NEWS STRIKE: 3 दिन में 15 बिल पास, चर्चा शून्य! मप्र विधानसभा में खो गए जनता के मुद्दे?
Harish Divekar | Jul 25, 2026, 07:00 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEWS STRIKE: मप्र विधानसभा का मानसून सत्र तीन दिन में खत्म हुआ। हंगामे के बीच 15 विधेयक बिना सार्थक बहस पारित हुए। जनता, किसान, युवा और ओबीसी से जुड़े सवाल पीछे छूट गए।
News Strike | न्यूज स्ट्राइक:जंतर मंतर पर पिछले चार दिन से क्या चल रहा है। सब जानते हैं, लेकिन पिछले चार दिन में एमपी विधानसभा में क्या-क्या हुआ क्या आप जानते हैं। मप्र विधानसभा का मानसून सत्र शुरू हुआ और खत्म भी हो गया।
विपक्ष धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो इस्तीफा दो चिल्लाता रहा। उस शोर के बीच बिना किसी सार्थक बहस के बड़े फैसले हो गए। यूसीसी जैसा अहम बिल ध्वनि मत से पास हो गया।
अलग-अलग मुद्दों पर कांग्रेस बिखरी रही। साफ दिखा कि आला नेताओं को सत्र में चर्चा से ज्यादा दतिया उपचुनाव की फिक्र है, लेकिन जहा उस जनप्रतिनिधि से पूछिए जो मतदाताओं की आवाज बनकर सदन में पहुंचता है। कांग्रेस का हो या बीजेपी का, क्या उससे चर्चा होना जरूरी नहीं था।
विधायक कौन होता है। क्या वो ऐसा राजनेता है जो सिर्फ सत्ता पाने की चाह में चुनाव लड़ता है या एकमात्र मकसद मंत्री बनना ही होता है। हो सकता है कि चंद ऐसे विधायक हों जो जीतने के बाद मतदाता की उम्मीदों पर खरे न उतरे हों।
ऐसे विधायकों को जनता चुनावों के जरिए ही जवाब देते हैं, लेकिन कुछ विधायक ऐसे भी हैं जो वाकई जनता की आवाज बनकर सदन तक पहुंचते हैं। और, पार्टी की परवाह किए बगैर जनता से जुड़े सवाल पूछते हैं।
विधानसभा के बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र आहूत ही इसलिए होते हैं कि वोटर की बात हुक्मरानों तक पहुंच पाए। लेकिन इस बार मानसून सत्र का नजारा देखकर लगा कि वाकई बहुत से विधायकों को मतदाता की आवाज बनने का शौक नहीं है या फिर उस आवाज को दबाया जा रहा है।
बीस जुलाई के बाद से पूरा देश स्क्रीन पर नजरें गढ़ाए बैठा है। जो न्यूज जानने के शौकीन हैं वो खबरिया चैनलर्स पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन देख रहे हैं। जो खबरों की दुनिया में नहीं डूबे हैं वो भी किसी न किसी सोशल मीडिया के मार्फत इस प्रदर्शन को बड़े गौर से फॉलो कर रहे हैं।
प्रदर्शन की वजह से लोकसभा की कार्यवाही पर असर पड़ रहा है। दोनों सदन तकरीबन हर रोज स्थगित हो रहे हैं। क्योंकि चर्चा हो ही नहीं पा रही। इन सबके बीच मप्र की विधानसभा में कार्यवाही जोरों से चली। बड़े-बड़े बिल पास हो गए।
कांग्रेस से उम्मीद थी कि विपक्ष होने के नाते शायद कुछ सवाल उठाएगी। सवाल उठाए भी, लेकिन कांग्रेस का हर सवाल कॉकरोच जनता पार्टी के मुद्दों के आसपास और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के आसपास ही सिमटा रहा।
कांग्रेस ने खुद उन मुद्दों पर खास ध्यान नहीं दिया जो खुद बहुत पहले से उठा रही हो। फिर बात चाहें केन बेतवा परियोजना की खिलाफत करने वाले आदिवासियों की हो, टीईटी के नियमों में उलझे टीचर्स की हो या फिर किसानों की हो।
कांग्रेस की आवाज में सिर्फ नीट पेपर लीक ही ज्यादा सुनाई दिया। पांच दिन का सत्र सिर्फ तीन दिन में खत्म हुआ। वजह बना दतिया उपचुनाव। कांग्रेस और बीजेपी माने या न माने लेकिन दोनों ही पार्टी को जल्दी थी दतिया पहुंचने की।
ये उपचुनाव सरकार के लिए नाक का सवाल है तो कांग्रेस के लिए साख का, जिसकी घड़ियां अब नजदीक हैं। ऐसे में पूरा सत्र हंगामेदार रहा। उसके बाद भी सरकार ने 15 अलग-अलग बिल पास करवा लिए।
मप्र विधानसभा के मानसून सत्र को 22 जुलाई 2026 को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया। सत्र छोटा था लेकिन वित्तीय और विधायी काम बहुत तेजी से पूरे हुए। इस सत्र में सरकार ने साल 2026-27 का अनुपूरक बजट पास करवा लिया।
ये बजट 7,765.76 करोड़ रुपए का है जिससे नर्मदा घाटी विकास, मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा और एजुकेशन सेक्टर में काम होंगे। नर्मदा घाटी विकास विभाग केलिए तीन हजार करोड़ रुपए आवंटित हुए हैं।
परिवहन योजनाओं पर 101 करोड़ खर्च होंगे। प्रधानमंत्री ई-बस सेवा योजना पर 50 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके अलावा स्कूल शिक्षा, पुलिस विभाग और डिजास्टर मैनेजमेंट पर भी बड़ी राशि खर्च होगी।
इसके अलावा यूसीसी विधेयक भी सदन में ध्वनि मत से पारित हो गया। विधेयक पास होन के बाद मप्र सरकार ने जमकर अपनी पीठ थपथपाई। ऐसा करने वाला मप्र देश का चौथा राज्य जो बन गया है।
अब मप्र में एक से ज्यादा शादी करना अपराध माना जाएगा। लिव इन रिलेशन में रहने वालों को एक महीने के भीतर अपने रिश्ते को रिजस्टर करवाना होगा। शादी का रजिस्ट्रेशन भी अनिवार्य है।
संपत्ति के बंटवारे में महिला और पुरुष को समान अधिकार दिए गए हैं। हालांकि, राज्य की कई आदिवासी जनजातियों को इससे अलग रखा गया है।
इन सबके अलावा इस छोटे से सत्र में कुल 15 अहम विधेयक पारित हो गए। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार किसान, युवा और ओबीसी आरक्षण जैसे मुद्दे से बचना चाहती है।
बीजेपी ने कहा कि खुद कांग्रेस सदन का वक्त बरबाद कर रही है। इन आरोप प्रत्यारोप को बीच कांग्रेस को सदन में हंगामा करना था सो खूब किया और सरकार को जो विधेयक पास कराने थे वो विधेयक पास हो गए। कांग्रेस तो कुछ मुद्दों पर बंटी हुई भी नजर आई।
सत्र के आखिरी दिन रानी दुर्गावती आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक पर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की। लेकिन खुद ही बंटी हुई दिखाई दी।
जबलपुर विधायक लखन घनघोरिया ने मेडिकल यूनिवर्सिटी के बंटावारे पर विरोध दर्ज करवाया तो विधायक महेश परमार ने उज्जैन में नई मेडिकल यनिवर्सिटी खोलने पर खुशी जाहिर की।
अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी काली पट्टी बांधकर पहुंचे थे। उसी तर्ज पर कांग्रेस विधायक भी सदन में काली पट्टी बांधे दिखे। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी मांगते नजर आए, लेकिन सत्र खत्म होने के बाद अधिकांश आला नेता दतिया चले गए।
जाहिर है पांच दिन बाद मतदान है और सीट की चिंता जरूरी है, लेकिन जो विधेयक इतनी जल्दी में पारित करवाए। क्या उन पर चर्चा जरूरी नहीं थी। जो विधेयक बिना चर्चा के पारित हुए क्या उन पर किसी जनप्रतिनिधि को अपनी बात नहीं रखनी थी। या वो इतने गैर जरूरी थे कि उन पर विधायकों की बात सुनी ही न जाए।
सवाल ये है कि अगर विधेयक जरूरी थे तो सरकार ने उन्हें जल्दी में पारित क्यों करवाया। क्या किसी विधायक को किसी विधेयक पर सवाल उठाना या सवाल पूछना या अपनी राय रखना जरूरी नहीं रखा।
ये कोई दबाव है या विधायकों की सोच सिर्फ आलाकमान के इशारे और पार्टी लाइन के आसपास मंडराने तक ही सीमित रह गई है। वजह जो भी हो, मतदाता के हित में तो दोनों ही खतरा हैं।
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विपक्ष धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो इस्तीफा दो चिल्लाता रहा। उस शोर के बीच बिना किसी सार्थक बहस के बड़े फैसले हो गए। यूसीसी जैसा अहम बिल ध्वनि मत से पास हो गया।
अलग-अलग मुद्दों पर कांग्रेस बिखरी रही। साफ दिखा कि आला नेताओं को सत्र में चर्चा से ज्यादा दतिया उपचुनाव की फिक्र है, लेकिन जहा उस जनप्रतिनिधि से पूछिए जो मतदाताओं की आवाज बनकर सदन में पहुंचता है। कांग्रेस का हो या बीजेपी का, क्या उससे चर्चा होना जरूरी नहीं था।
सदन में जनता की आवाज क्यों खामोश?
ऐसे विधायकों को जनता चुनावों के जरिए ही जवाब देते हैं, लेकिन कुछ विधायक ऐसे भी हैं जो वाकई जनता की आवाज बनकर सदन तक पहुंचते हैं। और, पार्टी की परवाह किए बगैर जनता से जुड़े सवाल पूछते हैं।
विधानसभा के बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र आहूत ही इसलिए होते हैं कि वोटर की बात हुक्मरानों तक पहुंच पाए। लेकिन इस बार मानसून सत्र का नजारा देखकर लगा कि वाकई बहुत से विधायकों को मतदाता की आवाज बनने का शौक नहीं है या फिर उस आवाज को दबाया जा रहा है।
देश में हंगामा, सदन में बिल पास
प्रदर्शन की वजह से लोकसभा की कार्यवाही पर असर पड़ रहा है। दोनों सदन तकरीबन हर रोज स्थगित हो रहे हैं। क्योंकि चर्चा हो ही नहीं पा रही। इन सबके बीच मप्र की विधानसभा में कार्यवाही जोरों से चली। बड़े-बड़े बिल पास हो गए।
उपचुनाव की जल्दी में सत्र निपटा
कांग्रेस ने खुद उन मुद्दों पर खास ध्यान नहीं दिया जो खुद बहुत पहले से उठा रही हो। फिर बात चाहें केन बेतवा परियोजना की खिलाफत करने वाले आदिवासियों की हो, टीईटी के नियमों में उलझे टीचर्स की हो या फिर किसानों की हो।
कांग्रेस की आवाज में सिर्फ नीट पेपर लीक ही ज्यादा सुनाई दिया। पांच दिन का सत्र सिर्फ तीन दिन में खत्म हुआ। वजह बना दतिया उपचुनाव। कांग्रेस और बीजेपी माने या न माने लेकिन दोनों ही पार्टी को जल्दी थी दतिया पहुंचने की।
ये उपचुनाव सरकार के लिए नाक का सवाल है तो कांग्रेस के लिए साख का, जिसकी घड़ियां अब नजदीक हैं। ऐसे में पूरा सत्र हंगामेदार रहा। उसके बाद भी सरकार ने 15 अलग-अलग बिल पास करवा लिए।
छोटे सत्र में बड़े बजट फैसले
ये बजट 7,765.76 करोड़ रुपए का है जिससे नर्मदा घाटी विकास, मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा और एजुकेशन सेक्टर में काम होंगे। नर्मदा घाटी विकास विभाग केलिए तीन हजार करोड़ रुपए आवंटित हुए हैं।
परिवहन योजनाओं पर 101 करोड़ खर्च होंगे। प्रधानमंत्री ई-बस सेवा योजना पर 50 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके अलावा स्कूल शिक्षा, पुलिस विभाग और डिजास्टर मैनेजमेंट पर भी बड़ी राशि खर्च होगी।
यूसीसी पास, रिश्तों के नियम बदले
अब मप्र में एक से ज्यादा शादी करना अपराध माना जाएगा। लिव इन रिलेशन में रहने वालों को एक महीने के भीतर अपने रिश्ते को रिजस्टर करवाना होगा। शादी का रजिस्ट्रेशन भी अनिवार्य है।
संपत्ति के बंटवारे में महिला और पुरुष को समान अधिकार दिए गए हैं। हालांकि, राज्य की कई आदिवासी जनजातियों को इससे अलग रखा गया है।
हंगामे के बीच बिल पास, विपक्ष बंटा
बीजेपी ने कहा कि खुद कांग्रेस सदन का वक्त बरबाद कर रही है। इन आरोप प्रत्यारोप को बीच कांग्रेस को सदन में हंगामा करना था सो खूब किया और सरकार को जो विधेयक पास कराने थे वो विधेयक पास हो गए। कांग्रेस तो कुछ मुद्दों पर बंटी हुई भी नजर आई।
सत्र के आखिरी दिन रानी दुर्गावती आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक पर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की। लेकिन खुद ही बंटी हुई दिखाई दी।
जबलपुर विधायक लखन घनघोरिया ने मेडिकल यूनिवर्सिटी के बंटावारे पर विरोध दर्ज करवाया तो विधायक महेश परमार ने उज्जैन में नई मेडिकल यनिवर्सिटी खोलने पर खुशी जाहिर की।
काली पट्टी के बाद दतिया की दौड़
जाहिर है पांच दिन बाद मतदान है और सीट की चिंता जरूरी है, लेकिन जो विधेयक इतनी जल्दी में पारित करवाए। क्या उन पर चर्चा जरूरी नहीं थी। जो विधेयक बिना चर्चा के पारित हुए क्या उन पर किसी जनप्रतिनिधि को अपनी बात नहीं रखनी थी। या वो इतने गैर जरूरी थे कि उन पर विधायकों की बात सुनी ही न जाए।
पार्टी लाइन में दब गई जनता की आवाज
ये कोई दबाव है या विधायकों की सोच सिर्फ आलाकमान के इशारे और पार्टी लाइन के आसपास मंडराने तक ही सीमित रह गई है। वजह जो भी हो, मतदाता के हित में तो दोनों ही खतरा हैं।
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