ICMR का सबसे बड़ा खुलासा: 87% से ज्यादा भारतीयों का कोलेस्ट्रॉल लेवल खराब

Manya Jain | Jul 19, 2026, 17:15 IST
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icmr study cholesterol crisis india
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ICMR की स्टडी में खुलासा: 87.3% भारतीयों का कोलेस्ट्रॉल स्तर असामान्य। सामान्य वजन, शुगर और बीपी वाले फिट लोग भी इसकी चपेट में हैं। यह समस्या अब हर वर्ग में फैल चुकी है।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी ICMR की देशव्यापी स्टडी में बड़ा खुलासा हुआ है। स्टडी के अनुसार 87.3% भारतीय वयस्कों का कोलेस्ट्रॉल स्तर असामान्य पाया गया।

यह स्टडी 23 हजार 665 लोगों के सैंपल पर आधारित है, जो देश के हर राज्य से लिए गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सामान्य वजन, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर वाले लोग भी इसकी चपेट में हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह समस्या अब सिर्फ शहरों या मोटे लोगों तक सीमित नहीं रही।

ज्यादातर लोग हाई कोलेस्ट्रॉल को उम्र, मोटापे या डायबिटीज से जोड़कर देखते हैं। लेकिन असली खतरा उन लोगों में छिपा हो सकता है जो पूरी तरह फिट और सेहतमंद दिखते हैं। ICMR की यह स्टडी इसी धारणा को चुनौती देती है।

डिस्लिपिडेमिया क्या है

खून में वसा यानी फैट का असंतुलन होना डिस्लिपिडेमिया (Dyslipidemia – खून में वसा का असंतुलन) कहलाता है। यह समस्या बुखार या दर्द की तरह महसूस नहीं होती।

cholestrol
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इंसान बाहर से पूरी तरह स्वस्थ दिखता है, जबकि अंदर ही अंदर धमनियों में खराब फैट जमा होता रहता है। सालों तक चलने वाली यह प्रक्रिया धीरे-धीरे धमनियों को संकरा कर देती है। इससे आगे चलकर हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

गुड कोलेस्ट्रॉल की कमी सबसे बड़ी वजह

स्टडी में सामने आया कि हर तीन में से करीब दो वयस्कों में एचडीएल यानी गुड कोलेस्ट्रॉल की कमी पाई गई। एचडीएल (HDL – High Density Lipoprotein) शरीर से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल बाहर निकालने में मदद करता है। इसके बाद सबसे ज्यादा मामले एलडीएल यानी बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के मिले। इसके अलावा हाई ट्राइग्लिसराइड और हाई टोटल कोलेस्ट्रॉल के मामले भी सामने आए।

डॉ. वी मोहन, जो इस स्टडी के लेखकों में से एक हैं और चेन्नई स्थित डॉ. मोहन डायबिटीज स्पेशलिटीज सेंटर के चेयरमैन हैं, बताते हैं कि भारतीयों का खान-पान कार्बोहाइड्रेट की अधिकता वाला रहा है।

उनके मुताबिक ज्यादा कार्ब्स ट्राइग्लिसराइड बढ़ाते हैं और इससे गुड कोलेस्ट्रॉल घट जाता है। डॉ. मोहन के अनुसार, अकेला यही कारण भारतीयों में डिस्लिपिडेमिया के करीब 90 प्रतिशत मामलों के पीछे है। वे सुझाव देते हैं कि थाली में एक चौथाई हिस्सा कार्ब्स, एक चौथाई प्रोटीन और बाकी आधा हिस्सा फल-सब्जियों का होना चाहिए।

35 करोड़ से ज्यादा लोग खतरे में

स्टडी का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह रहा कि सामान्य ब्लड शुगर, सामान्य ब्लड प्रेशर और बिना मोटापे वाले करीब 35.5 करोड़ भारतीयों में भी असामान्य कोलेस्ट्रॉल पाया गया। यानी लाखों ऐसे लोग जिन्हें आमतौर पर पूरी तरह स्वस्थ माना जाता है, वे भी भविष्य में दिल की बीमारी के खतरे में हो सकते हैं।

यह खोज कोलेस्ट्रॉल जांच के पुराने तरीके पर भी सवाल उठाती है, जिसमें सिर्फ डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या मोटापे वाले लोगों की ही जांच की जाती रही है।

30 की उम्र में ही शुरू हो जाता है खतरा

स्टडी का एक और अहम पहलू यह है कि दिल से जुड़ा खतरा माना जाने से कहीं पहले शुरू हो जाता है। डिस्लिपिडेमिया के सबसे ज्यादा मामले 30 से 39 साल की उम्र के बीच पाए गए। यानी शरीर में यह गड़बड़ी जीवन के सबसे सक्रिय और उत्पादक वर्षों में ही शुरू हो जाती है।

भारत जैसे युवा आबादी वाले देश के लिए यह बड़ी बात है। कम उम्र में शुरुआत का मतलब है कि कोलेस्ट्रॉल से जुड़ा नुकसान लंबे समय तक शरीर पर असर डालता रहता है। इससे समय से पहले दिल की बीमारी होने का खतरा और बढ़ जाता है।

महिलाओं में ज्यादा असर

स्टडी के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाओं में डिस्लिपिडेमिया ज्यादा पाया गया। शहरी लोग गांव में रहने वालों से ज्यादा प्रभावित मिले, हालांकि ग्रामीण भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।

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शहर और गांव के बीच का यह फासला बहुत ज्यादा नहीं है। इससे पता चलता है कि बदलता खान-पान और घटती शारीरिक गतिविधि अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही।

किन लोगों में खतरा ज्यादा

जिन लोगों को पहले से डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या मोटापा है, उनमें असामान्य कोलेस्ट्रॉल के मामले और ज्यादा पाए गए। ज्यादा बॉडी मास इंडेक्स और बिगड़ता ब्लड शुगर स्तर भी इसका खतरा बढ़ाता है। बैठे रहने वाली जीवनशैली भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है।

दिल की बीमारी भारत में मौत का सबसे बड़ा कारण बनी हुई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि डिस्लिपिडेमिया इसके सबसे बड़े लेकिन सबसे ज्यादा नियंत्रित किए जा सकने वाले कारणों में से एक है।

अब स्क्रीनिंग का तरीका बदलने की जरूरत

स्टडी के लेखकों का मानना है कि देश में कोलेस्ट्रॉल जांच की रणनीति बदलनी चाहिए। सिर्फ डायबिटीज, ब्लड प्रेशर या मोटापे वाले लोगों की जांच का इंतजार करने से लाखों जोखिम वाले लोग पहचान से बाहर रह सकते हैं।

इसकी बजाय व्यापक स्तर पर जांच, समय रहते पहचान और जीवनशैली में सुधार जैसे कदम भविष्य में हार्ट अटैक और स्ट्रोक के मामलों को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

बचाव के आसान तरीके

रोजाना शारीरिक गतिविधि, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और ट्रांस फैट कम करना, ज्यादा फल-सब्जियां और साबुत अनाज खाना, सही वजन बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से दवाएं लेना, ये सब दिल की बीमारी का खतरा काफी हद तक घटा सकते हैं।

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सबसे जरूरी बात यह है कि सिर्फ जवान, दुबले या डायबिटीज-मुक्त होने की वजह से खुद को सुरक्षित मान लेना गलत है। अगर भारत को दिल की बीमारियों से जुड़े बढ़ते खतरे को रोकना है, तो कोलेस्ट्रॉल की जांच जल्दी शुरू करनी होगी। बचाव को प्राथमिकता बनाना होगा और हर घर तक जागरूकता पहुंचानी होगी।

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