प्रदेश के स्कूलों से साढ़े तीन लाख छात्र लापता, तलाश में टीचर, मजदूरी कर रहे बच्चे
Arun Tiwari | Jun 05, 2026, 14:01 IST
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छत्तीसगढ़ में ड्रॉपआउट यानी बच्चों का बीच में पढ़ाई छोड़ देना बड़ी समस्या बनकर सामने आया है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि स्कूल छोड़ना केवल शिक्षा विभाग की समस्या नहीं है, बल्कि यह गरीबी, पलायन, बेरोजगारी और सामाजिक असमानताओं से जुड़ा व्यापक मुद्दा है।
Raipur. छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यू-डायस (UDISE) की वर्ष 2025-26 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 33 जिलों में कक्षा 1 से 12वीं तक के करीब 3 लाख 69 हजार बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ चुके हैं।
यह स्थिति न केवल शिक्षा विभाग बल्कि समाज और सरकार दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन गई है। नए शिक्षा सत्र के पहले जब सरकार ने स्कूल शिक्षा विभाग की समीक्षा की तो यह चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। साढ़े तीन लाख से लापता बच्चों की तलाश की गई तो कई बच्चे दिहाड़ी करते नजर आए।
राज्य में वर्तमान में 51 लाख 67 हजार 357 छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। प्रदेश में कुल 56 हजार 895 स्कूल संचालित हैं। इनमें से 3 लाख 69 हजार बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं। बड़ी संख्या में बच्चों का स्कूल से दूर होना शिक्षा के अधिकार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लक्ष्य पर सवाल खड़े कर रहा है। ड्रॉप आउट बच्चों की यह स्थिति न सिर्फ चिंता बल्कि चिंतन का भी विषय है। बच्चे पढ़ाई छोड़ इधर उधर काम करने को मजबूर हैं।
इन जिलों में सबसे ज्यादा
सबसे अधिक ड्रॉपआउट वाले जिलों में रायपुर पहले स्थान पर है, जहां 34093 बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी है। इसके बाद बिलासपुर में 32489, दुर्ग में 19008, मुंगेली में 17161, कवर्धा और कोरबा में 16637-16637, बलौदाबाजार में 16115, सूरजपुर में 15795, जांजगीर-चांपा में 15362, महासमुंद में 13491,बलरामपुर में 12931, बेमेतरा में 12663 और सरगुजा में 12161 बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रॉपआउट के पीछे सामाजिक और आर्थिक दोनों तरह की समस्याएं जिम्मेदार हैं। प्रदेश के कई परिवार आज भी आर्थिक रूप से कमजोर हैं, जिसके कारण बच्चों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान नहीं दिया जा पाता। कई मामलों में परिवार की आय बढ़ाने के लिए बच्चों को भी काम पर लगाना पड़ता है।
ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा सुविधाओं की कमी भी बच्चों को स्कूल से दूर कर रही है। शिक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि अब कई परिवारों में यह धारणा भी मजबूत हो रही है कि पढ़ाई के बाद भी रोजगार की गारंटी नहीं है। यही कारण है कि कुछ युवा और किशोर जल्दी कमाई की तलाश में मजदूरी या छोटे-मोटे कामों की ओर बढ़ रहे हैं।
बड़ी संख्या में बच्चे अपने माता-पिता के साथ ईंट-भट्ठों और अन्य श्रम कार्यों में लग जाते हैं। लंबे समय तक स्कूल से दूर रहने के कारण उनकी पढ़ाई में रुचि कम हो जाती है। संसाधनों की कमी, स्कूलों का वातावरण और उचित मार्गदर्शन का अभाव भी ड्रॉपआउट बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं।
यह भी सामने आया है कि लड़कियों की तुलना में लड़कों के स्कूल छोड़ने की संख्या अधिक है। विशेषज्ञों के अनुसार कम उम्र में परिवार द्वारा काम या व्यवसाय में लगा दिए जाने के कारण कई लड़के पढ़ाई जारी नहीं रख पाते। कई परिवार उन्हें कमाने वाला सदस्य मानकर शिक्षा से अधिक रोजगार को प्राथमिकता देने लगते हैं।
राज्य के अनेक जिलों में रोजगार के अवसरों की कमी के कारण परिवारों का दूसरे राज्यों में पलायन जारी है। पलायन के दौरान बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और कई बार नए स्थान पर स्कूल में प्रवेश नहीं मिल पाने या नियमित पढ़ाई संभव नहीं होने के कारण वे शिक्षा से पूरी तरह कट जाते हैं। विशेष रूप से श्रमिक परिवारों के बच्चों पर इसका सबसे अधिक असर देखा जा रहा है।
स्कूल ड्रॉपआउट के बढ़ते आंकड़ों पर राज्य सरकार ने भी चिंता व्यक्त की है। मुख्य सचिव ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक कर इस मुद्दे की समीक्षा की। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि स्कूल छोड़ चुके बच्चों की पहचान कर उन्हें दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। इसके लिए विशेष ट्रैकिंग सिस्टम विकसित करने, नियमित निगरानी रखने और जरूरत पड़ने पर ब्रिज कोर्स संचालित करने की योजना बनाई जा रही है।
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यह स्थिति न केवल शिक्षा विभाग बल्कि समाज और सरकार दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन गई है। नए शिक्षा सत्र के पहले जब सरकार ने स्कूल शिक्षा विभाग की समीक्षा की तो यह चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। साढ़े तीन लाख से लापता बच्चों की तलाश की गई तो कई बच्चे दिहाड़ी करते नजर आए।
यह है प्रदेश की स्थिति :
इन जिलों में सबसे ज्यादा ड्रॉपआउट :
cg udise dropout report
आर्थिक संकट बना सबसे बड़ा कारण:
ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा सुविधाओं की कमी भी बच्चों को स्कूल से दूर कर रही है। शिक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि अब कई परिवारों में यह धारणा भी मजबूत हो रही है कि पढ़ाई के बाद भी रोजगार की गारंटी नहीं है। यही कारण है कि कुछ युवा और किशोर जल्दी कमाई की तलाश में मजदूरी या छोटे-मोटे कामों की ओर बढ़ रहे हैं।
बड़ी संख्या में बच्चे अपने माता-पिता के साथ ईंट-भट्ठों और अन्य श्रम कार्यों में लग जाते हैं। लंबे समय तक स्कूल से दूर रहने के कारण उनकी पढ़ाई में रुचि कम हो जाती है। संसाधनों की कमी, स्कूलों का वातावरण और उचित मार्गदर्शन का अभाव भी ड्रॉपआउट बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं।
लड़कों में स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति अधिक :
पलायन भी बना बड़ी चुनौती :
सरकार ने जताई चिंता :
FAQ
छत्तीसगढ़ में कितने बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया है?
UDISE 2025-26 रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ के 33 जिलों में कक्षा 1 से 12वीं तक के करीब 3.69 लाख बच्चों ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी है।- छत्तीसगढ़ में बच्चों के स्कूल छोड़ने के प्रमुख कारण क्या हैं?
आर्थिक तंगी, परिवारों का पलायन, बाल श्रम, शिक्षा सुविधाओं की कमी, पढ़ाई के बाद रोजगार को लेकर अनिश्चितता और स्कूल से लंबे समय तक दूरी ड्रॉपआउट के प्रमुख कारण हैं। - छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा स्कूल ड्रॉपआउट किस जिले में हैं?
रायपुर राज्य में सबसे अधिक स्कूल ड्रॉपआउट वाला जिला है, जहां 34,093 बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी है। इसके बाद बिलासपुर और दुर्ग का स्थान है
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