शंकराचार्य पद पर विवाद: अविमुक्तेश्वरानंद साबित करें वे शंकराचार्य हैं या नहीं?

अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शंकराचार्य पद को लेकर विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। आखिर इतने बड़े संत को लेकर यह विवाद क्यों शुरू हुआ और क्या है इसके पीछे का विवाद, बेहद सरल शब्दों में समझिए…

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Anjali Dwivedi
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News In Short

  • शंकराचार्य पद पर विवाद: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को शंकराचार्य का पद दिए जाने पर विवाद शुरू हो गया है।

  • अविमुक्तेश्वरानंद का धरना: माघ मेले में अविमुक्तेश्वरानंद का प्रशासन से टकराव हुआ, उनका धरना जारी है।

  • नोटिस जारी: मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है।

  • सुप्रीम कोर्ट में मामला: शंकराचार्य पद के विवाद में सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है।

  • स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बयान: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि उनके पद का निर्णय शंकराचार्य ही करेंगे।

News In Detail

प्रयागराज माघ मेला में मौनी अमावस्या के स्नान के समय शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच शुरू हुआ टकराव खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। प्रशासन ने उन्हें स्नान के लिए पालकी पर चढ़ने से रोक दिया, जिसके बाद शंकराचार्य और उनके समर्थकों ने धरना शुरू कर दिया।

इस मामले को लेकर मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी किया है। इसमें 24 घंटे के भीतर यह साबित करने को कहा गया है कि वह शंकराचार्य हैं।

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पुरानी है विवाद की कहानी

दरअसल यह विवाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य पद पर काबिज होने के बाद शुरू हुआ था। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन 11 सितंबर 2022 को हुआ था। इसके तुरंत बाद उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य घोषित किया गया।

इस घोषणा के बाद संन्यासी अखाड़ों ने विरोध शुरू कर दिया, जो उसी समय से चला आ रहा विवाद है। कई धार्मिक नेताओं ने इसे नियमों के खिलाफ बताया था।

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सुप्रीम कोर्ट में विवाद: क्या है मामला?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य बनने के खिलाफ एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी। अदालत ने 16 सितंबर 2022 को शंकराचार्य के रूप में उनके पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी थी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में अब भी लंबित है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दावा है कि उनका पट्टाभिषेक पूरी तरह से सही तरीके से हुआ था और इसे वसीयत के अनुसार मान्यता मिली थी।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि शंकराचार्य का निर्णय धर्मपीठों द्वारा लिया जाता है, न कि प्रशासन या सरकार द्वारा। उन्होंने दावा किया है कि शृंगेरी और द्वारका के शंकराचार्यों ने उन्हें स्वीकार किया है और उनका समर्थन किया है।

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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का इतिहास

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था। उनका असली नाम उमाशंकर उपाध्याय था। उन्होंने अपनी शिक्षा प्रतापगढ़ और काशी में प्राप्त की। 2000 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से दीक्षा लेने के बाद उन्होंने अपना नाम स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद रखा।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने बयानों और गतिविधियों को लेकर हमेशा चर्चा में रहे हैं। उन्होंने 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उम्मीदवार उतारने की कोशिश की थी। इन दिनों वह गोरक्षा को लेकर सक्रिय हैं।

शंकराचार्य पद और परंपरा

आदि शंकराचार्य ने चार प्रमुख पीठों की स्थापना की थी। जिनमें से ज्योतिष मठ (बद्रिकाश्रम) और गोवर्धन पीठ (पुरी) प्रमुख हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया था, लेकिन इस नियुक्ति पर विवाद जारी है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि उन्होंने धार्मिक परंपराओं का पालन किया है और उनके शंकराचार्य बनने का निर्णय पूरी तरह से सही था।

FAQ

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य कैसे नियुक्त किया गया?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद शंकराचार्य नियुक्त किया गया था।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने शंकराचार्य के रूप में उनकी नियुक्ति को चुनौती दी है?
हां, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति के बाद पट्टाभिषेक समारोह पर रोक लगा दी थी और इस मामले की सुनवाई अभी भी चल रही है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का विरोध क्यों हो रहा है?
कई संन्यासी अखाड़ों और धार्मिक नेताओं ने उनकी नियुक्ति को नियमों के खिलाफ बताया है और उनका दावा किया है कि शंकराचार्य के पद की नियुक्ति में प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

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