उसके घर पर छत नहीं है... उसने संविधान के सपनों को अपना आसमान बना लिया!
Ravi Kant Dixit | Jul 27, 2026, 22:20 IST
मोहम्मद इरफान
दिल्ली की झुग्गी में रहने वाले 35 वर्षीय मजदूर मोहम्मद इरफान की कहानी संघर्ष, संविधान और उम्मीद की मिसाल है। बिना औपचारिक शिक्षा के उन्होंने संविधान की प्रस्तावना याद की, आंदोलनों से सीखा और मुश्किल हालातों के बीच भी बेहतर भारत का सपना देखना नहीं छोड़ा।
काफिर हूं, सर-फिरा हूं, मुझे मार दीजिए,
मैं सोचने लगा हूं, मुझे मार दीजिए...
है एहतिराम-ए-हजरत-ए-इंसान मेरा दीन,
बे-दीन हो गया हूं, मुझे मार दीजिए...
मैं पूछने लगा हूं सबब अपने कत्ल का,
मैं हद से बढ़ गया हूं, मुझे मार दीजिए...!!!
कुछ शेर कागज पर नहीं लिखे जाते...
वे जिंदगी की दीवारों पर लिखे जाते हैं।
कभी-कभी वे किसी ऐसी झुग्गी में जन्म लेते हैं, जहां बारिश से बचने के लिए छत नहीं होती, पर सपनों को बचाने के लिए हौसला जरूर होता है। यह कहानी भी ऐसे ही एक लड़के की है।
एक ऐसा युवा...जिसके पास कोई डिग्री नहीं है। पद नहीं है। पहचान नहीं है। वह मेहनतकश है। उसकी आंखों में ऐसा सपना पलता है, जो पढ़े-लिखे लोगों की आंखों में भी दिखाई नहीं देता।
और सपना.. एक बेहतर देश का। एक ऐसे भारत का, जहां मेहनत करने वाले हाथों की कीमत हो। जहां गरीब परिवार में जन्म लेने वाला बच्चा भी बड़े सपने देख सके। जहां संविधान किताबों में लिखे शब्द न हों, जिंदगी में महसूस किए जा सकें।
दिल्ली की एक झुग्गी में छोटा-सा घर है। करीब 12 वर्ग गज का। बस इतना ही। न आंगन। न ऊंची दीवारें। न पक्की छत। ऊपर सिर्फ एक तिरपाल की चादर है, जो मौसम से लड़ने की कोशिश करती है। बारिश आती है तो वही तिरपाल सहारा बनती है। गर्मी आती है तो वही धूप से बचाने की कोशिश करती है। सर्दी में वही ठंडी हवा को रोकने की कोशिश करती है। यही घर है उस लड़के का। यहीं उसके माता-पिता रहते हैं और दो बहनें। यहीं सोता जागता है वह युवा, जिसकी उम्र 35 साल है। उसकी अब तक की जिंदगी का हासिल सिर्फ संघर्ष है।
उसने स्कूल का मुंह नहीं देखा। बचपन में आंगनवाड़ी गया था, वहीं कुछ अक्षर सीखे। शब्द पहचाने। फिर जिंदगी ने उसे किताबों से ज्यादा संघर्ष पढ़ाया।
वह खुद को मजदूर कहता है। मानता है कि वह बहुत बोलता है। उसकी बातों में अजीब-सी मिठास है। कभी हंसी। कभी दर्द। कभी हिंदी-उर्दू शायरी की खुशबू। कभी समाज के सवालों की बेचैनी। उसे सुनने वाला कुछ देर के लिए ठहर जाता है। क्योंकि जिस आदमी के घर में किताबों की अलमारी नहीं है... उसकी जुबान पर संविधान की प्रस्तावना है। वह बिना रुके संविधान के शब्द बोलता है।
इतने विश्वास के साथ...इतनी साफगोई के साथ...कि सामने वाला सोचने लगता है कि जिसे औपचारिक शिक्षा नहीं मिली, उसने इतना सब कैसे सीख लिया?
शायद इसलिए...क्योंकि कुछ लोग स्कूलों में पढ़ते हैं और कुछ लोग जिंदगी को पढ़ते हैं।
![मोहम्मद इरफान]()
कुछ दिन पहले तक वह लड़का गुमनाम था। फिर जंतर मंतर की एक घटना ने उसे देश के सामने ला दिया। राजधानी में देश के युवा भविष्य की लड़ाई लड़ रहे थे। नीट पेपर लीक मामले को लेकर छात्रों में आक्रोश था। नई पीढ़ी अपने सपनों और मेहनत की कीमत मांग रही थी। उनके हाथों में सवाल थे। आंखों में गुस्सा। मन में चिंता थी कि क्या उनके साथ न्याय होगा?
क्योंकि एक परिवार के लिए परीक्षा सिर्फ परीक्षा नहीं होती। वह उम्मीद होती है। मां की दुआ होती है। पिता की मेहनत होती है। एक बच्चा जब पढ़ाई करता है तो उसके पीछे परिवार का संघर्ष खड़ा होता है, इसलिए पेपर लीक सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं था। यह भरोसे के टूटने का सवाल था।
इसी छात्र आंदोलन में वह दुबला पतला 35 साल का लड़का भी पहुंचा, जिसे लगता है कि देश की कहानी में उसका भी एक हिस्सा है।
कि लोकतंत्र में आवाज सिर्फ बड़े लोगों की नहीं होती।
कि सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है।
यह पहली बार नहीं था, जब वह किसी आंदोलन में पहुंचा था। उसने समाज को सिर्फ किताबों से नहीं पढ़ा। उसने लोगों के बीच जाकर सीखा है। वह पहले भी ऐसी भीड़ का हिस्सा रहा है। हर जगह वह बातें सुनता रहा। हर आंदोलन से कुछ सीखता रहा। क्योंकि उसे लगता था...देश उन लोगों से बनता है, जो सवाल पूछने की हिम्मत रखते हैं।
फिर छात्र आंदोलन में जंतर-मंतर पर पुलिस कार्रवाई हुई। लाठियां बरसीं। भीड़ में वह भी था और बर्बरता की चपेट में आ गया। पैर में चोट आई। अंगुली का नाखून उखड़ गया। अभी उसके पैर पर पट्टी बंधी है। वह अपना जख्म दिखाते हुए कहता है, कुछ लोग सादी वर्दी में थे। उन्होंने पीटा। थप्पड़ मारे। एक थप्पड़ ऐसा लगा कि एक कान से कम सुनाई देने लगा।
फिर भी उसके शब्दों में नफरत नहीं थी। वह कहता है, मैं गांधी को मानने वाला इंसान हूं। एक पल के लिए सोचिए...जिस इंसान के पास गुस्सा करने की कई वजह हो सकती थीं...उसके पास अब भी इंसानियत बची हुई है। जिसने दर्द सहा... वह दर्द बांटने की बात कर रहा है। यही बात उसे बाकी लोगों से अलग करती है।
एक तरफ उसके शरीर पर चोटों के निशान थे... दूसरी तरफ उसकी आवाज में संविधान की ताकत।
इसके बाद उसके कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए।
लोगों ने उसे सुना। देखा कि एक युवक कितनी सहजता और आत्मविश्वास के साथ संविधान की बातें कर सकता है। उसकी भाषा में बनावट नहीं थी। दिखावा नहीं था। वह जैसे जीता है...वैसे ही बोलता है। यही सादगी हर किसी को छू गई।
जब उससे पूछा गया कि संविधान की प्रस्तावना उसे इतनी आसानी से कैसे याद है? तो उसका जवाब भी उसकी जिंदगी की तरह ही अलग था। बोला कि वह एआई से सवाल पूछता है। किसी जवाब से संतुष्ट नहीं होता तो दोबारा पूछता है, क्या यह सही है? फिर जवाब को समझने की कोशिश करता है।
कुछ लोग रोटी के लिए संघर्ष करते हैं और कुछ लोग रोटी के साथ-साथ अपने विचारों को भी जिंदा रखते हैं। वह कहता है कि उसने समाज को आंदोलनों से समझा है। वह हर जगह सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर नहीं गया। वह सुनने गया। समझने गया। सीखने गया। शायद इसलिए उसकी बातों में किताबों से ज्यादा जिंदगी दिखाई देती है।
![इरफान राहुल गांधी]()
वह मजदूरों की बात करते हुए भावुक हो जाता है। गला भर आता है। वह कहता है, मजदूरों को कमजोर समझ लिया जाता है। क्योंकि मजदूर एक दिन की मजदूरी खोने का जोखिम नहीं उठा सकता। उसके घर का चूल्हा उसी दिन की कमाई से चलता है। बाहर बेरोजगार लोगों की लंबी कतार खड़ी है। इसलिए कई बार मजदूर अपनी तकलीफ कहने से पहले सोचता है। उसे डर रहता है कि अगर उसने आवाज उठाई तो काम चला जाएगा और अगर काम चला गया तो घर कैसे चलेगा?
वह कहता है, यदि कोई मजदूर अपने हक की बात करता है तो उसे हटाने में ज्यादा समय नहीं लगता, क्योंकि व्यवस्था जानती है कि उसकी जगह दूसरा मजदूर मिल जाएगा।
छात्र आंदोलन के कई चेहरे हो सकते हैं, लेकिन यह बांका नौजवान कुछ अलग था। जो किसी मंच पर नहीं था। जिसका कोई पोस्टर नहीं था। जिसका कोई नारा नहीं था। वह भीड़ में खड़ा इंसान था। एक मजदूर...जो अपने देश को बेहतर होते देखना चाहता था।
उसकी कहानी जानकर राज कपूर साहब की फिल्म आवारा का एक सीन याद आता है।
एक गरीब आदमी कटघरे में खड़ा है। वह अदालत से सवाल करता है कि अपराध सिर्फ इंसान पैदा नहीं करते...कई बार परिस्थितियां भी अपराध को जन्म देती हैं। वह उस समाज पर सवाल उठाता है, जहां गरीब बच्चे गलत रास्तों की तरफ धकेले जाते हैं।
इरफान की कहानी भी कहीं न कहीं वही सवाल दोहराती है।
सवाल यह नहीं कि वह कहां पैदा हुआ। सवाल यह है कि जिन हालातों में वह पैदा हुआ, क्या उन्हें बदलने की कोशिश हुई?
लेकिन यहां एक फर्क है।
फिल्म का किरदार कटघरे में खड़ा था।
यह लड़का लोकतंत्र के चौक पर खड़ा है। उसके हाथ में हथियार नहीं है।
उसके हाथ में संविधान है।
उसके शब्दों में गुस्सा नहीं है।
उसके शब्दों में उम्मीद है।
वह आज भगत सिंह की पंक्तियां भी दोहराता है,
"सीने पर जो जख्म हैं, सब फूलों के गुच्छे हैं,
हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।"
शायद यही उसका परिचय है।
वह पागलपन...
जो सपने देखने की हिम्मत देता है।
वह पागलपन...
जो कहता है कि हालात जैसे भी हों, उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।
अब उस लड़के का नाम जान लीजिए।
वह नेता नहीं है।
कोई अफसर नहीं है।
कोई चर्चित चेहरा नहीं है।
वह दिल्ली की झुग्गी में रहने वाला 35 साल का युवक है।
जिसने स्कूल की चारदीवारी नहीं देखी, लेकिन संविधान को समझने की कोशिश की।
जिसके घर पर पक्की छत नहीं है,
लेकिन उसने अपने सपनों के लिए पूरा आसमान चुन लिया है।
उसका नाम है, मोहम्मद इरफान।
वह उन लाखों युवाओं का चेहरा है...जो मुश्किल हालातों में पैदा होते हैं।
जो रोज मेहनत करते हैं।
जो कभी-कभी चोट भी खाते हैं,
लेकिन फिर भी सपने देखना नहीं छोड़ते।
क्योंकि शायद...
देश की सबसे बड़ी ताकत वही लोग हैं,
जिनके पास खोने के लिए बहुत कम होता है...
लेकिन उम्मीद करने के लिए पूरा आसमान होता है।
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मैं हद से बढ़ गया हूं, मुझे मार दीजिए...!!!
कुछ शेर कागज पर नहीं लिखे जाते...
वे जिंदगी की दीवारों पर लिखे जाते हैं।
कभी-कभी वे किसी ऐसी झुग्गी में जन्म लेते हैं, जहां बारिश से बचने के लिए छत नहीं होती, पर सपनों को बचाने के लिए हौसला जरूर होता है। यह कहानी भी ऐसे ही एक लड़के की है।
एक ऐसा युवा...जिसके पास कोई डिग्री नहीं है। पद नहीं है। पहचान नहीं है। वह मेहनतकश है। उसकी आंखों में ऐसा सपना पलता है, जो पढ़े-लिखे लोगों की आंखों में भी दिखाई नहीं देता।
और सपना.. एक बेहतर देश का। एक ऐसे भारत का, जहां मेहनत करने वाले हाथों की कीमत हो। जहां गरीब परिवार में जन्म लेने वाला बच्चा भी बड़े सपने देख सके। जहां संविधान किताबों में लिखे शब्द न हों, जिंदगी में महसूस किए जा सकें।
जिंदगी का हासिल सिर्फ संघर्ष है
उसने स्कूल का मुंह नहीं देखा। बचपन में आंगनवाड़ी गया था, वहीं कुछ अक्षर सीखे। शब्द पहचाने। फिर जिंदगी ने उसे किताबों से ज्यादा संघर्ष पढ़ाया।
घर में किताबें नहीं पर जुबान पर संविधान की प्रस्तावना
इतने विश्वास के साथ...इतनी साफगोई के साथ...कि सामने वाला सोचने लगता है कि जिसे औपचारिक शिक्षा नहीं मिली, उसने इतना सब कैसे सीख लिया?
शायद इसलिए...क्योंकि कुछ लोग स्कूलों में पढ़ते हैं और कुछ लोग जिंदगी को पढ़ते हैं।
मोहम्मद इरफान
एक घटना ने गुमनाम युवा को दी पहचान
क्योंकि एक परिवार के लिए परीक्षा सिर्फ परीक्षा नहीं होती। वह उम्मीद होती है। मां की दुआ होती है। पिता की मेहनत होती है। एक बच्चा जब पढ़ाई करता है तो उसके पीछे परिवार का संघर्ष खड़ा होता है, इसलिए पेपर लीक सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं था। यह भरोसे के टूटने का सवाल था।
इसी छात्र आंदोलन में वह दुबला पतला 35 साल का लड़का भी पहुंचा, जिसे लगता है कि देश की कहानी में उसका भी एक हिस्सा है।
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कि सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है।
पैर टूटा, नाखून उखड़ा मगर हिम्मत नहीं उखड़ी
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गांधी को मानने वाला इंसान
एक तरफ उसके शरीर पर चोटों के निशान थे... दूसरी तरफ उसकी आवाज में संविधान की ताकत।
इसके बाद उसके कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए।
लोगों ने उसे सुना। देखा कि एक युवक कितनी सहजता और आत्मविश्वास के साथ संविधान की बातें कर सकता है। उसकी भाषा में बनावट नहीं थी। दिखावा नहीं था। वह जैसे जीता है...वैसे ही बोलता है। यही सादगी हर किसी को छू गई।
जब उससे पूछा गया कि संविधान की प्रस्तावना उसे इतनी आसानी से कैसे याद है? तो उसका जवाब भी उसकी जिंदगी की तरह ही अलग था। बोला कि वह एआई से सवाल पूछता है। किसी जवाब से संतुष्ट नहीं होता तो दोबारा पूछता है, क्या यह सही है? फिर जवाब को समझने की कोशिश करता है।
कुछ लोग रोटी के लिए संघर्ष करते हैं और कुछ लोग रोटी के साथ-साथ अपने विचारों को भी जिंदा रखते हैं। वह कहता है कि उसने समाज को आंदोलनों से समझा है। वह हर जगह सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर नहीं गया। वह सुनने गया। समझने गया। सीखने गया। शायद इसलिए उसकी बातों में किताबों से ज्यादा जिंदगी दिखाई देती है।
इरफान राहुल गांधी
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छात्र आंदोलन के कई चेहरे हो सकते हैं, लेकिन यह बांका नौजवान कुछ अलग था। जो किसी मंच पर नहीं था। जिसका कोई पोस्टर नहीं था। जिसका कोई नारा नहीं था। वह भीड़ में खड़ा इंसान था। एक मजदूर...जो अपने देश को बेहतर होते देखना चाहता था।
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एक गरीब आदमी कटघरे में खड़ा है। वह अदालत से सवाल करता है कि अपराध सिर्फ इंसान पैदा नहीं करते...कई बार परिस्थितियां भी अपराध को जन्म देती हैं। वह उस समाज पर सवाल उठाता है, जहां गरीब बच्चे गलत रास्तों की तरफ धकेले जाते हैं।
इरफान की कहानी भी कहीं न कहीं वही सवाल दोहराती है।
सवाल यह नहीं कि वह कहां पैदा हुआ। सवाल यह है कि जिन हालातों में वह पैदा हुआ, क्या उन्हें बदलने की कोशिश हुई?
लेकिन यहां एक फर्क है।
फिल्म का किरदार कटघरे में खड़ा था।
यह लड़का लोकतंत्र के चौक पर खड़ा है। उसके हाथ में हथियार नहीं है।
उसके हाथ में संविधान है।
उसके शब्दों में गुस्सा नहीं है।
उसके शब्दों में उम्मीद है।
वह आज भगत सिंह की पंक्तियां भी दोहराता है,
"सीने पर जो जख्म हैं, सब फूलों के गुच्छे हैं,
हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।"
शायद यही उसका परिचय है।
वह पागलपन...
जो सपने देखने की हिम्मत देता है।
वह पागलपन...
जो कहता है कि हालात जैसे भी हों, उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।
अब उस लड़के का नाम जान लीजिए।
वह नेता नहीं है।
कोई अफसर नहीं है।
कोई चर्चित चेहरा नहीं है।
वह दिल्ली की झुग्गी में रहने वाला 35 साल का युवक है।
जिसने स्कूल की चारदीवारी नहीं देखी, लेकिन संविधान को समझने की कोशिश की।
जिसके घर पर पक्की छत नहीं है,
लेकिन उसने अपने सपनों के लिए पूरा आसमान चुन लिया है।
उसका नाम है, मोहम्मद इरफान।
वह उन लाखों युवाओं का चेहरा है...जो मुश्किल हालातों में पैदा होते हैं।
जो रोज मेहनत करते हैं।
जो कभी-कभी चोट भी खाते हैं,
लेकिन फिर भी सपने देखना नहीं छोड़ते।
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