News Strike: गोपाल भार्गव के बयान से BJP में हलचल, क्या अटेंशन सीकर बने भार्गव या कुछ और है रणनीति?

Harish Divekar | Feb 04, 2026, 07:00 IST
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Photograph: (thesootr)

गोपाल भार्गव ने ब्राह्मण समाज पर टिप्पणी की। भार्गव ने ब्राह्मण समाज से एकजुट होने की अपील की। इसके बाद उनकी राजनीतिक रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।

News In Short

  • गोपाल भार्गव का ब्राह्मणों को लेकर चौंकाने वाला बयान।
  • गोपाल भार्गव के बयान से बीजेपी में हलचल मच गई।
  • भार्गव ने ब्राह्मण समाज को एकजुट होने की अपील की।
  • भार्गव का बयान राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है?

News In Detail

News Strike | न्यूज स्ट्राइक:गोपाल भार्गव क्या बोल रहे हैं... क्यों बोल रहे हैं। क्या गोपाल भार्गव पार्टी लाइन भूल गए हैं। या, गोपाल भार्गव खुद अपने ही लिए जामवंत बने हैं और पार्टी को अपनी ही ताकत याद दिला रहे हैं। हाल ही में गोपाल भार्गव ने जो कहा है। वो यकीनन चौंकाने वाला है। उनके ताजा बयान के बाद बीजेपी में हलचल तो मच ही गई है।

आप भी पढ़िए, समझिए कि बीजेपी के इस दिग्गज, सबसे सीनियर, कभी न हारे और कई बार मंत्री रहे विधायक ने क्या कहा। बयान को कई मायने में तो खंगाला जाना ही चाहिए। साथ ही इस बयान की टाइमिंग भी किसी सियासी स्ट्रेटजी की तरफ ही इशारा कर रही है।

गोपाल भार्गव की पार्टी लाइन में निष्ठा

गोपाल भार्गव बीजेपी के उन विधायकों में से हैं जिन्हें नींद में भी जगाकर कुछ पूछा जाए तो उनका एक एल लफ्ज पार्टी लाइन के अनुसार ही सुनाई देगा। उन्हें समय-समय पर अपनी पार्टी से लाख शिकायतें रही हों, लेकिन कभी बीजेपी की लकीर को पार करने की उन्होंने कोई कोशिश नहीं की।

सागर जिले में भूपेंद्र सिंह की मनमानी बढ़ी तो वो गोविंद सिंह राजपूत के साथ तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान के पास शिकायत लेकर पहुंचे जरूर, लेकिन पार्टी लाइन के दायरे में रह कर नाराजगी जताई। नई सरकार में उन्हें कोई पद नहीं मिला, जबकि वो सीनियर मोस्ट विधायक हैं। इसके बाद भी वो खामोशी से अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं।

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भार्गव ने दिया ब्राह्मण समाज पर बयान

कोई पद न मिलने पर सागर जिले के ही सीनियर विधायक भूपेंद्र सिंह कई बार नाराजगी जता चुके हैं, लेकिन मजाल है कि गोपाल भार्गव ने ऐसे तेवर दिखाए हों। पर, इस बार शायद सब्र का प्याला भर चुका है।

अब वो प्याला छलक उठे उससे पहले ही वो अपनी पार्टी को संकेत दे रहे हैं इसलिए ऐसा बयान दे रहे हैं। गोपाल भार्गव ने बेबाक अंदाज में कहा है कि सारे नियम और कानून ब्राह्मणों के खिलाफ ही बन रहे हैं। उन्होंने ये भी कहा कि संवैधानिक व्यवस्था में ब्राह्मणों को पीछे धकेला जा रहा है।

सागर में हुए ब्राह्मण समाज मेधावी सम्मान समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने पर उन्होंने ये बयान दिया है। वो इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने ये भी कहा कि सारे समाज और वर्ग एक हैं, लेकिन ब्राह्मण बिखरे हैं। वो किसी के वोट बैंक नहीं हैं। इसलिए उनकी नहीं सुनी जाती है। उन्होंने धर्म बचाने के लिए पूरे ब्राह्मण समाज से एक होने की अपली भी की।

जाहिर है गोपाल भार्गव के इस बयान से हलचल तो मचनी ही थी। न सिर्फ बीजेपी में बल्कि सामाजिक हलकों में और सबसे ज्यादा सत्ता के गलियारों में भी। इसे एक ब्राह्मण नेता का ब्राह्मण समाज के लिए दिया गया एक बयान ही नहीं माना जा सकता। क्योंकि इसके एक नहीं अनेक मायने हैं। चलिए वो भी समझने की कोशिश करते हैं।

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रहली में कुर्मी-पटेल वोटर्स की भूमिका

सबसे पहले तो ये समझना जरूरी है कि गोपाल भार्गव जिस सीट से लगातार जीत रहे हैं वो सीट है रहली। यहां से वो 1985 से लगातार जीतते आ रहे हैं। उन्हें मात देने के लिए कांग्रेस कई प्रयोग कर चुकी है, लेकिन हर बार फेल साबित हुई है।

अब सबसे हैरान करने वाला फैक्ट ये है कि उनकी जीत सिर्फ ब्राह्मण वोटों की मोहताज नहीं है। इस सीट पर कुर्मी और पटेल वोटर्स का दबदबा है। करीब 35 हजार से ज्यादा कुर्मी पटेल वोटर्स हैं। जो तीन दशक से भी ज्यादा समय से एक ब्राह्मण प्रत्याशी को जिताते आ रहे हैं। जो खुद गोपाल भार्गव हैं।

कांग्रेस ने यहां भरत चौधरी, विष्णु पटेल और जीवन पटेल जैसे पटेल उम्मीदवारों को टिकट दिए, लेकिन सब भार्गव के सामने हार का मुंह देखने पर मजबूर हो गए। इस आंकड़े से ये तो साफ है कि भार्गव को जीत के लिए ब्राह्मण वोटर्स की कोई खास जरूरत नहीं है। फिर उन्होंने ऐसा बयान क्यों दिया।

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गोपाल भार्गव के बयान की टाइमिंग

बयान तो दिया, इसी टाइम पर क्यों दिया। अब टाइमिंग का गणित समझिए। बमुश्किल दो तीन दिन हुए जब यूजीसी के नए नियमों को लेकर ब्राह्मण समुदाय का गुस्सा कुछ शांत हुआ है। इस गुस्से के एक मुहाने पर ब्राह्मण समाज था तो दूसरे मुहाने पर बीजेपी की सरकार थी। जिससे समाज नाराजगी जता रहा है।

यूजीसी के मामले से पहले भी देखें तो एमपी में ही ब्राह्मण समाज उग्र होता नजर आ रहा है। ऐसे समय पर पार्टी का ये सीनियरमोस्ट, मोस्ट डिसिप्लीन्ड विधायक इस तरह का बयान क्यों दे रहा है।

क्या भार्गव इस बयान के जरिए अपनी छवि एक बड़े ब्राह्मण नेता के रूप में बनाना चाहते हैं। इस लिहाज से देखें तो विंध्य से आने वाले राजेंद्र शुक्ल पार्टी के बड़े ब्राह्मण नेता हैं, लेकिन बुंदेलखंड से इस लेवल का कोई नेता इस समाज का नेतृत्व करता नजर नहीं आता। क्या भार्गव इसी गैप को भरकर अपनी साख बनाने की कोशिश में हैं।

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उमा भारती जैसा राजनीतिक दांव तो नहीं?

गोपाल भार्गव, उमा भारती वाला दांव खेलकर पार्टी में अपनी अहमियत तो याद नहीं दिला रहे हैं। उमा भारती वाला दांव यूं कि जब पार्टी ने उमा भारती को भाव देना बंद कर दिया था। तब उन्होंने लोधी समाज की सभाओं में ये बयान दिया था कि वो नहीं बताएंगी कि किस पार्टी को वोट दें। लोधी वोटर्स खुद तय करें कि उन्हें किसके साथ जाना है। इसके बाद भी बीजेपी में खलबली मची थी।

क्या भार्गव भी कुछ ऐसा ही दांव खेल रहे हैं। क्योंकि बीजेपी ब्राह्मणों के विश्वास वाली पार्टी रही है। उसी का ब्राह्मण विधायक जब ऐसे बयान देगा तो इस समाज का पार्टी से दूर होना कुछ हद तक कारगर हो भी सकता है। यही वजह भी है कि भार्गव के बयान से बीजेपी के हलकों में हलचल मच गई है।

गोपाल भार्गव के पास खोने के लिए कुछ नहीं

एक वजह ये भी है कि भार्गव के पास अब खोने के लिए कुछ खास बचा नहीं है। इस बार लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। अगली बार विधानसभा का टिकट मिलेगा या नहीं मिलेगा ये भी कहना मुश्किल है। इसलिए शायद वो ये दांव भी खेलकर देख लेना चाहते हैं। असल में अब तक सागर के समीकरण भी अलग थे।

गोविंद सिंह राजपूत और भूपेंद्र सिंह में छत्तीस का आंकड़ा था, लेकिन अब जब सब कुछ ठीक है तो ये अटकलें भी हैं कि भूपेंद्र सिंह कैबिनेट में जा सकते हैं। शायद कुछ आस भार्गव को भी बंधी हो या फिर वो फोमो यानी कि फियर ऑफ मिसिंग आउट का शिकार हो चुके हैं और ऐसा बयान दे रहे हैं। आगे आने वाले राजनीतिक हालात ये बताएंगे कि भार्गव के बयान से खुद उन्हें या पार्टी को क्या हासिल हुआ।



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