मोबाइल छीन रहा है मासूमों का बचपन, मम्मी-पापा की जगह बोल रहे लाइक-शेयर
Kaushiki | Jun 23, 2026, 12:00 IST
kids mobile addiction screen time risk
आजकल बच्चे बोलना सीखते ही मम्मी-पापा से पहले लाइक, शेयर और सब्सक्राइब जैसे शब्द बोलने लगे हैं। कम उम्र में मोबाइल मिलने से बच्चों का मानसिक और सामाजिक विकास प्रभावित हो रहा है। एक्सपर्ट्स ने स्क्रीन टाइम कम करने की सलाह दी है।
Kids Mobile Addiction: आजकल के बच्चों का बचपन बदल रहा है। अब बच्चे मम्मी-पापा बाद में बोलते हैं। वे सबसे पहले लाइक, शेयर, फॉलो सीख रहे हैं। हैलो गाइज और बेल आइकन दबाओ आम हो गया है। ये शब्द अब सिर्फ यूट्यूब तक सीमित नहीं हैं।
छोटे बच्चे भी इन्हें धड़ल्ले से बोल रहे हैं। वे पसंदीदा यूट्यूबरों की पूरी नकल करने लगे हैं। उनके बोलने का लहजा और हावभाव अपना रहे हैं। यह बदलाव समाज में तेजी से देखा जा रहा है।
![Kids Mobile Addiction]()
बच्चे बोलते ही इंटरनेट (बच्चों में मोबाइल की लत) की भाषा अपनाने लगे हैं। वे कार्टून कैरेक्टर की आवाज की भी नकल करते हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक बनती जा रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि मोबाइल जल्दी मिल रहा है।
आजकल माता-पिता बहुत व्यस्त रहने लगे हैं। वे अपने काम में बहुत ज्यादा डूबे रहते हैं। वे बच्चों को शांत करने के लिए मोबाइल देते हैं। रोते बच्चे को चुप कराने का यह आसान साधन है। खाना खिलाते समय भी फोन थमा दिया जाता है।
धीरे-धीरे यह आदत एक बड़ी लत बन जाती है। बच्चे स्क्रीन के रंग-बिरंगे वीडियो से जुड़ जाते हैं। यही स्क्रीन उनकी सीखने की दुनिया बन जाती है। उनकी सोचने और बोलने की पहली पाठशाला स्क्रीन है।
इससे उनका असली सामाजिक विकास पूरी तरह रुक जाता है। वे बाहरी दुनिया से बिल्कुल कट जाते हैं। बच्चे अब आपस में बात करना भूल रहे हैं। वे बस फोन की स्क्रीन में खोए रहते हैं। यह उनके भविष्य के लिए बहुत खतरनाक है।
चाइल्ड डेवलपमेंट स्पेशलिस्ट के मुताबिक असर गंभीर है। बच्चे पहले परिवार से भाषा सीखते थे। अब उन पर इंटरनेट की भाषा का असर है। इंटरनेट की भाषा-शैली का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ सुहास चौधरी एक जरूरी बात बताते हैं। पांच वर्ष की उम्र तक दिमाग का विकास तेज होता है। ज्यादा स्क्रीन टाइम इस विकास को नुकसान पहुंचाता है। इससे बच्चे का मेन्टल बैलेंस भी बिगड़ सकता है। बच्चों को इस लत से बचाना बेहद जरूरी है।
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जर्नल ऑफ अमरीकन मेडिकल एसोसिएशन ने शोध किया है। इसके मुताबिक रोज दो-तीन घंटे स्क्रीन देखना खतरनाक है। इससे बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म (virtual autism) का खतरा बढ़ता है। इसमें बच्चा लोगों से नजरें मिलाना बंद कर देता है।
वह अपनी भावनाएं भी व्यक्त नहीं कर पाता है। वह खुद को एक अलग दुनिया में बंद कर लेता है। साइकोलॉजिकल एक्सपर्ट पारीक कहती हैं कि यह चिंताजनक है। बच्चे बार-बार देखे गए व्यवहार की नकल करते हैं। मोबाइल की वजह से वे अकेले रहने लगते हैं।
उनका सामाजिक कौशल बहुत कमजोर होने लगता है। वे समाज के तौर-तरीके नहीं सीख पाते हैं। इससे बचने के लिए माता-पिता को कदम उठाने होंगे। डब्लूएचओ के नियम इस मामले में बहुत स्पष्ट हैं।
एक साल से छोटे बच्चों को स्क्रीन न दिखाएं। उन्हें फोन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए। दो से चार साल के बच्चों के लिए नियम हैं। उनका स्क्रीन टाइम एक घंटे से ज्यादा नहीं होना चाहिए। माता-पिता को इस नियम का पालन करना चाहिए।
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ऐसे बदलें अपने बच्चे की
बच्चों के स्क्रीन का समय सीमित करना बहुत जरूरी है। उन्हें कहानियों और किताबों से जोड़ना एक अच्छा विकल्प है। रचनात्मक गतिविधियों में उनका मन लगाएं।
उन्हें चित्रकारी और नए खिलौनों के साथ खेलने दें। बच्चों के साथ खेलकूद और पारिवारिक संवाद बढ़ाएं। उनके साथ बैठकर बातें करना सबसे बेहतर तरीका है।
जरूरत पड़ने पर ही उन्हें एजुकेशनल कंटेंट दिखाएं। स्क्रीन टाइम कम करके ही बचपन बचाया जा सकता है। बच्चों को डिजिटल दुनिया से बाहर निकालना जरूरी है।
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छोटे बच्चे भी इन्हें धड़ल्ले से बोल रहे हैं। वे पसंदीदा यूट्यूबरों की पूरी नकल करने लगे हैं। उनके बोलने का लहजा और हावभाव अपना रहे हैं। यह बदलाव समाज में तेजी से देखा जा रहा है।
Kids Mobile Addiction
यूट्यूब की बोली बन रही पहली भाषा
आजकल माता-पिता बहुत व्यस्त रहने लगे हैं। वे अपने काम में बहुत ज्यादा डूबे रहते हैं। वे बच्चों को शांत करने के लिए मोबाइल देते हैं। रोते बच्चे को चुप कराने का यह आसान साधन है। खाना खिलाते समय भी फोन थमा दिया जाता है।
डिजिटल खिलौना बन रहा है मोबाइल
इससे उनका असली सामाजिक विकास पूरी तरह रुक जाता है। वे बाहरी दुनिया से बिल्कुल कट जाते हैं। बच्चे अब आपस में बात करना भूल रहे हैं। वे बस फोन की स्क्रीन में खोए रहते हैं। यह उनके भविष्य के लिए बहुत खतरनाक है।
भाषा और दिमाग पर गहरा असर
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ सुहास चौधरी एक जरूरी बात बताते हैं। पांच वर्ष की उम्र तक दिमाग का विकास तेज होता है। ज्यादा स्क्रीन टाइम इस विकास को नुकसान पहुंचाता है। इससे बच्चे का मेन्टल बैलेंस भी बिगड़ सकता है। बच्चों को इस लत से बचाना बेहद जरूरी है।
Kids Mobile Addiction
वर्चुअल ऑटिज्म का बड़ा खतरा
वह अपनी भावनाएं भी व्यक्त नहीं कर पाता है। वह खुद को एक अलग दुनिया में बंद कर लेता है। साइकोलॉजिकल एक्सपर्ट पारीक कहती हैं कि यह चिंताजनक है। बच्चे बार-बार देखे गए व्यवहार की नकल करते हैं। मोबाइल की वजह से वे अकेले रहने लगते हैं।
बच्चे कर रहे हैं स्क्रीन की नकल
एक साल से छोटे बच्चों को स्क्रीन न दिखाएं। उन्हें फोन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए। दो से चार साल के बच्चों के लिए नियम हैं। उनका स्क्रीन टाइम एक घंटे से ज्यादा नहीं होना चाहिए। माता-पिता को इस नियम का पालन करना चाहिए।
Kids Mobile Addiction
ऐसे बदलें अपने बच्चे की मोबाइल की लत
उन्हें चित्रकारी और नए खिलौनों के साथ खेलने दें। बच्चों के साथ खेलकूद और पारिवारिक संवाद बढ़ाएं। उनके साथ बैठकर बातें करना सबसे बेहतर तरीका है।
जरूरत पड़ने पर ही उन्हें एजुकेशनल कंटेंट दिखाएं। स्क्रीन टाइम कम करके ही बचपन बचाया जा सकता है। बच्चों को डिजिटल दुनिया से बाहर निकालना जरूरी है।
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