बकरीद के दिन उर्दू के मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, लिखा था- यूं कोई बेवफा नहीं होता...
Amresh Kushwaha | May 28, 2026, 14:49 IST
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उर्दू के मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार, 28 मई की दोपहर भोपाल में निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे और लंबे समय से डिमेंशिया से पीड़ित थे। उनकी शायरी आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जिंदा है।
समझें क्या है पूरा मामला...
- उर्दू के मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार 28 मई को भोपाल में निधन हो गया।
- 91 साल की उम्र में उन्होंने दोपहर करीब 12 बजे अंतिम सांस ली।
- वे लंबे समय से डिमेंशिया (Dementia) नामक बीमारी से पीड़ित थे।
- याददाश्त जाने के बाद वे लोगों को पहचान भी नहीं पा रहे थे।
उजाले यादों के, अलविदा बशीर बद्र
वे लम्बे समय से डिमेंशिया की बीमारी से जूझ रहे थे। याददाश्त पूरी तरह जा चुकी थी। अपने करीबी लोगों को भी पहचान नहीं पा रहे थे। पिछले कुछ महीनों में उनकी सेहत लगातार खराब चल रही थी।
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जिंदगी को सरल शब्दों में बताया
रिवायती यानी पारंपरिक शायरी के ढर्रे से वे कभी नहीं बंधे। उन्होंने उर्दू गजल को नया लहजा देने का काम किया। उनका यह शेर आज भी समाज का आईना है, लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
1974 से 1990 का सुनहरा दौर
यह सोलह साल का दौर उनकी शायरी का सुनहरा वक्त था। इसी दौर में उनकी गजलें देश-विदेश में पहुंचीं। मुशायरों में उनका नाम सुनते ही महफिलें खिल उठती थीं। उनकी सादगी और गहराई ने उन्हें आम लोगों का शायर बना दिया। उन्हें आधुनिक गजल का उस्ताद माना जाता है। वहीं, साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
वे शेर जो जुबां पर हैं
जिंदगी की बेरुखी को उन्होंने इस तरह कहा, घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे, बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला। यह शेर आज के दौर में भी उतना ही सच लगता है।
शायरी में जिंदगी की छाप
वे चले गए, लेकिन उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनमोल विरासत है।
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