अंग्रेजों से मुक्ति के लिए छत्तीसगढ़ के परलकोट में गेंद सिंह ने की थी सशस्त्र क्रांति

The Sootr | Jan 19, 2025, 15:34 IST
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Gend Singh
Gend Singh

गेंदसिंह, छत्तीसगढ़ के परलकोट क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ पहली सशस्त्र क्रांति के नायक थे। 1825 में उनको फांसी दी गई थी, उनका बलिदान बस्तर के इतिहास में अमर है।

भारत को अंग्रेजों से मुक्ति सरलता से नहीं मिली। पूरा देश मानों भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने उठ खड़ा हुआ था। क्या नगर वासी, क्या ग्राम वासी और क्या वनवासी। सभी क्षेत्रों में क्रांति की ज्वाला धधक उठी। ऐसे ही क्रांतिकारी थे वनवासी गेंद सिंह जिन्होंने छत्तीसगढ़ के बस्तर जिला अंतर्गत परलकोट में सशस्त्र क्रांति की थी। इतिहास की पुस्तकों में यह क्रांति परलकोट विद्रोह के नाम से दर्ज है।

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अंग्रेजों को जवाब देने गेंद सिंह आगे आए

पारलकोट में मुख्यतः शत प्रतिशत जनजातीय आबादी वाला क्षेत्र है जिसे अबूझमाड़ भी कहते है। यह असीम वन और खनिज संपदा वाला क्षेत्र है। 1757 के बाद अंग्रेजों ने अपना विस्तार आरंभ किया। चर्च के सहयोग से उनके सैन्य अधिकारी देशभर में फैले। इसके साथ ही उन्होंने वन्य संपदा पर अधिकार करना आरंभ कर दिया था। इसके लिए उन्होंने दो स्तरीय रणनीति बनाई। एक और सैन्य शक्ति से राजाओं और जमींदारों को अपने अधीन बनाकर मनाने की वसूली जिससे वे जनता पर अत्याचार करें और दूसरा चर्च के माध्यम से सेवा सहायता के बहाने जन सामान्य को प्रभावित करना। वे क्षेत्र अंग्रेजों की प्राथमिकता थे जो प्राकृतिक संपदा से भरे हों। छत्तीसगढ़ और बस्तर इन्ही में से एक था। अंग्रेजों ने बल बढ़ाया और वनक्षेत्र पर अधिकार कर लिया। आदिवासियों को खदेड़ना अत्याचार करना आरंभ कर दिया। इसका प्रतिकार करने के लिए क्रांतिकारी गेंद सिंह आगे आए। उनके जन्म तिथि का स्पष्ट विवरण नहीं मिलने। पर उनके द्वारा सशस्त्र क्रांति के आरंभ की तिथि स्पष्ट है। उन्होंने 1824 में पूरे अबूझमाड़ समाज को एकत्र किया। यद्यपि साधनों का अभाव था वनवासियों के पास तीर कमान, लाठी और और गोप ही थे। पर हौंसला सबका बुलंद था। उन्होंने प्रत्येक अपने स्वत्व के लिए प्राण देने का संकल्प कर चुका था।

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अंग्रेजों के खिलाफ गेंद सिंह ने खोला मोर्चा

वीर गेंद सिंह ने समूचे क्षेत्र के आदिवासियों को एकत्र कर अंग्रेज से मुक्ति का आह्वान किया। इस क्रांति का केन्द्र पातालकोट था। यह जमींदारी का केन्द्र था। इस परलकोट जमीदारी के अंतर्गत 165 गांव आते थे। सभी गांवो में क्रांति की लहर फैल गई। यह क्षेत्र महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के लगा है। और तीन नदियों का संगम क्षेत्र है इस प्राकृतिक अनुकूलता के चलते वासियों को अपने संदेश यहां वहां भेजने में सहायता मिली। पास का एक वनवासी गांव है, यहां तीन नदियों का संगम है। नदी पर्वतों और घने वनक्षेत्र के कारण क्रांति के दमन के लिए भीतर न घुस सके और लगभग एक वर्ष तक पूरा क्षेत्र अंग्रेजों से मुक्त रहा। अंग्रेजों की बंदूकों की मानों बेअसर हो गई। वनवासियों ने अपने धनुष बाण और भालों से अंग्रेजी अधिकारियों और उनके सैनिकों को घुसने ही न दिया । इस सशस्त्र संघर्ष में महिलाओं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों से लोहा ले रहीं थीं । शत्रु जहां दिखता उसपर तीरों की बरसात हो जाती और वह वहां यमलोक सिधार जाता। घोटुल और दूसरे उत्सव मानों संघर्ष की रणनीति बनाने के समागम होते। वनवासियों ने कुछ केंद्र बनाकर पांच-पांच सौ की संख्या में गुट बना कर मोर्चाबंदी कर ली थी थे। इन समूहों का नेतृत्व महिलाओं और पुरुष दोनों के हाथ में था और क्रांतिकारी गेंद सिंह इन सबका समन्वय कर रहे थे।

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वनवासियों का हथियार डालने से इंकार

यह संघर्ष इतना व्यापक हो गया था कि अंग्रेजों ने इससे निबटने के लिए ब्रिटिश सैन्य अधिकारी एग्न्यू की कमान में सैन्य टुकड़ी भेजी। आधुनिक हथियारों से युक्त इस टुकड़ी ने अत्याचारों का सारा रिकार्ड तोड़ दिया। लेकिन वनवासियों ने हथियार डालने से इंकार कर दिया। अंत में एग्न्यू की सहायता के लिए एक बड़ी सेना परलकोट पहुंची। इस सेना के साथ तोपखाना भी था।10 जनवरी 1825 को परलकोट घेर लिया गया। आधुनिक बंदूकों और तोपखाने के आगे पूरा क्षेत्र वीरान होने लगा। वनवासियों के शव गिरने लगे। अंततः अपने क्षेत्र को भीषण तबाही से बचाने के लिये क्रांतिकारी नायक गेंद सिंह ने समर्पण कर दिया और गिरफ्तार कर लिए गए। उनकी गिरफ्तारी से आंदोलन थम गया। गिरफ्तारी के 10 दिन बाद ही 20 जनवरी 1825 को परलकोट महल के सामने ही गेंद सिंह को फांसी दे दी गई। बस्तर को अंग्रेजों से मुक्त कराने का सपना लिये फांसी के फंसे पर झूल गए। छत्तीसगढ़ के इतिहास में क्रांतिकारी गेंद सिंह का पहला बलिदान माना गया।

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  • लेखक रमेश शर्मा
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