धर्म बदला तो खत्म होगा SC/ST का दर्जा, ईसाई धर्म अपनाने पर नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ

Amresh Kushwaha | Mar 24, 2026, 13:47 IST
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christianity religion change sc st status supreme court verdict
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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ईसाई धर्म अपनाने पर व्यक्ति अपनी SC की पहचान और आरक्षण का लाभ खो देता है। क्योंकि SC दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्धों तक सीमित है।

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण और जातिगत दर्जे को लेकर एक अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति आपने धर्म को छोड़कर ईसाई धर्म अपनाता है, तो वह अनुसूचित जाति का अपना दर्जा खो देगा।

इसका सीधा अर्थ यह है कि धर्म परिवर्तन के बाद उस व्यक्ति को एससी/एसटी एक्ट के तहत मिलने वाला कानूनी संरक्षण और आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकेगा।

धर्म परिवर्तन और जातिगत पहचान पर अदालत का कड़ा रुख

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल उन लोगों तक सीमित है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। कोर्ट के अनुसार, ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाला व्यक्ति तकनीकी और कानूनी रूप से अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रह जाता। ऐसे में, वह व्यक्ति SC/ST एक्ट के तहत किसी भी प्रकार की सुरक्षा या विशेष अधिकार का दावा नहीं कर सकता।

क्या था पूरा मामला?

यह कानूनी विवाद आंध्र प्रदेश के एक पादरी (Pastor) चिंथदा आनंद से जुड़ा है। आनंद ने अक्काला रामिरेड्डी और अन्य लोगों पर जातिगत भेदभाव और दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए SC/ST एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी।

इसके खिलाफ रामिरेड्डी ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मई 2025 में हाईकोर्ट के जस्टिस एन. हरिनाथ ने इस एफआईआर को रद्द कर दिया था।

कोर्ट का तर्क था कि चूंकि आनंद ईसाई धर्म अपना चुके हैं, इसलिए वे अनुसूचित जाति के दायरे से बाहर हैं। इसी फैसले को चुनौती देते हुए आनंद ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। इसे अब सर्वोच्च अदालत ने भी खारिज कर दिया है।

पादरी होने के सबूत और हाईकोर्ट का तर्क

मामले की गहराई में जाने पर पता चला कि पादरी चिंथदा आनंद पिछले एक दशक से अधिक समय से ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे। साथ ही, चर्च में रविवार की प्रार्थनाएं (Sunday Prayers) भी आयोजित कराते थे।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि भले ही आनंद के पास अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र मौजूद हो, लेकिन ईसाई धर्म में जातिगत भेदभाव का अस्तित्व नहीं माना जाता। इसलिए, ईसाई धर्म अपनाने के साथ ही उनकी पुरानी जातिगत पहचान और उससे जुड़ी कानूनी सुरक्षा अमान्य हो गई।

क्यों नहीं मिलेगा SC/ST एक्ट का संरक्षण?

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड्स और तथ्यों की जांच के बाद पाया कि जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से ईसाई धर्म स्वीकार कर लेता है और पादरी के रूप में सक्रिय रहता है, तो उसे अनुसूचित जाति समुदाय का हिस्सा नहीं माना जा सकता।



बेंच ने दोहराया कि SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम (Prevention of Atrocities Act) का उद्देश्य उन लोगों को सुरक्षा देना है जो सामाजिक रूप से इस श्रेणी में आते हैं। धर्म बदलने के बाद, व्यक्ति उस विशेष सामाजिक और कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाता है।

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