छह महीने में दो चुनाव, 230 करोड़ खर्च, एक साथ होते तो बचते 100 करोड़ से ज्यादा, छत्तीसगढ़ के इन आंकड़ों ने खोली खर्च की पोल
Arun Tiwari | Nov 04, 2026, 14:19 IST
बार-बार चुनाव का भारी खर्च! छत्तीसगढ़ के आंकड़े खोल रहे हैं वन नेशन, वन इलेक्शन की जरूरत की पोल
RAIPUR. देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की बहस एक बार फिर तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना 'वन नेशन, वन इलेक्शन' के फायदे और चुनौतियों पर चर्चा हो रही है। इस व्यवस्था के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क चुनावी खर्च में कमी को बताया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो यह तर्क काफी हद तक समझ में आता है। राज्य में विधानसभा और लोकसभा चुनाव के बीच महज छह महीने का अंतर रहता है। इन दोनों चुनावों को कराने में सरकारी खजाने से करीब 230 करोड़ रूपए खर्च हुए। यदि दोनों चुनाव एक साथ कराए जाते, तो इस खर्च में 100 करोड़ रूपए से अधिक की बचत की संभावना बन सकती थी।
यहां यह समझना जरूरी है कि चुनाव पर होने वाला सरकारी खर्च सीधे तौर पर आम जनता के टैक्स से जुटाए गए पैसे से होता है। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया को कम खर्चीला बनाना सरकार और करदाताओं, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य के आंकड़े बताते हैं कि एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था लागू होने पर सरकारी संसाधनों की कितनी बड़ी बचत हो सकती है।
छत्तीसगढ़ में दिसंबर 2023 में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी हुई थी। इसके करीब तीन महीने बाद मार्च 2024 में लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू हो गई। यानी राज्य को बहुत कम अंतराल में दो बड़ी चुनावी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा।
छत्तीसगढ़ में विधानसभा की 90 और लोकसभा की 11 सीटें हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, विधानसभा चुनाव 2023 में राज्य सरकार ने 128 करोड़ 78 लाख 35 हजार 906 रूपए खर्च किए। वहीं, लोकसभा चुनाव 2024 में 101 करोड़ 65 लाख 42 हजार 23 रूपए खर्च हुए। दोनों चुनावों का कुल सरकारी खर्च 230 करोड़ 43 लाख 77 हजार 929 रूपए बैठता है। इसमें विधानसभा चुनाव का खर्च राज्य सरकार और लोकसभा चुनाव का खर्च केंद्र सरकार वहन करती है।
यदि दोनों चुनाव एक साथ होते, तो चुनावी प्रबंधन, कर्मचारियों की तैनाती, परिवहन और अन्य व्यवस्थाओं में संसाधनों का साझा इस्तेमाल किया जा सकता था। इससे खर्च में कमी आती।
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 में कुल 128 करोड़ 78 लाख 35 हजार 906 रूपए खर्च किए गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस राशि का बड़ा हिस्सा निर्वाचन व्यवस्था और चुनावी ड्यूटी में लगे कर्मचारियों के मानदेय पर खर्च हुआ।
विधानसभा चुनाव 2023 का खर्च
विधानसभा चुनाव के कुछ महीने बाद ही छत्तीसगढ़ में लोकसभा की 11 सीटों के लिए चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भी सरकारी खजाने पर 100 करोड़ रूपए से अधिक का भार पड़ा।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव 2024 में कुल 101 करोड़ 65 लाख 42 हजार 23 रूपए खर्च हुए। यह खर्च केंद्र सरकार की ओर से वहन किया गया।
एक साथ चुनाव कराने का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि प्रशासन को बार-बार चुनावी तैयारियां नहीं करनी पड़ेंगी। मतदान केंद्रों की व्यवस्था, सुरक्षा बलों की तैनाती, अधिकारियों और कर्मचारियों की ड्यूटी, परिवहन और चुनावी सामग्री जैसी व्यवस्थाओं में साझा संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
हालांकि, दोनों चुनाव एक साथ होने पर भी पूरा खर्च खत्म नहीं होगा। ईवीएम और वीवीपैट की जरूरत, अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था और चुनावी प्रबंधन पर खर्च बना रहेगा।
यह आंकड़ा सिर्फ सरकारी खजाने से होने वाले खर्च का है। इसके अलावा राजनीतिक दलों और चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की ओर से भी बड़ी रकम खर्च की जाती है। चुनाव के दौरान धनबल के इस्तेमाल, नकदी और शराब की जब्ती जैसी घटनाएं भी सामने आती हैं।
एक साथ चुनाव होने पर राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के चुनावी खर्च में भी कुछ कमी आने की संभावना जताई जाती है। हालांकि, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनावी अभियान किस तरह संचालित होते हैं और राजनीतिक दल कितने संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं।
छत्तीसगढ़ के आंकड़े एक सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि जब विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बीच महज कुछ महीनों का अंतर हो, तो क्या बार-बार चुनावी तैयारियों पर होने वाला खर्च कम नहीं किया जा सकता? वन नेशन, वन इलेक्शन की बहस में सरकारी खजाने की बचत एक अहम पहलू है। लेकिन इसके साथ संवैधानिक, प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
यहां यह समझना जरूरी है कि चुनाव पर होने वाला सरकारी खर्च सीधे तौर पर आम जनता के टैक्स से जुटाए गए पैसे से होता है। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया को कम खर्चीला बनाना सरकार और करदाताओं, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य के आंकड़े बताते हैं कि एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था लागू होने पर सरकारी संसाधनों की कितनी बड़ी बचत हो सकती है।
छह महीने के अंतराल में दो बार चुनाव
छत्तीसगढ़ में विधानसभा की 90 और लोकसभा की 11 सीटें हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, विधानसभा चुनाव 2023 में राज्य सरकार ने 128 करोड़ 78 लाख 35 हजार 906 रूपए खर्च किए। वहीं, लोकसभा चुनाव 2024 में 101 करोड़ 65 लाख 42 हजार 23 रूपए खर्च हुए। दोनों चुनावों का कुल सरकारी खर्च 230 करोड़ 43 लाख 77 हजार 929 रूपए बैठता है। इसमें विधानसभा चुनाव का खर्च राज्य सरकार और लोकसभा चुनाव का खर्च केंद्र सरकार वहन करती है।
यदि दोनों चुनाव एक साथ होते, तो चुनावी प्रबंधन, कर्मचारियों की तैनाती, परिवहन और अन्य व्यवस्थाओं में संसाधनों का साझा इस्तेमाल किया जा सकता था। इससे खर्च में कमी आती।
विधानसभा चुनाव में खर्च हुए 128.78 करोड़
विधानसभा चुनाव 2023 का खर्च
- कुल खर्च: 128 करोड़ 78 लाख 35 हजार 906 रूपए
- वेतन: 2 करोड़ 21 लाख रूपए
- मानदेय: करीब 50 करोड़ रूपए
- यात्रा भत्ता और दौरे: करीब 97 हजार रूपए
- निर्वाचन संबंधी खर्च: करीब 77 करोड़ रूपए
लोकसभा चुनाव में भी 101 करोड़ का खर्च
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव 2024 में कुल 101 करोड़ 65 लाख 42 हजार 23 रूपए खर्च हुए। यह खर्च केंद्र सरकार की ओर से वहन किया गया।
लोकसभा चुनाव 2024 का खर्च
- कुल खर्च: 101 करोड़ 65 लाख 42 हजार 23 रूपए
- वेतन: करीब 1 करोड़ 40 लाख रूपए
- मानदेय: करीब 51 करोड़ रूपए
- यात्रा भत्ता और दौरे: करीब 63 हजार रूपए
- निर्वाचन संबंधी खर्च: करीब 50 करोड़ रूपए
एक साथ चुनाव से कहां होगी बचत?
हालांकि, दोनों चुनाव एक साथ होने पर भी पूरा खर्च खत्म नहीं होगा। ईवीएम और वीवीपैट की जरूरत, अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था और चुनावी प्रबंधन पर खर्च बना रहेगा।
सरकारी खर्च के अलावा भी होता है बड़ा चुनावी खर्च
एक साथ चुनाव होने पर राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के चुनावी खर्च में भी कुछ कमी आने की संभावना जताई जाती है। हालांकि, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनावी अभियान किस तरह संचालित होते हैं और राजनीतिक दल कितने संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं।
छत्तीसगढ़ के आंकड़े एक सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि जब विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बीच महज कुछ महीनों का अंतर हो, तो क्या बार-बार चुनावी तैयारियों पर होने वाला खर्च कम नहीं किया जा सकता? वन नेशन, वन इलेक्शन की बहस में सरकारी खजाने की बचत एक अहम पहलू है। लेकिन इसके साथ संवैधानिक, प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
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