जलवायु परिवर्तन बना स्वास्थ्य संकट, भारत में बढ़ रहीं बीमारियां: डॉ. नरेश त्रेहन
The Sootr | Apr 07, 2026, 14:40 IST
Dr Naresh Trehan
मेदांता के चेयरमैन डॉ. नरेश त्रेहन ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन अब एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है। भारत में हैजा, मलेरिया, हीटस्ट्रोक और वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।
समझें क्या है पूरा मामला
- मेदांता के चेयरमैन डॉ. नरेश त्रेहन ने जलवायु परिवर्तन को स्वास्थ्य आपातकाल बताया है।
- बदलते मौसम से भारत में हैजा, टाइफाइड और मलेरिया तेजी से फैल रहे हैं।
- बढ़ती गर्मी से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, जो दिल और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है।
- ओडिशा, तेलंगाना और विदर्भ में हीटस्ट्रोक से मौतें बढ़ रही हैं।
- जलवायु संकट अब सिर्फ पर्यावरण की नहीं, बल्कि इंसानी जान की समस्या है।
जलवायु बदलाव और बीमारियों का रिश्ता
मेदांता (Medanta) के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. नरेश त्रेहन ने इस विषय पर बेहद जरूरी बात कही है। वे कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन अब एक वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है। इसे सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा समझना बड़ी भूल है।
भारत पर सबसे ज्यादा असर
दूसरी तरफ, सूखाग्रस्त इलाकों में पानी की किल्लत बढ़ रही है। वहां लोग असुरक्षित पानी पीने पर मजबूर हैं, जिससे दस्त और गंभीर डिहाइड्रेशन के मामले बढ़ रहे हैं।
बीमारियों का दायरा फैल रहा है
इसकी वजह है कि गर्म और नम मौसम लंबे समय तक टिका रहता है, जो मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल है। मलेरिया, जो पहले गंगा के मैदानों और मध्य भारत के गर्म इलाकों तक सीमित था, अब हिमाचल प्रदेश जैसे ठंडे राज्यों में भी रिपोर्ट हो रहा है। यह बदलाव बहुत चिंताजनक है।
वायु प्रदूषण बन रहा है बड़ा दुश्मन
ये कण सांस के जरिए फेफड़ों की गहराई में और फिर खून में मिल जाते हैं। इनसे फेफड़े कमजोर होते हैं, अस्थमा और सीओपीडी (COPD - Chronic Obstructive Pulmonary Disease) जैसी बीमारियां बढ़ती हैं।
साथ ही ये कण रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। किडनी भी इस प्रदूषण से बची नहीं है।
लंबे समय तक इन कणों के संपर्क में रहने से किडनी की छनने की क्षमता कम होती है और क्रॉनिक किडनी डिजीज (Chronic Kidney Disease) का खतरा बढ़ता है।
हीटस्ट्रोक से बढ़ रही हैं मौतें
बाहर काम करने वाले मजदूर, जैसे निर्माण श्रमिक, इस खतरे से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। नवजात शिशुओं का स्वास्थ्य भी चिंताजनक है। अत्यधिक गर्मी और प्रदूषण के कारण समय से पहले जन्म और कम वजन वाले बच्चों के मामले बढ़ रहे हैं।
खाद्य सुरक्षा भी खतरे में
बढ़ती गर्मी से दुधारू पशुओं की दूध देने की क्षमता भी घटती है। इसका सीधा असर बच्चों की पोषण पर पड़ता है। डॉ. त्रेहन के मुताबिक, इन सबका मिला-जुला असर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करता है। बुजुर्ग और बच्चे इसके सबसे आसान शिकार बनते हैं।
अब और इंतजार नहीं
इसे सिर्फ पर्यावरणीय समस्या (public health)मानना इसकी गहरी मानवीय कीमत को नजरअंदाज करना है। उन्होंने कहा कि इसे एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल की तरह स्वीकार करना ही इस संकट से निपटने की पहली और सबसे जरूरी शर्त है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
भारत में गरीब और मजदूर वर्ग, बच्चे और बुजुर्ग इसकी सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। इसे सामाजिक, चिकित्सीय और नैतिक जिम्मेदारी के साथ समझना आज की जरूरत है।
FAQ
- जलवायु परिवर्तन और बीमारियों का क्या सीधा संबंध है?
जब तापमान बढ़ता है और बारिश का पैटर्न बदलता है, तो मच्छर जैसे रोग फैलाने वाले कीड़े नए इलाकों में पहुंच जाते हैं। जलजमाव से हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियां फैलती हैं। सूखे में लोग दूषित पानी पीने को मजबूर होते हैं। साथ ही गर्मी बढ़ने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जो दिल, फेफड़े और किडनी को नुकसान पहुंचाता है। यानी जलवायु परिवर्तन बीमारियों के फैलने की गति और दायरा, दोनों बढ़ा देता है। - भारत में कौन से राज्य जलवायु जनित स्वास्थ्य संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं?
ओडिशा, तेलंगाना और विदर्भ में हीटस्ट्रोक से होने वाली मौतें सबसे ज्यादा रिपोर्ट हो रही हैं। दिल्ली-एनसीआर और मुंबई में बढ़ते वायु प्रदूषण और रात के तापमान में वृद्धि से हृदय रोग बढ़ रहे हैं। हिमाचल प्रदेश जैसे ठंडे राज्यों में अब मलेरिया के मामले भी सामने आ रहे हैं, जो पहले वहां नहीं होते थे।
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