नक्सल क्षेत्र में तीन दशक की निस्वार्थ सेवा का सम्मान, गोडबोले दंपत्ति को पद्मश्री
VINAY VERMA | May 25, 2026, 22:37 IST
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बस्तर के जंगलों में तीन दशक तक आदिवासियों की निस्वार्थ सेवा करने वाले डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता गोडबोले को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संयुक्त रूप से पद्म श्री से सम्मानित किया।
बस्तर के जंगलों में तीन दशक तक आदिवासियों की सेवा करने वाले गोडबोले दंपत्ति को आखिरकार देश का बड़ा सम्मान मिल गया। राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता गोडबोले को संयुक्त रूप से ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया। यह सम्मान जनजातीय स्वास्थ्य, कुपोषण उन्मूलन और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान के लिए दिया गया।
मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले डॉ. रामचंद्र गोडबोले आयुर्वेद चिकित्सक हैं। उनकी पत्नी सुनीता गोडबोले सोशल वर्क की पढ़ाई कर चुकी हैं। दोनों ने 1990 में शादी के बाद बस्तर जाने का फैसला किया। उस समय दंतेवाड़ा और अबूझमाड़ जैसे इलाके स्वास्थ्य सुविधाओं से लगभग पूरी तरह वंचित थे।
गोडबोले दंपत्ति ने बारसूर क्षेत्र में एक छोटे क्लिनिक से काम शुरू किया। वहां आदिवासियों का मुफ्त इलाज किया गया। कई बार जंगलों के भीतर पैदल पहुंचकर मरीजों तक दवाइयां पहुंचाई गईं।
डॉ. गोडबोले ने शुरुआती 12 वर्षों में 3 हजार से ज्यादा गंभीर बीमार आदिवासियों का इलाज किया। इसके बाद उन्होंने जंगलों के भीतर 114 से ज्यादा बड़े मेडिकल कैंप लगाए। इन शिविरों में 9 हजार से ज्यादा ग्रामीणों की जांच हुई।
करीब 400 गंभीर मरीजों को रायपुर के चैरिटेबल अस्पतालों तक पहुंचाकर इलाज भी कराया गया। नक्सल प्रभावित इलाकों में लगातार सेवा करना आसान नहीं था, लेकिन दंपत्ति ने काम नहीं छोड़ा।
सुनीता गोडबोले ने आदिवासी महिलाओं और बच्चों से जुड़ने के लिए गोंडी और हलबी भाषा सीखी। इसके बाद गांव-गांव जाकर महिलाओं को पोषण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया।
आज बस्तर के तीन जिलों के 37 स्कूलों में करीब 2 हजार बच्चे हर साल उनके कार्यक्रमों से जुड़ते हैं। पिछले पांच साल में उन्होंने 24 गांवों के 460 बच्चों को गंभीर कुपोषण से बाहर निकालने में मदद की।
गोडबोले दंपत्ति ने सिर्फ इलाज तक खुद को सीमित नहीं रखा। सिकल सेल एनीमिया जागरूकता, बाल अधिकार और आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा पर भी लगातार काम किया। वर्तमान में दोनों “बनफूल” नाम से संगठन चला रहे हैं। यह संगठन जनजातीय बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण पर काम करता है।
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने पद्म पुरस्कार विजेताओं को बधाई देते हुए कहा कि ऐसे लोग देश की आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा हैं। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने कहा कि पद्म पुरस्कार समाज परिवर्तन करने वाले लोगों का सम्मान है। इस वर्ष कुल 131 पद्म पुरस्कार दिए गए हैं। इनमें 5 पद्म विभूषण, 13 पद्म भूषण और 113 पद्म श्री शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे राज्य के लिए गौरव का क्षण बताया है। सरकार का कहना है कि यह सम्मान सिर्फ गोडबोले दंपत्ति का नहीं, बल्कि बस्तर के आदिवासी समाज की सेवा और संघर्ष की राष्ट्रीय पहचान है।
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अबूझमाड़ से राष्ट्रपति भवन तक का सफर
गोडबोले दंपत्ति ने बारसूर क्षेत्र में एक छोटे क्लिनिक से काम शुरू किया। वहां आदिवासियों का मुफ्त इलाज किया गया। कई बार जंगलों के भीतर पैदल पहुंचकर मरीजों तक दवाइयां पहुंचाई गईं।
12 साल में 3 हजार गंभीर मरीजों का इलाज
करीब 400 गंभीर मरीजों को रायपुर के चैरिटेबल अस्पतालों तक पहुंचाकर इलाज भी कराया गया। नक्सल प्रभावित इलाकों में लगातार सेवा करना आसान नहीं था, लेकिन दंपत्ति ने काम नहीं छोड़ा।
गोंडी और हलबी सीखकर जीता भरोसा
आज बस्तर के तीन जिलों के 37 स्कूलों में करीब 2 हजार बच्चे हर साल उनके कार्यक्रमों से जुड़ते हैं। पिछले पांच साल में उन्होंने 24 गांवों के 460 बच्चों को गंभीर कुपोषण से बाहर निकालने में मदद की।
सिकल सेल से लेकर बालिका शिक्षा तक काम
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बस्तर की सेवा को मिला राष्ट्रीय सम्मान
FAQ
- गोडबोले दंपत्ति को पद्म श्री किस लिए मिला?
उन्हें जनजातीय स्वास्थ्य, कुपोषण उन्मूलन और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में तीन दशक के योगदान के लिए सम्मानित किया गया। - गोडबोले दंपत्ति ने बस्तर में सेवा कब शुरू की?
दोनों ने 1990 में बस्तर में आदिवासियों की सेवा शुरू की और छोटे क्लिनिक से काम किया। - दंपत्ति ने बच्चों और महिलाओं के लिए क्या काम किया?
उन्होंने कुपोषित बच्चों को उपचार दिया, स्वास्थ्य जागरूकता फैलाई और बालिका शिक्षा को बढ़ावा दिया। - दंपत्ति का संगठन बनफूल क्या करता है?
यह संगठन जनजातीय बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण पर काम करता है और ग्रामीण महिलाओं को पोषण और स्वास्थ्य जागरूकता प्रदान करता है।
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