छत्तीसगढ़ में हिरणों का शिकार; सिर्फ 2 या छुपी हुई सच्चाई? आंकड़ों पर उठे बड़े सवाल

Rajesh Lahoti | Mar 29, 2026, 17:02 IST
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CG deer poaching data controversy official figures questioned
CG deer poaching data controversy official figures questioned

छत्तीसगढ़ में हिरण शिकार के आधिकारिक आंकड़े बेहद कम दिखाए जा रहे हैं, जिससे उनकी सच्चाई पर सवाल उठ रहे हैं। डेटा पारदर्शिता की कमी और रिकॉर्ड अपडेट न होने से वन्यजीव संरक्षण पर गंभीर चिंता बढ़ गई है।

RAIPUR : छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। वन विभाग के आधिकारिक आंकड़े जहां वर्ष 2025 में केवल दो हिरणों के शिकार की बात करते हैं, वहीं जमीनी हकीकत और लगातार सामने आती खबरें इस दावे पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।

अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या सच में शिकार कम हुआ है या फिर आंकड़ों का खेल चल रहा है। वन विभाग मुख्यालय में शिकार से जुड़े दो प्रमुख डेटाबेस संचालित होते हैं—एक विभाग का अपना एंटी-पोचिंग डेटाबेस और दूसरा दिल्ली स्थित वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो का राष्ट्रीय डेटाबेस।

आंकड़े क्या कहते हैं?

वन विभाग के एंटी-पोचिंग रिकॉर्ड के मुताबिक, वर्ष 2025 में राज्य में शिकार और अवैध तस्करी की कुल 23 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें हिरण के केवल दो मामले शामिल हैं। अन्य जानवरों में जंगली सूअर (4), तेंदुआ (5), बाघ (1), पैंगोलिन (3), भालू (3), कछुआ (1), बाइसन (2), नीलगाय (1) और नेवला (1) शामिल हैं।

वन्यजीव अकड़े
वन्यजीव अकड़े


इसी तरह वर्ष 2024 में सिर्फ 13 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जबकि 2023 में भी हिरण के शिकार के केवल दो मामले ही रिकॉर्ड किए गए।

जमीनी सच्चाई पर सवाल

इन आंकड़ों के बीच हाल ही में सामने आए ऐसे मामले—जैसे एक सरकारी रिसॉर्ट में हिरण के मांस पकाने की खबर—इन दावों को संदेह के घेरे में ला देते हैं। सवाल यह उठता है कि जब शिकार की घटनाएं लगातार सुर्खियों में रहती हैं, तो फिर आधिकारिक रिकॉर्ड इतने सीमित क्यों हैं?

राष्ट्रीय डेटाबेस में खाली रिकॉर्ड

मामला और गंभीर तब हो जाता है जब वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालते हैं। वन विभाग ने स्वीकार किया है कि वर्ष 2024 में राज्य के किसी भी वन मंडल ने इस राष्ट्रीय डेटाबेस में जानकारी अपलोड नहीं की। वहीं 2025 के लिए यह तर्क दिया गया कि वेबसाइट काम नहीं कर रही थी। यह स्थिति न केवल डेटा पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था को भी कमजोर करती है।

गंभीर आरोप और विभाग पर निशाना

रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने इस पूरे मामले को बेहद गंभीर बताते हुए आरोप लगाया है कि वन्यजीवों का शिकार लगातार जारी है, लेकिन विभागीय विफलताओं को छुपाने के लिए आंकड़ों का समुचित संकलन नहीं किया जा रहा। उनके मुताबिक, यदि सभी घटनाओं को पारदर्शिता के साथ दर्ज किया जाए, तो वास्तविक संख्या कहीं अधिक सामने आएगी और विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होंगे।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राष्ट्रीय डेटाबेस में जानकारी इसलिए नहीं डाली जाती, ताकि राज्य की स्थिति उजागर न हो और जवाबदेही से बचा जा सके।

पारदर्शिता की मांग तेज

विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि अधूरे आंकड़े वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को कमजोर करते हैं। यदि वास्तविक डेटा सामने नहीं आएगा, तो शिकार रोकने के लिए प्रभावी रणनीति बनाना भी मुश्किल होगा।

अब मांग उठ रही है कि वन विभाग शिकार से जुड़े सभी आंकड़ों को बिना किसी छुपाव के सार्वजनिक करे, ताकि छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण की असली तस्वीर सामने आ सके।

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