Point Of View With Anand संतोष वर्मा शादी का पैमाना कैसे हो सकता है आरक्षण
Anand Pandey | Nov 29, 2025, 18:58 IST
Photograph: (The Sootr)
द सूत्र के खास प्रोग्राम पॉइंट ऑफ व्यू में आज का मुद्दा है मध्यप्रदेश के आईएएस संतोष वर्मा का विवादित बयान। संतोष वर्मा का बयान महिला को दान की वस्तु मानने की मानसिकता को दर्शाता है। उनका बयान आरक्षण और महिला सम्मान का अपमान है।
Point Of View With Anand इस हफ्ते के खलनायक हैं मध्यप्रदेश के प्रमोटी आईएएस संतोष वर्मा। कहते हैं न मंच, माला, माइक और मुद्दा मिल जाए तो अच्छे-अच्छे बहक जाते हैं। फिर क्या आईएएस और क्या मंत्री-नेता। सामने छोटी-मोटी भीड़ देखी और संतोष बाबू की गाड़ी उतर गई पटरी से। कह दिया कि ब्राह्मण जब तक अपनी बेटी को मेरे बेटे को दान नहीं करता या उससे संबंध नहीं बनाता। तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए। वर्मा का बयान मानसिक प्रदूषण है। उन्होंने आरक्षण जैसे संवैधानिक अधिकार और सामाजिक न्याय के संघर्ष को जिस भाषा और कल्पना में पेश किया है, वह पढ़े-लिखे प्रशासनिक पद की मर्यादा को शर्मसार कर देने वाला उदाहरण है।
अब रुककर सोचिए। जिन हाथों में नीति-निर्माण के दस्तावेज साइन होते हैं। जिन दिमागों को समाज के हर वर्ग की सुरक्षा, सम्मान, न्याय और बराबरी की समझ के साथ काम करना होता है। क्या उसी दिमाग से निकली यह बात किसी भी तरह सभ्य समाज में टिक सकती है? यह बयान किसी सड़क छाप गपशप में भी भद्दा, आपत्तिजनक और स्त्री-विरोधी है। लेकिन, यहां तो यह प्रशासन के सबसे ऊंचे सेवा वर्ग में बैठा एक अफसर कह रहा है। अफसर वह, जिसे लोग पढ़े-लिखे तर्क, संयम, समझदारी और संविधान के रखवाले की निगाह से देखते हैं।
संतोष वर्मा पहले तो आप ये समझ लो कि अब लड़कियों की हद सिर्फ रसोई तक नहीं है। वो कभी सुनीता विलियम्स बनकर नौ महीने अंतरिक्ष में भी रह आ रही हैं। तो कभी क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीतकर आकाश पर परचम फहरा रही हैं। इसके बावजूद आपको लगता है कि वो अभी भी दान की वस्तु है तो आपको रिफ्रेशर कोर्स की नहीं तत्काल केजी वन में दाखिला लेने की जरूरत है। और क्या, आप संबंध की बात कर रहे थे न। इस पर तो क्या ही बोला जाए। ऐसा बोलकर तो आपने बता दिया कि आपके आईएएस बनने के चाहे जो कारण रहे हों, लेकिन आप अपनी प्रतिभा और काबिलियत की दम पर तो आईएएस नहीं ही बने हैं।
यह बयान सिर्फ विवाद का मसाला नहीं है। यह उस सोच का प्रदर्शन है, जो महिला को बराबरी का नागरिक मानने की बजाय वस्तु, उत्पाद, उपभोग की चीज समझती है। वर्मा की भाषा यही कहती है कि बेटी कोई इंसान नहीं, कोई दान देने की चीज है। किसी रिश्ते को साबित करने का टोकन है। किसी जातीय, सामाजिक लड़ाई का मोहरा है। सोचिए, जिस समाज में विवाह प्यार, सहमति, सम्मान और साझेदारी का पवित्र फैसला होना चाहिए। वहां वर्मा इसे दान और शर्तों की मंडी की तरह पेश कर रहा है। यह मानसिक गुलामी का वो कोढ़ है, जो कानून पढ़ने के बावजूद इंसानियत की किताब कभी नहीं खोल पाता। दरअसल, संतोष वर्मा जैसे लोग इसलिए लूज टॉक करते हैं, ताकि हीरो बन जाएंगे। सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए इस तरह के बयान दिए जाते हैं, ताकि अटेंशन मिले।
‘दान’ और ‘संबंध’ की शर्तें समाज के उसी अंधेरे का प्रतिनिधित्व करती हैं, जहां पुरुष महिला को इंसान नहीं, किसी लेन-देन की वस्तु मानकर रिश्ते तय करता है। इस बयान में ‘ब्राह्मण बेटी’ को जोड़कर इसे जातीय रंग देने की कोशिश भी है। लेकिन, असल सवाल जाति नहीं, महिला को लेकर एक अफसर की कुंठित, जहरीली कल्पना है। यदि यह बयान किसी भी बेटी के लिए कहा गया होता, तब भी यह उतना ही अपमानजनक, घटिया और अस्वीकार्य है। यह बात इसलिए भी समझनी जरूरी है कि मुद्दा किसी एक जाति के तंज का नहीं। यह उस घटिया मानसिकता का आईना है, जो शादी को सामाजिक समता का प्रमाणपत्र समझने की कोशिश में महिला की गरिमा को ही खत्म कर देती है।
देश का लोकतंत्र संविधान की सांसों से चलता है। समानता का दर्शन रिश्तों के बाजार से नहीं, कानून की किताब और सामाजिक गरिमा की समझ से आता है। कोई उच्च सेवा वर्ग में बैठा अधिकारी यदि महिला की गरिमा को शर्तों के तराजू में तौलने की कोशिश करे। तब यह सिर्फ महिला-विरोधी बयान नहीं, संवैधानिक मूल्य का खोखला मजाक बन जाता है।
अब आएं उस हिस्से पर, जहां यह साफ है कि आरक्षण और जाति विवाह का आधार नहीं हो सकते। समाज में आपसी रिश्ते जाति की दीवार से ऊपर बनते हैं। स्वयं बाबा साहेब अंबेडकर अंतरजातीय विवाह के सबसे आधुनिक, सबसे प्रामाणिक उदाहरणों में से एक हैं। उनकी दूसरी पत्नी डॉ. सविता अंबेडकर थीं। उनका जन्म महाराष्ट्र के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे पेशे से डॉक्टर थीं। अंबेडकर ने उनसे सहमति, सम्मान और साझेदारी की नींव पर शादी की थी। इसमें ‘दान’, ‘शर्त’, ‘कुंठा’ या ‘सामाजिक सौदा’ जैसी किसी घटिया कल्पना की कोई जगह नहीं थी। यह विवाह उस दौर में भी आधुनिक सोच, सामाजिक बराबरी और सह-अस्तित्व का सार्वजनिक, सम्मानित और प्रेरणादायक फैसला था। यदि वर्मा की शर्तों को ही सच मान लें तो आंबेडकर की शादी के दिन ही आरक्षण खत्म हो जाना चाहिए था। लेकिन हुआ क्या? आरक्षण तभी चला, आज भी चल रहा है, क्योंकि आरक्षण का आधार ‘विवाह’ नहीं, ‘अवसर, बराबरी और गरिमा’ की लड़ाई है।
सार्वजनिक जीवन में मौजूद कई मजबूत उदाहरण इस बात को जमीन पर उतार देते हैं कि आरक्षण और विवाह दोनों अलग विषय हैं। दोनों का तराजू अलग है।
आपको बता दें कि दिवंगत नेता रामविलास पासवान की पत्नी रीना पंजाबी ब्राह्मण हैं। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले की पत्नी सीमा अठावले ब्राह्मण हैं। पत्रकार दिलीप मंडल का वैवाहिक रिश्ता ब्राह्मण परिवार से था। मध्यप्रदेश के मंत्री तुलसी सिलावट के परिवार में भी अंतरजातीय विवाह का सम्मानित उदाहरण है। रिटायर्ड आईएएस डीआर भगत, पुखराज मारू, संदीप जीआर, अंकित जायसवाल और कई प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े अधिकारियों के निजी जीवन में भी ऐसे रिश्तों की मिसालें मौजूद हैं। पर इनमें एक समान बात है, बेटी को सम्मान से देखा गया, सहमति को स्थान दिया गया।
दान और संबंध की भाषा सभ्य समाज में रूढ़िवाद की पराकाष्ठा है। शादी को ऐसी शर्त से जोड़ना महिलाओं को इंसान नहीं, सामाजिक मुद्रा समझ लेना है। आरक्षण संविधान की उस धारा से निकला है, जो समान अवसर और गरिमा के आधार पर नागरिकों को आगे बढ़ने की ताकत देती है। संविधान पद से बड़ा है, इंसानियत जाति से बड़ी और गरिमा सत्ता से बड़ी है।
संतोष वर्मा का बयान अचानक की फिसली जबान या एक बार की प्रशासनिक चूक नहीं है। उनके करियर पर कई बार दाग लगे हैं। 2016 में एक महिला ने वर्मा पर रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उन्होंने ‘शादी का झांसा’ देकर लिव–इन में शोषण किया। हरदा में एक युवती पर लाखों रुपये खर्च, महंगे उपहार, प्रेम का नाटक, फिर शादी से इनकार और समझौते की खबरें सार्वजनिक चर्चा तक पहुंची थीं। इंदौर और रीवा में भी दो अलग–अलग महिलाओं के साथ वही कहानी दोहराई गई थी। झांसा, इस्तेमाल, खुलासा और फिर व्यवस्था की चुप्पी। यही नहीं, प्रमोशन की फाइल में कथित रूप से एक जज के फर्जी हस्ताक्षर करवा दिए गए थे। उस समय के जज ने बाद में बयान दिया कि वे छुट्टी पर थे और उन्होंने ऐसा कोई आदेश दिया ही नहीं। फिर मामला खुला, IAS वर्मा पर केस दर्ज हुआ, गिरफ्तारी हुई, जेल भी जाना पड़ा।
अब आपको यह लगना स्वाभाविक है कि यदि इतने आरोप, इतने दस्तावेजी विवाद, गिरफ्तारी और जेल के बावजूद यह अधिकारी कुर्सी पर बना रह सकता है, तो दिमागी प्रदूषण सिर्फ वर्मा तक सीमित नहीं। यह किसी ‘बड़े सिस्टम की खामोश परत’ में भी घुला बैठा है। एक तरफ सरकार एक कलेक्टर को गुस्से पर हटा देती है, लेकिन दूसरे अफसर की सोच की सड़न पर सिर्फ जवाब तलब करती है। यह प्राथमिकताओं का प्रदूषण ही कहा जाना चाहिए। और यह सवाल लोकतंत्र के लिए भी उतना ही गहरा है कि ‘नीति-निर्माण’ की कुर्सी पर बैठा इंसान यदि इंसानियत की न्यूनतम समझ भी खो दे, तो उस कुर्सी की साख क्या बचती है?
संतोष वर्मा, अगर आप पढ़े-लिखे होते तो आपको पता होता कि आरक्षण जैसी लोकतांत्रिक नीतियां निजी रिश्तों पर आधारित नहीं हो सकतीं। विवाह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला है। इसे किसी कानून या नीति की कसौटी बनाने का मतलब है व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कम करना। इसलिए आपको समझना होगा कि किसी भी लोकतंत्र में सार्वजनिक नीति खासकर आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था निजी वैवाहिक विकल्पों पर निर्भर नहीं हो सकतीं।
आपको ये भी जानना चाहिए था कि आरक्षण का उद्देश्य विवाह संबंध बनाना कतई नहीं है। आरक्षण को विवाह से जोड़ना या इसके उलट विवाह को आरक्षण से जो़डना आरक्षण के उद्देश्य और साधन दोनों को ही गलत समझना है। और आप जिस तरह से अपने बयान में एक जाति को सिंगल आउट करके टारगेट कर रहे हैं। उससे समाज एक नहीं होता बल्कि इसके उलट समाज का विभाजन ही बढ़ता है। सामाजिक सुधार पूरे समाज से अपेक्षित होते हैं। किसी एक समुदाय से नहीं। क्या आपको लगता है कि आरक्षण का फैसला निजी रिश्तों या सांस्कृतिक मेलजोल जैसे पैमानों पर लिया जाना चाहिए।
आपका बयान आरक्षण की नीति और विवाह जैसे बेहद निजी मसलों को गलत तरीके से जोडता है। आरक्षण एक संवैधानिक-सामाजिक सुधार की नीति है जिसे-सामाजिक न्याय, समानता और ऐतिहासिक अन्याय के सुधार के आधार पर तय होना चाहिए न कि कौन किससे विवाह कर रहा है इस पर।
द सूत्र के एडिटर इन चीफ और वरिष्ठ पत्रकार आनंद पांडेय (Anand Pandey) के खास प्रोग्राम प्वाइंट ऑफ व्यू(Point Of View With Anand) में आज का मुद्दा विशेष चर्चा का विषय है
प्वाइंट ऑफ व्यू विद आनंद
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लड़कियों की हद सिर्फ रसोई तक नहीं
बयान घटिया सोच का प्रदर्शन
एक अफसर की कुंठित-जहरीली कल्पना
देश का लोकतंत्र संविधान की सांसों से चलता है। समानता का दर्शन रिश्तों के बाजार से नहीं, कानून की किताब और सामाजिक गरिमा की समझ से आता है। कोई उच्च सेवा वर्ग में बैठा अधिकारी यदि महिला की गरिमा को शर्तों के तराजू में तौलने की कोशिश करे। तब यह सिर्फ महिला-विरोधी बयान नहीं, संवैधानिक मूल्य का खोखला मजाक बन जाता है।
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आरक्षण और शादी अलग विषय
आपको बता दें कि दिवंगत नेता रामविलास पासवान की पत्नी रीना पंजाबी ब्राह्मण हैं। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले की पत्नी सीमा अठावले ब्राह्मण हैं। पत्रकार दिलीप मंडल का वैवाहिक रिश्ता ब्राह्मण परिवार से था। मध्यप्रदेश के मंत्री तुलसी सिलावट के परिवार में भी अंतरजातीय विवाह का सम्मानित उदाहरण है। रिटायर्ड आईएएस डीआर भगत, पुखराज मारू, संदीप जीआर, अंकित जायसवाल और कई प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े अधिकारियों के निजी जीवन में भी ऐसे रिश्तों की मिसालें मौजूद हैं। पर इनमें एक समान बात है, बेटी को सम्मान से देखा गया, सहमति को स्थान दिया गया।
हम कहेंगे कि आरक्षण रिश्तों का तराजू नहीं, अधिकारों की सीढ़ी है। जाति इतिहास की पहचान हो सकती है, विवाह का प्रमाण पत्र नहीं। बेटी कोई दान की वस्तु नहीं, यह शब्द ही लोकतंत्र का अपमान है। संबंध की शर्त जोड़ना, प्रेम और सह-अस्तित्व को खत्म कर देना है।
संतोष वर्मा पर पहले भी लग चुके हैं कई दाग
दिमागी प्रदूषण सिर्फ वर्मा तक सीमित नहीं
आरक्षण का उद्देश्य विवाह संबंध बनाना कतई नहीं
आपको ये भी जानना चाहिए था कि आरक्षण का उद्देश्य विवाह संबंध बनाना कतई नहीं है। आरक्षण को विवाह से जोड़ना या इसके उलट विवाह को आरक्षण से जो़डना आरक्षण के उद्देश्य और साधन दोनों को ही गलत समझना है। और आप जिस तरह से अपने बयान में एक जाति को सिंगल आउट करके टारगेट कर रहे हैं। उससे समाज एक नहीं होता बल्कि इसके उलट समाज का विभाजन ही बढ़ता है। सामाजिक सुधार पूरे समाज से अपेक्षित होते हैं। किसी एक समुदाय से नहीं। क्या आपको लगता है कि आरक्षण का फैसला निजी रिश्तों या सांस्कृतिक मेलजोल जैसे पैमानों पर लिया जाना चाहिए।
आपका बयान आरक्षण की नीति और विवाह जैसे बेहद निजी मसलों को गलत तरीके से जोडता है। आरक्षण एक संवैधानिक-सामाजिक सुधार की नीति है जिसे-सामाजिक न्याय, समानता और ऐतिहासिक अन्याय के सुधार के आधार पर तय होना चाहिए न कि कौन किससे विवाह कर रहा है इस पर।
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