साउथ सिनेमा में बदल रही है स्टारडम की अर्थव्यवस्था
Rajesh Lahoti | Jul 28, 2026, 16:51 IST
साउथ फिल्म उद्योग
दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में स्टार फीस को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। बढ़ते फिल्म बजट और सितारों की भारी-भरकम फीस के बीच निर्माता अब पारंपरिक फिक्स्ड फीस मॉडल के बजाय प्रॉफिट शेयरिंग और हाइब्रिड मॉडल पर विचार कर रहे हैं।
एक समय था जब किसी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसकी कहानी, संगीत और निर्देशक को माना जाता था। फिर धीरे-धीरे सिनेमा में स्टार सिस्टम मजबूत हुआ और अभिनेता फिल्म की सबसे बड़ी पहचान बन गए। दर्शक टिकट खरीदने से पहले यह देखने लगा कि फिल्म में कौन है। निर्माता फिल्म बनाने से पहले यह सोचने लगा कि कौन सा स्टार बॉक्स ऑफिस पर पैसा खींच सकता है। देखते ही देखते अभिनेता की फीस फिल्म के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा बनने लगी।अब इसी व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। दक्षिण भारतीय सिनेमा, जिसने पिछले कुछ वर्षों में पूरे देश में अपनी मजबूत पहचान बनाई है, अब स्टार फीस के पुराने मॉडल और प्रॉफिट शेयरिंग के नए मॉडल के बीच खड़ा है। सवाल यह नहीं है कि स्टार को ज्यादा पैसा मिलना चाहिए या कम। असली सवाल यह है कि फिल्म की सफलता और असफलता का आर्थिक जोखिम आखिर किसका होना चाहिए।
अगर किसी अभिनेता को फिल्म शुरू होने से पहले ही 100 करोड़ रुपए या उससे अधिक की फीस मिल जाती है, तो फिल्म के हिट होने का सबसे बड़ा फायदा निर्माता को क्यों मिले और फ्लॉप होने का सबसे बड़ा नुकसान भी उसी के हिस्से में क्यों आए? क्या ऐसा मॉडल बनाया जा सकता है जिसमें अभिनेता भी फिल्म की सफलता में ज्यादा कमाए और असफलता में कुछ जोखिम उठाए? यही बहस अब दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग के भीतर एक बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है।
आज दक्षिण भारतीय फिल्मों का कारोबार सिर्फ एक राज्य या एक भाषा तक सीमित नहीं है। तमिल और तेलुगु फिल्मों ने हिंदी भाषी बाजार में अपनी मजबूत जगह बनाई है। कन्नड़ सिनेमा ने भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। दक्षिण के बड़े सितारे अब देशभर में पहचाने जाते हैं और उनकी फिल्मों की रिलीज एक क्षेत्रीय घटना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सिनेमाई इवेंट बन चुकी है। इस बढ़ती लोकप्रियता का सीधा असर कलाकारों की फीस पर पड़ा है। बड़े सितारों की बाजार कीमत तेजी से बढ़ी है। एक समय जो रकम किसी पूरी फिल्म के निर्माण में खर्च होती थी, आज कई बार उतनी रकम अकेले मुख्य अभिनेता की फीस बन जाती है। यहीं से निर्माता की मुश्किल शुरू होती है। एक फिल्म का बजट केवल अभिनेता की फीस से तय नहीं होता। इसमें निर्देशक, दूसरे कलाकार, तकनीकी टीम, एक्शन सीक्वेंस, सेट, लोकेशन, कैमरा, वीएफएक्स, पोस्ट प्रोडक्शन और प्रचार पर भी भारी रकम खर्च होती है। अगर फिल्म बड़े पैमाने पर बनाई जा रही है तो लागत और बढ़ जाती है। इसके बाद निर्माता को फिल्म को सिनेमाघरों तक पहुंचाना होता है। वितरक और थिएटर मालिकों का हिस्सा अलग होता है। डिजिटल और सैटेलाइट अधिकारों की कमाई अलग होती है। ऐसे में अगर शुरुआत में ही बजट का बहुत बड़ा हिस्सा स्टार की फीस में चला जाए तो फिल्म के लिए आर्थिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
फिल्म उद्योग का पारंपरिक मॉडल बेहद सीधा रहा है। अभिनेता अपनी फीस तय करता है और निर्माता उसे भुगतान करता है। फिल्म सफल हो या असफल, स्टार की तय रकम सुरक्षित रहती है। फिल्म 500 करोड़ रुपए कमाए तो स्टार को उसकी तय फीस मिलेगी। फिल्म उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न करे तब भी उसकी फीस पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा अभिनेता को मिलता है, क्योंकि उसका आर्थिक जोखिम सीमित रहता है। वह अपनी लोकप्रियता और बाजार की मांग के आधार पर फीस तय करता है और फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही अपना भुगतान सुरक्षित कर लेता है। हालांकि निर्माता के लिए स्थिति बिल्कुल अलग होती है। उसे फिल्म के निर्माण के लिए पैसा जुटाना पड़ता है। फिल्म की शूटिंग के दौरान बजट बढ़ सकता है। रिलीज की तारीख बदल सकती है। दर्शकों की पसंद बदल सकती है। प्रतिस्पर्धी फिल्में सामने आ सकती हैं। और आखिर में बॉक्स ऑफिस का फैसला भी निर्माता के पक्ष में जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। यानी एक तरफ स्टार का पैसा सुरक्षित है, दूसरी तरफ निर्माता की पूरी पूंजी जोखिम में है। यही असंतुलन अब फिल्म कारोबार के जानकारों को नए मॉडल के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर रहा है।
![प्रॉफिट शेयरिंग मॉडल]()
प्रॉफिट शेयरिंग का विचार इस असंतुलन को कम करने की कोशिश है। इसके तहत अभिनेता को पूरी भारी फीस अग्रिम रूप से देने के बजाय अपेक्षाकृत कम निश्चित रकम दी जा सकती है और फिल्म के वास्तविक मुनाफे में हिस्सेदारी दी जा सकती है। इसका अर्थ यह होगा कि अभिनेता की कमाई सीधे फिल्म के प्रदर्शन से जुड़ जाएगी। फिल्म बड़ी हिट हुई तो स्टार की कमाई भी बड़ी होगी। फिल्म सामान्य प्रदर्शन करती है तो कमाई भी उसी हिसाब से होगी। अगर फिल्म असफल होती है तो स्टार को भी उसका आर्थिक असर महसूस होगा। यह व्यवस्था निर्माता के लिए इसलिए आकर्षक है क्योंकि फिल्म शुरू होने के समय उसका वित्तीय दबाव कम हो सकता है। जो रकम केवल स्टार की फीस में चली जाती, उसका इस्तेमाल फिल्म की गुणवत्ता सुधारने में किया जा सकता है। दूसरी ओर स्टार के लिए भी यह व्यवस्था पूरी तरह नुकसान वाली नहीं है। अगर उसे अपनी फिल्म और अपनी लोकप्रियता पर भरोसा है तो वह कम अग्रिम फीस लेकर मुनाफे में हिस्सेदारी के जरिए कहीं ज्यादा कमाई कर सकता है। यानी प्रॉफिट शेयरिंग का असली संदेश है-फिल्म चलेगी तो सब ज्यादा कमाएंगे, फिल्म नहीं चलेगी तो जोखिम भी साझा होगा।
प्रॉफिट शेयरिंग सुनने में जितना आसान लगता है, व्यवहार में उतना ही जटिल है। फिल्म की कमाई का आंकड़ा और फिल्म का वास्तविक मुनाफा दो अलग चीजें हैं। मान लीजिए किसी फिल्म ने दुनिया भर में 300 करोड़ रुपए का कारोबार किया। इसका अर्थ यह नहीं कि निर्माता की जेब में 300 करोड़ रुपए पहुंच गए। इस रकम में थिएटर मालिकों का हिस्सा है, वितरकों का हिस्सा है, टैक्स है, मार्केटिंग का खर्च है और निर्माण लागत भी है। इसके अलावा फिल्म के डिजिटल, सैटेलाइट, म्यूजिक और विदेशी अधिकारों से हुई कमाई का भी अलग हिसाब होता है। ऐसे में अगर अभिनेता को मुनाफे में हिस्सा देना है तो पहले यह तय करना होगा कि मुनाफा किसे माना जाएगा। क्या कुल कमाई से खर्च घटाने के बाद बची रकम मुनाफा होगी? या पहले निर्माता का पूरा निवेश वापस आएगा और उसके बाद लाभ की गणना होगी? यही वजह है कि प्रॉफिट शेयरिंग मॉडल को सफल बनाने के लिए पारदर्शी अनुबंध और स्पष्ट अकाउंटिंग व्यवस्था बेहद जरूरी होगी।
दक्षिण भारतीय सिनेमा में बड़े बजट की फिल्मों का चलन तेजी से बढ़ा है। दर्शक अब बड़े पर्दे पर विशाल सेट, शानदार एक्शन, अत्याधुनिक वीएफएक्स और अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रोडक्शन देखना चाहता है। हर बड़े बजट की फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल हो, यह जरूरी नहीं है। कंगुवा और द राजा साब जैसी फिल्मों को लेकर हुई चर्चाओं ने भी यह सवाल सामने रखा कि क्या बढ़ते बजट और स्टार फीस के बीच संतुलन बनाया जाना जरूरी है। हालांकि किसी फिल्म की असफलता के लिए केवल अभिनेता की फीस को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। फिल्म की कहानी, पटकथा, निर्देशन, रिलीज टाइमिंग, दर्शकों की प्रतिक्रिया और मार्केटिंग जैसे कई कारण उसके प्रदर्शन को प्रभावित करते हैं। फिर भी जब फिल्म का बजट बहुत बड़ा हो जाता है तो आर्थिक जोखिम भी उतना ही बढ़ जाता है। ऐसे में स्टार की फीस और फिल्म की कमाई के बीच संतुलन का सवाल स्वाभाविक रूप से सामने आता है।
दूसरी तरफ यह भी सच है कि बड़े सितारे केवल अभिनय के लिए फीस नहीं लेते। उनका नाम फिल्म की शुरुआती कीमत तय करता है। एक लोकप्रिय अभिनेता की वजह से फिल्म को पहले दिन बड़ी ओपनिंग मिल सकती है। वितरक ज्यादा कीमत पर अधिकार खरीद सकते हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म फिल्म में ज्यादा रुचि दिखा सकते हैं। विदेशी बाजार में फिल्म की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। यानी स्टार की फीस को केवल फिल्म के बजट में एक खर्च मानना भी पूरी तरह सही नहीं होगा। वास्तव में बड़ा स्टार खुद एक कारोबारी संपत्ति है। उसकी लोकप्रियता फिल्म की मार्केटिंग लागत कम कर सकती है। उसके प्रशंसक फिल्म के लिए शुरुआती दर्शक उपलब्ध करा सकते हैं। उसकी ब्रांड वैल्यू फिल्म के अधिकारों की कीमत बढ़ा सकती है। असली सवाल यह नहीं है कि स्टार को बड़ी फीस मिलनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि उसकी फीस फिल्म के कुल कारोबार और जोखिम के अनुपात में कितनी होनी चाहिए। दर्शक बदल चुका है, इसलिए बिजनेस मॉडल भी बदलना होगा आज का दर्शक पहले जैसा नहीं है। पहले किसी बड़े स्टार की फिल्म रिलीज होती थी तो दर्शक केवल स्टार का नाम देखकर सिनेमाघर पहुंच जाता था। अब स्थिति बदल चुकी है। दर्शक ट्रेलर देखता है। सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देखता है। रिव्यू पढ़ता है। कहानी में कुछ नया है या नहीं, यह समझने की कोशिश करता है। ओटीटी के कारण उसके पास मनोरंजन के विकल्प भी बढ़ गए हैं। अब केवल स्टारडम फिल्म की सफलता की गारंटी नहीं है। यही बदलाव फिल्म उद्योग के आर्थिक मॉडल पर भी असर डाल रहा है। अगर स्टार की लोकप्रियता फिल्म को ओपनिंग दिलाती है, लेकिन कंटेंट उसे लंबे समय तक नहीं चला पाता, तो सिर्फ स्टार के नाम पर अत्यधिक फीस देना आर्थिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है। इसलिए आने वाले समय में स्टार की फीस और फिल्म की वास्तविक सफलता के बीच सीधा संबंध बनाना जरूरी हो सकता है।
शायद भविष्य पूरी तरह फिक्स्ड फीस या पूरी तरह प्रॉफिट शेयरिंग का नहीं होगा। दोनों के बीच एक हाइब्रिड मॉडल ज्यादा व्यावहारिक दिखाई देता है। इस मॉडल में अभिनेता को एक निश्चित बेस फीस दी जा सकती है। इसके बाद फिल्म की लागत और शुरुआती निवेश की भरपाई होने पर अतिरिक्त मुनाफे में स्टार की हिस्सेदारी तय की जा सकती है। इससे अभिनेता को न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा मिलती रहेगी और निर्माता का शुरुआती जोखिम भी कम होगा। अगर फिल्म बड़ी सफलता हासिल करती है तो अभिनेता को अतिरिक्त कमाई का लाभ मिलेगा। यानी स्टार की लोकप्रियता का सही मूल्यांकन फिल्म की वास्तविक सफलता के आधार पर होगा। यह व्यवस्था फिल्म उद्योग में एक नया संतुलन पैदा कर सकती है। इससे छोटे बजट की फिल्मों के लिए खुल सकता है नया रास्ता अगर बड़े सितारे अपनी फीस का कुछ हिस्सा मुनाफे से जोड़ते हैं तो इसका सबसे बड़ा फायदा मिड बजट फिल्मों को हो सकता है। फिल्म का पैसा केवल स्टार की फीस में खर्च होने के बजाय कहानी, तकनीक और निर्माण की गुणवत्ता पर लगाया जा सकता है। इससे निर्माताओं को नई कहानियों और नए निर्देशकों के साथ प्रयोग करने का मौका मिल सकता है। शायद यही वह बदलाव है जिसकी जरूरत आज भारतीय सिनेमा को सबसे ज्यादा है। अगर हर फिल्म का बड़ा हिस्सा केवल स्टार फीस में चला जाएगा तो नए विचारों और नई प्रतिभाओं के लिए जगह कम होती जाएगी। दूसरी तरफ अगर स्टार खुद फिल्म के आर्थिक प्रदर्शन में हिस्सेदार बनता है तो वह भी बेहतर स्क्रिप्ट और मजबूत टीम चुनने में ज्यादा दिलचस्पी ले सकता है। तब फिल्म की सफलता केवल निर्माता का फायदा नहीं होगी। वह खुद भी उस सफलता से सीधे कमाएगा।
साउथ फिल्म इंडस्ट्री (south film industry) हमेशा से प्रयोग करने के लिए जाना जाता है। तकनीक से लेकर कहानी और मार्केटिंग तक उसने कई ऐसे बदलाव किए हैं जिनका असर बाद में पूरे भारतीय सिनेमा पर दिखाई दिया। अगर यहां प्रॉफिट शेयरिंग या हाइब्रिड फीस मॉडल सफल होता है तो बॉलीवुड समेत दूसरे फिल्म उद्योग भी इसे अपनाने पर विचार कर सकते हैं। समस्या केवल दक्षिण की नहीं है। पूरे भारतीय सिनेमा में बड़े बजट और स्टार फीस लगातार बढ़ रही है। ऐसे में निर्माताओं के लिए आर्थिक जोखिम कम करना जरूरी हो गया है। भविष्य में शायद किसी बड़े स्टार की फीस केवल उसकी पिछली फिल्म की सफलता देखकर तय नहीं होगी। यह भी देखा जाएगा कि वह फिल्म के जोखिम में कितना हिस्सा लेने को तैयार है। अब स्टारडम का अगला इम्तिहान बॉक्स ऑफिस नहीं, बिजनेस मॉडल है साउथ सिनेमा में शुरू हुई यह बहस आने वाले वर्षों में भारतीय फिल्म उद्योग की दिशा तय कर सकती है। एक तरफ वह पुराना मॉडल है जिसमें स्टार को भारी रकम पहले ही मिल जाती है और निर्माता फिल्म की सफलता की उम्मीद में जोखिम उठाता है। दूसरी तरफ वह नया विचार है जिसमें स्टार और निर्माता दोनों फिल्म की सफलता के साझेदार बनते हैं। शायद आने वाला समय इन दोनों के बीच का रास्ता चुनेगा। संभव है कि यह पूरे भारतीय फिल्म उद्योग में स्टार फीस से स्टार पार्टनरशिप तक के एक नए दौर की शुरुआत हो जाए।
साउथ सिनेमा की सुपरस्टार श्रुति हासन शूटिंग करते समय हुईं घायल, इंस्टाग्राम पर फोटो शेयर कर कहा- गुड डे एट वर्क
रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा की हल्दी-मेहंदी की रस्म, शादी में शामिल होने आए साउथ से कई सितारें
पीएम श्री स्कूल बना सिनेमा हॉल! छात्राओं के सामने भरी क्लास में बजे अश्लील गाने
अनंत-राधिका का प्री-वेडिंग फंक्शन, अब क्रूज में होगी सेरेमनी, फिल्म स्टार्स हुए रवाना
अगर किसी अभिनेता को फिल्म शुरू होने से पहले ही 100 करोड़ रुपए या उससे अधिक की फीस मिल जाती है, तो फिल्म के हिट होने का सबसे बड़ा फायदा निर्माता को क्यों मिले और फ्लॉप होने का सबसे बड़ा नुकसान भी उसी के हिस्से में क्यों आए? क्या ऐसा मॉडल बनाया जा सकता है जिसमें अभिनेता भी फिल्म की सफलता में ज्यादा कमाए और असफलता में कुछ जोखिम उठाए? यही बहस अब दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग के भीतर एक बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है।
स्टार की कीमत और फिल्म का बजट आमने-सामने
फिक्स्ड फीस मॉडल
प्रॉफिट शेयरिंग मॉडल
प्रॉफिट शेयरिंग मॉडल
मुनाफा आखिर तय कैसे होगा
बड़े बजट की फिल्मों ने बढ़ाई चिंता
स्टार सिर्फ अभिनेता नहीं, सबसे बड़ा ब्रांड भी
हाइब्रिड मॉडल व्यावहारिक रास्ता
फिल्म उद्योग होगा प्रभावित
ये खबरें भी पढ़ें...
रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा की हल्दी-मेहंदी की रस्म, शादी में शामिल होने आए साउथ से कई सितारें
पीएम श्री स्कूल बना सिनेमा हॉल! छात्राओं के सामने भरी क्लास में बजे अश्लील गाने
अनंत-राधिका का प्री-वेडिंग फंक्शन, अब क्रूज में होगी सेरेमनी, फिल्म स्टार्स हुए रवाना
MP कर्मचारी प्रमोशन: 10 साल बाद पदोन्नति, अब 4 साल की छूट पर अटका मामला, राज्य कर्मचारी संघ ने सीएम मोहन यादव से की मांग
By Atul Dwivedi
एमपी भाजपा में 30 सितंबर को तीन दिग्गजों की एकसाथ आमद, 236 दिन बाद मिला प्रदेश संगठन महामंत्री
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश भाजपा में अब लक्ष्मण रेखा कौन खींचेगा? चंद्रशेखर की होगी असली परीक्षा
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश के किसानों को बड़ी राहत: मिनी ट्रैक्टर पर मिलेगी 50 प्रतिशत तक सब्सिडी, ऑनलाइन पोर्टल पर ऐसे करें आवेदन
By Jitendra Shrivastava
mp-top-news: खबरें काम की... ब्राह्मणों ने कभी शासन नहीं किया, नरोत्तम मिश्रा बोले खामोशी को कमजोरी न समझें
By Sanjay Dhiman
झाबुआ संयुक्त कलेक्टर अक्षय सिंह की नौकरी खतरे में, फर्जी जाति प्रमाणपत्र में ऐसे घिरे
By Sanjay Gupta
बस्तर में बाढ़ का जायजा लेने पहुंचे CM साय, प्रभावित परिवारों से मिले, 10 हजार रुपए अतिरिक्त सहायता की घोषणा
By Arun Tiwari