिक इसे किसी बड़े ट्रॉमा के बाद की सबसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानते हैं। हमारा दिमाग गुजरे हुए वक्त का काल्पनिक ताना-बाना बुनता रहता है। यह असल में कोई जवाब पाने की कोशिश नहीं है, बल्कि उस खोए हुए नियंत्रण को दोबारा हासिल करने की एक छटपटाहट है। इसने उनकी पूरी दुनिया को पल भर में तिनका-तिनका बिखेर दिया।
प्रशांत के लिए अब अपने बेटे के बारे में खुलकर बातें करना ही उनके जीवित रहने की रणनीति बन चुका है। वे कहते हैं, मैं उसे भूलना नहीं चाहता। मैं उसके बारे में बात करना चाहता हूं। क्योंकि उनके लिए चुप्पी उस दर्द से भी ज़्यादा भयावह और खौफनाक है।
यह दर्दनाक शोक परिवार के हर सदस्य के पास एक अलग रूप लेकर आया। कहान की मां वीणा गहरे सन्नाटे में डूब गईं। उन्होंने खुद को पूरी तरह से समेट लिया।
उनके करीबी बताते हैं कि वे अपने छोटे बेटे रीहान के सामने खुद को मजबूत दिखाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही हैं। लेकिन इस अपार दुख के समंदर के बीच भी उनके भीतर एक अलग तरह की तड़प जगी। उन्होंने यह पता करना शुरू कर दिया कि क्या ऐसी कोई जगहें या संस्थाएं हैं, जहां वे उन बच्चों के लिए वोलंटियर कर सकें, जो पढ़ाई और परीक्षाओं के भयानक दबाव में घुट रहे हैं।
मनोवैज्ञानिकों की नज़र में वीणा की यह सोच बेहद खास है। फोर्टिस अडायू के स्कूल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम की हेड और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. मीमांसा सिंह तंवर कहती हैं, लोग अक्सर यह मान बैठते हैं कि दुख से उबरने का मतलब बीते कल को भूल जाना या जिंदगी में आगे बढ़ जाना है। ऐसा बिल्कुल नहीं है।
समय के साथ कई शोक संतप्त माता-पिता उस खालीपन में एक नया अर्थ तलाशने की कोशिश करते हैं। किसी एक अभिभावक के लिए यह पढ़ाई के दबाव के खिलाफ आवाज़ उठाना हो सकता है। किसी दूसरे के लिए यह अन्य बच्चों का सहारा बनना या अपने बच्चे की यादों को किसी न किसी रूप में जिंदा रखना हो सकता है।
वे कहती हैं कि इस पूरे सफर का सबसे मुश्किल हिस्सा यह है कि आप अपने गम को बिना दूर भगाने की जल्दबाजी किए, उसे चुपचाप महसूस होने दें।
अक्सर रिश्तेदार या शुभचिंतक यह सलाह देने लगते हैं कि आपको अब मजबूत बनना होगा। या समय हर घाव भर देता है। लेकिन ये बातें-भले ही कितनी भी अच्छी नीयत से कही गई हों, उस इंसान को और भी ज़्यादा अकेला और अलग-थलग महसूस कराती हैं।
डॉ. तंवर के अनुसार शोक संतप्त इंसान को अगर किसी चीज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। वह है एक ऐसा माहौल जहां वे बिना झिझक अपनी भावनाओं का गुबार निकाल सकें। उन्हें एक ऐसे इंसान की तलाश होती है, जो बिना उन्हें जज किए बिना कोई नसीहत दिए और बिना कुछ ठीक करने की हड़बड़ी के बस चुपचाप उन्हें सुन सके।
लेकिन इस पूरे मामले में एक और दुख है, जो अक्सर सबकी नज़रों से ओझल रह जाता है। वह है 13 साल के छोटे भाई रीहान का दुख।
रीहान ने पिछले कुछ हफ्तों में कई बड़ों को अलग-अलग अंदाज में यह कहते सुना है- सुनो, तुम कभी वो मत करना, जो तुम्हारे बड़े भाई ने किया। जब प्रशांत ने रीहान से पूछा कि क्या उसे बड़ों की ये बातें सुनना अच्छा लगता है, तो उस मासूम ने बहुत खामोशी से अपना सिर नहीं में हिला दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि जो बच्चे अपने भाई या बहन को खो देते हैं, उन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। क्योंकि सबका ध्यान दुखी माता-पिता को संभालने पर लगा होता है। लेकिन सच तो यह है कि वे मासूम भी उसी गहरे शोक से गुजर रहे होते हैं। साथ ही उन पर उन भारी उम्मीदों और डरों का बोझ भी लाद दिया जाता है, जो बाकी लोग अब उन पर थोप रहे होते हैं।
कहान की दोस्त ध्रुवी के लिए इस सदमे से जूझने का रास्ता कहान के पुराने वॉयस नोट्स सुनना, उसके चैट्स पढ़ना और उसकी तस्वीरें देखना है। ध्रुवी को अपने स्कूल के दिनों में बुलिंग का सामना करना पड़ता था। वह रोने के लिए अक्सर सीढ़ियों के अंधेरे कोने में छिप जाती थी। कहान चुपचाप उसके पीछे आता, अपना कंधा देता, ताकि वह जी भरकर रो सके। फिर बड़े प्यार से उसे हाथ पकड़कर क्लास में वापस छोड़ आता।
ध्रुवी भावुक होकर कहती हैं, उस दिन के बाद से वह एक ऐसा दोस्त बन गया, जिस पर मैं अपनी आंखें मूंदकर भरोसा कर सकती थी। कहान की मौत के एक महीने बाद जब वह उसके बिना इस दुनिया के खालीपन को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। उसने रात को अपनी एक सहेली को फोन किया और सुबह होने तक बस उससे बात करती रही।
दिव्या साइकोथेरेपिस्ट हैं। गहरे शोक व नुकसान से जूझ रहे लोगों की काउंसलिंग करती हैं। वे कहती हैं कि ऐसे कठिन दौर में इंसानी जुड़ाव ही सबसे बड़ी संजीवनी बनता है। वे कहती हैं, सुसाइड जैसी त्रासदियों के बाद गम इंसान को पूरी तरह अकेला कर देता है।
दिव्या शोक से जुड़े उस सबसे पुराने मिथक को भी खारिज करती हैं, जिसमें माना जाता है कि आगे बढ़ने के लिए पुरानी यादों को छोड़ना ज़रूरी है। कई लोग अपने उन प्रियजनों से मन ही मन बात करना जारी रखते हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके वॉयस मैसेज सुनते हैं, उनका जन्मदिन मनाते हैं या उनकी तस्वीरों को सीने से लगाकर रखते हैं।
यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि ये अटूट रिश्ते ही उनके ठीक होने के सफर का एक अहम हिस्सा बन जाते हैं। दिव्या कहती हैं, हम किसी से सिर्फ इसलिए प्यार करना बंद नहीं कर देते क्योंकि वह अब इस दुनिया में नहीं है। इंसान चला जाता है, रिश्ता सिर्फ अपना रूप बदल लेता है, खत्म नहीं होता।
साइकोलॉजिस्ट मानते हैं कि कोई बड़ा ट्रॉमा ऐसी चीज़ नहीं है, जिससे इंसान पहले जैसा नॉर्मल हो जाए। यह हादसा आपकी पूरी जिंदगी के ढर्रे को बदल कर रख देता है।
डॉ. तंवर का कहना है, खुद को दोबारा संभाल लेने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप ठीक वैसे ही इंसान बन जाएं, जैसे आप उस बड़े नुकसान से पहले थे। इसका असली मतलब यह है कि आप उस इंसान की कभी न भरने वाली खाली जगह के इर्द-गिर्द अपनी एक नई जिंदगी को धीरे-धीरे गढ़ना सीख लेते हैं।
प्रशांत के लिए इस नई जिंदगी का मतलब है, अपने बेटे की कहानी को दुनिया के सामने बोलना, क्योंकि उनके लिए यह यादें संजोना खामोशी के जानलेवा सन्नाटे से कहीं ज्यादा सुरक्षित है। कहान की मां वीणा के लिए इसका मतलब है, उन अन्य बच्चों की ढाल बनना जो आज भी नीट जैसी परीक्षाओं के जानलेवा बोझ तले दब रहे हैं।
उसकी दोस्त ध्रुवी के लिए इसका मतलब है- हर सुबह उठकर दोबारा जीने का फैसला करना, भले ही उन पुरानी यादों की गलियों से गुजरते वक्त आज भी दिल में गहरा दर्द क्यों न होता हो।
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लेकिन वह गिटार... वह आज भी बिल्कुल उसी कोने में रखा है, जहां कहान उसे आखिरी बार छोड़कर गया था। उनके पिता एडवोकेट प्रशांत पटेल ने इस बिखराव के बीच कड़वी हकीकत सीखी है। शोक किसी गणित या तर्क का मोहताज नहीं होता। यह आपसे कुछ चीज़ों को हमेशा के लिए समेट देने को कहता है। कुछ चीजों को छूने तक की इजाज़त नहीं देता। ठीक उसी गिटार की तरह।
45 साल के प्रशांत अपने 17 वर्षीय बेटे की यादों के पन्ने पलटते हुए बताते हैं। जब वह 18 का होता तो मैं उसे एक कार गिफ्ट करने वाला था। लेकिन, वह 18 का कभी हो ही नहीं सका। पेपर लीक और फिर नीट (NEET) रद्द होने के बाद री-टेस्ट के तनाव को वह बर्दाश्त नहीं कर पाया। उसने जिंदगी का दामन छोड़ दिया।
यादें जो भुलाई नहीं जाती
मेडिसिन यानी डॉक्टरी की पढ़ाई जब तक उसकी ज़िंदगी का इकलौता मकसद नहीं बनी थी, तब तक कहान बस एक जिज्ञासु और जीवंत बच्चा था। वह लेगो (Lego) से नई-नई आकृतियां बनाता, खिलौना हवाई जहाजों के कलपुर्जे खोलकर देखता कि वे उड़ते कैसे हैं, परिवार के साथ पहाड़ों पर ट्रैकिंग का लुत्फ उठाता।
फिर उसकी जिंदगी में फुटबॉल, उक्युलेले और हैवी मेटल म्यूज़िक का दौर आया। वह शानदार इलेक्ट्रिक गिटार खरीदना चाहता था, लेकिन उसने खुद ही इस ख्वाहिश को टाल दिया। क्योंकि प्रवेश परीक्षाएं सिर पर थीं।
उसे लगा था कि जिंदगी बहुत बड़ी है और इन चीज़ों के लिए आगे ढेरों वक्त मिलेगा। 11वीं कक्षा में आते-आते कहान ने नीट की तैयारी के लिए स्कूल तक बदल लिया। अगले दो साल तक उसकी पूरी दुनिया बस एक ही परीक्षा के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई।
छुट्टियों का वजूद खत्म हो गया। उसके सारे शौक और खुशियां उस भविष्य के नाम पर गिरवी रख दी गईं, जो अभी आया ही नहीं था। उसकी हर सांस, हर लम्हा बस एक सपने को सच करने में खर्च हो रहा था।
कहान का गिटार आज भी उसी कोने में रखा है
परीक्षा के बाद चहक उठा था कहान
महीनों की घुटने तोड़ मेहनत के बाद पहली बार उसने खुद को थोड़ी ढील दी। दोस्तों के साथ सूरत के पास एक फार्महाउस में छुट्टियां बिताने चला गया। लेकिन तभी नीट पेपर लीक की खबर ने पूरे देश में भूचाल ला दिया।
कहान वापस तो लौटा, लेकिन उसका बेफिक्र बचपन गायब हो चुका था। वह गहरे तनाव और अनिश्चितता के दलदल में धंस गया। उसे लगातार यह डर सताने लगा कि क्या वह दोबारा होने वाले री-टेस्ट में उतने ही शानदार अंक ला पाएगा? प्रदर्शन की इसी खौफनाक चिंता ने उसे जिंदगी की अंतिम सीमा के पार धकेल दिया।
इसलिए तोड़ दी हिम्मत
वे कहती हैं, जब कोई बच्चा सालों तक अपनी पूरी ऊर्जा किसी एक मुकाम को पाने में लगा देता है, अचानक उसके सामने कोई ऐसी अनहोनी घटती है, जो पूरी तरह अन्यायपूर्ण और उसके बस से बाहर हो तो उसके भीतर एक भयानक बेबसी जन्म लेती है।
ऐसे में वह यह सोचने के बजाय कि पूरी व्यवस्था ही सड़ चुकी है और नाकाम रही है, यह मानने लगता है कि कमी उसी के अंदर थी। वह खुद असफल हो गया है। मनोविज्ञान की यही बारीक परत कहान के लिए वह अंतिम तिनका साबित हुई होगी, जिसने उसकी हिम्मत तोड़ दी।
वे चुभते सवाल, जो कभी शांत नहीं होते
वे रात-रात भर सोचते कि क्या री-एग्जाम से पहले के तनावपूर्ण हफ्तों में उन्हें अपने बेटे को बार-बार फोन करना चाहिए था? वे इस डर से चुप रहे कि कहीं उनका फोन उसकी पढ़ाई का कीमती वक्त न छीन ले। वे पिछले साल की उस फैमिली हॉलिडे को याद करके तड़प उठते हैं।
इसके बारे में कहान ने बाद में हंसते हुए कहा था कि उस ट्रिप की वजह से उसकी पढ़ाई का काफी नुकसान हो गया। आज हर बीती याद अजीब मुकदमे का गवाह बन गई है, जहां प्रशांत खुद ही कटघरे में खड़े गवाह हैं। खुद ही जज बनकर अपने आप पर आरोप लगा रहे हैं।
शाहरी कहती हैं, अपने ही बच्चे को खो देने का गम इतना भयानक होता है कि इसे सहना इंसान के वश में नहीं होता। माता-पिता अक्सर पुरानी बातों और मुलाकातों के टेप को दिमाग में बार-बार रिवाइंड करते हैं। यह सोचकर कि काश वे कुछ बदल पाते।
वे उन अनदेखे इशारों या संकेतों को ढूंढने की नाकाम कोशिश करते हैं जो शायद उनसे छूट गए थे। लेकिन गम कभी सीधे रास्ते पर नहीं चलता। यह बार-बार उन्हीं तकलीफदेह सवालों पर आकर टिक जाता है। क्योंकि हमारा दिमाग एक ऐसी दर्दनाक घटना को समझने की बेताब कोशिश कर रहा होता है जिसे समझना नामुमकिन है।
मनोवैज्ञानिक इसे किसी बड़े ट्रॉमा के बाद की सबसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानते हैं। हमारा दिमाग गुजरे हुए वक्त का काल्पनिक ताना-बाना बुनता रहता है। यह असल में कोई जवाब पाने की कोशिश नहीं है, बल्कि उस खोए हुए नियंत्रण को दोबारा हासिल करने की एक छटपटाहट है। इसने उनकी पूरी दुनिया को पल भर में तिनका-तिनका बिखेर दिया।
प्रशांत के लिए अब अपने बेटे के बारे में खुलकर बातें करना ही उनके जीवित रहने की रणनीति बन चुका है। वे कहते हैं, मैं उसे भूलना नहीं चाहता। मैं उसके बारे में बात करना चाहता हूं। क्योंकि उनके लिए चुप्पी उस दर्द से भी ज़्यादा भयावह और खौफनाक है।
जब शोक घर के हर कोने में अलग रंग लेता
उनके करीबी बताते हैं कि वे अपने छोटे बेटे रीहान के सामने खुद को मजबूत दिखाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही हैं। लेकिन इस अपार दुख के समंदर के बीच भी उनके भीतर एक अलग तरह की तड़प जगी। उन्होंने यह पता करना शुरू कर दिया कि क्या ऐसी कोई जगहें या संस्थाएं हैं, जहां वे उन बच्चों के लिए वोलंटियर कर सकें, जो पढ़ाई और परीक्षाओं के भयानक दबाव में घुट रहे हैं।
मनोवैज्ञानिकों की नज़र में वीणा की यह सोच बेहद खास है। फोर्टिस अडायू के स्कूल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम की हेड और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. मीमांसा सिंह तंवर कहती हैं, लोग अक्सर यह मान बैठते हैं कि दुख से उबरने का मतलब बीते कल को भूल जाना या जिंदगी में आगे बढ़ जाना है। ऐसा बिल्कुल नहीं है।
समय के साथ कई शोक संतप्त माता-पिता उस खालीपन में एक नया अर्थ तलाशने की कोशिश करते हैं। किसी एक अभिभावक के लिए यह पढ़ाई के दबाव के खिलाफ आवाज़ उठाना हो सकता है। किसी दूसरे के लिए यह अन्य बच्चों का सहारा बनना या अपने बच्चे की यादों को किसी न किसी रूप में जिंदा रखना हो सकता है।
वे कहती हैं कि इस पूरे सफर का सबसे मुश्किल हिस्सा यह है कि आप अपने गम को बिना दूर भगाने की जल्दबाजी किए, उसे चुपचाप महसूस होने दें।
कोई नहीं जान पा रहा छोटे भाई का दर्द
डॉ. तंवर के अनुसार शोक संतप्त इंसान को अगर किसी चीज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। वह है एक ऐसा माहौल जहां वे बिना झिझक अपनी भावनाओं का गुबार निकाल सकें। उन्हें एक ऐसे इंसान की तलाश होती है, जो बिना उन्हें जज किए बिना कोई नसीहत दिए और बिना कुछ ठीक करने की हड़बड़ी के बस चुपचाप उन्हें सुन सके।
लेकिन इस पूरे मामले में एक और दुख है, जो अक्सर सबकी नज़रों से ओझल रह जाता है। वह है 13 साल के छोटे भाई रीहान का दुख।
रीहान ने पिछले कुछ हफ्तों में कई बड़ों को अलग-अलग अंदाज में यह कहते सुना है- सुनो, तुम कभी वो मत करना, जो तुम्हारे बड़े भाई ने किया। जब प्रशांत ने रीहान से पूछा कि क्या उसे बड़ों की ये बातें सुनना अच्छा लगता है, तो उस मासूम ने बहुत खामोशी से अपना सिर नहीं में हिला दिया।
नहीं भूल पा रही कहान की दोस्त
कहान की दोस्त ध्रुवी के लिए इस सदमे से जूझने का रास्ता कहान के पुराने वॉयस नोट्स सुनना, उसके चैट्स पढ़ना और उसकी तस्वीरें देखना है। ध्रुवी को अपने स्कूल के दिनों में बुलिंग का सामना करना पड़ता था। वह रोने के लिए अक्सर सीढ़ियों के अंधेरे कोने में छिप जाती थी। कहान चुपचाप उसके पीछे आता, अपना कंधा देता, ताकि वह जी भरकर रो सके। फिर बड़े प्यार से उसे हाथ पकड़कर क्लास में वापस छोड़ आता।
ध्रुवी भावुक होकर कहती हैं, उस दिन के बाद से वह एक ऐसा दोस्त बन गया, जिस पर मैं अपनी आंखें मूंदकर भरोसा कर सकती थी। कहान की मौत के एक महीने बाद जब वह उसके बिना इस दुनिया के खालीपन को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। उसने रात को अपनी एक सहेली को फोन किया और सुबह होने तक बस उससे बात करती रही।
कठिन दौर में इंसानी जुड़ाव ही संजीवनी
दिव्या शोक से जुड़े उस सबसे पुराने मिथक को भी खारिज करती हैं, जिसमें माना जाता है कि आगे बढ़ने के लिए पुरानी यादों को छोड़ना ज़रूरी है। कई लोग अपने उन प्रियजनों से मन ही मन बात करना जारी रखते हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके वॉयस मैसेज सुनते हैं, उनका जन्मदिन मनाते हैं या उनकी तस्वीरों को सीने से लगाकर रखते हैं।
यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि ये अटूट रिश्ते ही उनके ठीक होने के सफर का एक अहम हिस्सा बन जाते हैं। दिव्या कहती हैं, हम किसी से सिर्फ इसलिए प्यार करना बंद नहीं कर देते क्योंकि वह अब इस दुनिया में नहीं है। इंसान चला जाता है, रिश्ता सिर्फ अपना रूप बदल लेता है, खत्म नहीं होता।
अनुपस्थिति के साथ जीना सीख लेना
डॉ. तंवर का कहना है, खुद को दोबारा संभाल लेने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप ठीक वैसे ही इंसान बन जाएं, जैसे आप उस बड़े नुकसान से पहले थे। इसका असली मतलब यह है कि आप उस इंसान की कभी न भरने वाली खाली जगह के इर्द-गिर्द अपनी एक नई जिंदगी को धीरे-धीरे गढ़ना सीख लेते हैं।
प्रशांत के लिए इस नई जिंदगी का मतलब है, अपने बेटे की कहानी को दुनिया के सामने बोलना, क्योंकि उनके लिए यह यादें संजोना खामोशी के जानलेवा सन्नाटे से कहीं ज्यादा सुरक्षित है। कहान की मां वीणा के लिए इसका मतलब है, उन अन्य बच्चों की ढाल बनना जो आज भी नीट जैसी परीक्षाओं के जानलेवा बोझ तले दब रहे हैं।
उसकी दोस्त ध्रुवी के लिए इसका मतलब है- हर सुबह उठकर दोबारा जीने का फैसला करना, भले ही उन पुरानी यादों की गलियों से गुजरते वक्त आज भी दिल में गहरा दर्द क्यों न होता हो।
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