भूपेश ने झीरम हमले पर एनआईए की जांच पर उठाए सवाल, सीएम ने बताया दिमागी नक्सली
Arun Tiwari | Sept 04, 2026, 16:04 IST
झीरम-घाटी-फैसला-भूपेश-साईं-राजनीति
13 साल बाद झीरम घाटी नरसंहार पर अदालत के फैसले से पहले सियासत तेज हो गई है। भूपेश बघेल ने एनआईए जांच पर सवाल उठाए, तो सीएम विष्णुदेव साय ने कांग्रेस से हिसाब मांगा।
RAIPUR : छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश की राजनीति को हिलाने वाले झीरम घाटी में नक्सली हमले पर फैसला आने वाला है। 13 साल बाद 5 सितंबर को अदालत इस नरसंहार की घटना पर फैसला सुनाने वाली है।
इस घटना ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर दिया था। 13 साल से इस मामले पर राजनीति चल रही है। अब जबकि इस पर फैसला आने वाला है तो एक बार फिर सियासत तेज हो गई है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एनआईए की जांच पर सवाल उठाए हैं। वहीं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने पलटवार करते हुए कहा जब उनकी सरकार थी तब वे क्या कर रहे थे।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एनआईए की जांच पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि झीरम घटना की जांच NIA ने सही से नहीं की। दरभा थाने में जो FIR लिखी गई, जो धाराएं लगी और जिन लोगों के नाम का उल्लेख था उनसे पूछताछ नहीं हुई।
भूपेश ने कहा कि NIA ने झीरम घाटी में जो लोग घटनास्थल पर थे, उन सब से भी पूछताछ नहीं की। ये षड्यंत्र किसने किया, उसमें उन्होंने एक कदम भी नहीं रखा।
हमने जांच को राज्य सरकार को सौंपने की बात कही और सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार के पक्ष में फैसला आया लेकिन विष्णुदेव की सरकार में ना एसआईटी गठन हुई, ना जांच के आदेश दिए गए।
बीजेपी लगातार इसे दबाने का काम कर रही है। बघेल की आपत्ति का मूल सवाल यह है कि झीरम को केवल नक्सली हमला मानकर जांच पूरी कर देना पर्याप्त नहीं है।
उनके मुताबिक यह पता लगना चाहिए कि हमले के पीछे कोई साजिश थी या नहीं और अगर थी तो उसके सूत्रधार कौन थे। बघेल ने केंद्र सरकार पर भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार को जांच की जिम्मेदारी देने से इनकार किया गया।
यही बात अब कांग्रेस के राजनीतिक अभियान का आधार बन रही है। कांग्रेस का कहना है कि झीरम में उसके नेताओं की हत्या हुई थी, इसलिए परिवारों को सिर्फ यह जानना नहीं है कि हमला किसने किया, बल्कि यह भी जानना है कि क्या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश थी।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भूपेश बघेल पर पलटवार किया है। सीएम ने कहा कि जब बघेल खुद पांच साल तक प्रदेश की सत्ता में थे, तब उन्होंने इस मामले में क्या कदम उठाए। साय का यह हमला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
बीजेपी अब झीरम की जांच पर कांग्रेस के सवाल का जवाब देने के बजाय कांग्रेस से उसके शासनकाल का हिसाब मांग रही है। यानी बहस अब सिर्फ NIA की जांच तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सवाल भी जुड़ गया है कि जिसके पास सत्ता थी, उसने क्या किया।
सीएम ने कहा कि वह हिड़मा, जिसने सैकड़ों निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारा, ऐसे कुख्यात नक्सली को अपना आदर्श मानने वाले और नक्सलवाद के समर्थन में बात करने वाले लोग ही दिमागी नक्सली हैं। माओवादियों को आदर्श मानने वाली ऐसी सोच की छत्तीसगढ़ में कोई जगह नहीं है।
झीरम मामले में NIA की जांच और न्यायिक प्रक्रिया लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रही है। अब अदालत की कार्यवाही के बीच बघेल के ताजा सवालों और साय के पलटवार ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है।
13 साल बाद भी असली सवाल वही है। झीरम में हमला करने वाले कौन थे, उन्हें इतनी सटीक जानकारी कैसे मिली और क्या इस हमले के पीछे कोई बड़ी साजिश थी। कांग्रेस कह रही है कि जांच अधूरी है।
बीजेपी पूछ रही है कि कांग्रेस सत्ता में थी तब उसने क्या किया। लेकिन इन दोनों राजनीतिक सवालों के बीच उन परिवारों की उम्मीद अब भी टिकी है, जिन्होंने झीरम में अपनों को खोया था। उनके लिए झीरम कोई चुनावी मुद्दा नहीं है। उन्हें राजनीति नहीं, पूरे सच का जवाब चाहिए।
झीरम घाटी कांड पर 13 साल बाद अदालत का फैसला आ रहा है। इससे पहले 31 अगस्त को फैसला आना था लेकिन तारीख बढ़कर 5 सितंबर पर पहुंच गई। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में 25 मई 2013 की तारीख शायद ही कभी भुलाई जा सकेगी।
इस दिन हुए नक्सली हमले में प्रदेश की एक पूरी राजनीतिक पीढ़ी को खत्म कर दिया गया था। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा से लौट रहे काफिले पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया।
इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व विधायक उदय मुदलियार और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गज नेता मारे गए।
झीरम घाटी के हमले में खत्म हो गई कांग्रेस की पूरी पीढ़ी, पूरे सच का इंतजार बाकी
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इस घटना ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर दिया था। 13 साल से इस मामले पर राजनीति चल रही है। अब जबकि इस पर फैसला आने वाला है तो एक बार फिर सियासत तेज हो गई है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एनआईए की जांच पर सवाल उठाए हैं। वहीं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने पलटवार करते हुए कहा जब उनकी सरकार थी तब वे क्या कर रहे थे।
भूपेश ने उठाए गंभीर सवाल :
भूपेश ने कहा कि NIA ने झीरम घाटी में जो लोग घटनास्थल पर थे, उन सब से भी पूछताछ नहीं की। ये षड्यंत्र किसने किया, उसमें उन्होंने एक कदम भी नहीं रखा।
हमने जांच को राज्य सरकार को सौंपने की बात कही और सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार के पक्ष में फैसला आया लेकिन विष्णुदेव की सरकार में ना एसआईटी गठन हुई, ना जांच के आदेश दिए गए।
बीजेपी लगातार इसे दबाने का काम कर रही है। बघेल की आपत्ति का मूल सवाल यह है कि झीरम को केवल नक्सली हमला मानकर जांच पूरी कर देना पर्याप्त नहीं है।
उनके मुताबिक यह पता लगना चाहिए कि हमले के पीछे कोई साजिश थी या नहीं और अगर थी तो उसके सूत्रधार कौन थे। बघेल ने केंद्र सरकार पर भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार को जांच की जिम्मेदारी देने से इनकार किया गया।
यही बात अब कांग्रेस के राजनीतिक अभियान का आधार बन रही है। कांग्रेस का कहना है कि झीरम में उसके नेताओं की हत्या हुई थी, इसलिए परिवारों को सिर्फ यह जानना नहीं है कि हमला किसने किया, बल्कि यह भी जानना है कि क्या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश थी।
सीएम का पलटवार :
बीजेपी अब झीरम की जांच पर कांग्रेस के सवाल का जवाब देने के बजाय कांग्रेस से उसके शासनकाल का हिसाब मांग रही है। यानी बहस अब सिर्फ NIA की जांच तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सवाल भी जुड़ गया है कि जिसके पास सत्ता थी, उसने क्या किया।
सीएम ने कहा कि वह हिड़मा, जिसने सैकड़ों निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारा, ऐसे कुख्यात नक्सली को अपना आदर्श मानने वाले और नक्सलवाद के समर्थन में बात करने वाले लोग ही दिमागी नक्सली हैं। माओवादियों को आदर्श मानने वाली ऐसी सोच की छत्तीसगढ़ में कोई जगह नहीं है।
अब सवाल सियासत से आगे का :
13 साल बाद भी असली सवाल वही है। झीरम में हमला करने वाले कौन थे, उन्हें इतनी सटीक जानकारी कैसे मिली और क्या इस हमले के पीछे कोई बड़ी साजिश थी। कांग्रेस कह रही है कि जांच अधूरी है।
बीजेपी पूछ रही है कि कांग्रेस सत्ता में थी तब उसने क्या किया। लेकिन इन दोनों राजनीतिक सवालों के बीच उन परिवारों की उम्मीद अब भी टिकी है, जिन्होंने झीरम में अपनों को खोया था। उनके लिए झीरम कोई चुनावी मुद्दा नहीं है। उन्हें राजनीति नहीं, पूरे सच का जवाब चाहिए।
13 साल बाद फैसला :
इस दिन हुए नक्सली हमले में प्रदेश की एक पूरी राजनीतिक पीढ़ी को खत्म कर दिया गया था। कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा से लौट रहे काफिले पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया।
इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, पूर्व विधायक उदय मुदलियार और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गज नेता मारे गए।
FAQ
- झीरम घाटी नरसंहार की घटना कब हुई थी?
उत्तर: 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के दरभा घाटी (झीरम घाटी) में यह नक्सली हमला हुआ था। - झीरम घाटी हमले में छत्तीसगढ़ के किन प्रमुख नेताओं की मौत हुई थी?
उत्तर: इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा, और पूर्व विधायक उदय मुदलियार सहित कई नेता मारे गए थे। - झीरम घाटी नरसंहार मामले में अदालत का फैसला कब आने वाला है?
उत्तर: इस बहुचर्चित मामले में घटना के 13 साल बाद 5 सितंबर को अदालत का फैसला आने वाला है।
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