इकबाल से बर्णवाल तक, HC के आदेश के बाद भी 10 साल से अटका कर्मचारियों का मामला
Neel Tiwari | Jul 29, 2026, 08:30 IST
Photograph: (THESOOTR)
JABALPUR. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के 108 कर्मचारियों की वेतन और भत्तों की लड़ाई अब 10वें साल में पहुंच गई है। 2016 में दायर याचिका पर 2017 में फैसला आया, लेकिन आदेश आज तक लागू नहीं हुआ।
मध्य प्रदेश में यह हाल है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी हाईकोर्ट के ही कर्मचारी 10 साल से इंसाफ की आस लगाए बैठे हैं। इस दौरान प्रिंसिपल सेक्रेटरी बदलते रहे, लेकिन आदेशों की फाइल आगे नहीं बढ़ी। तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस से मामला अशोक बर्णवाल तक पहुंच गया। लेकिन तारीखों का खेल खत्म नहीं हुआ।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों केवेतनमानसे जुड़ा मामला दस साल बाद भी समाधान तक नहीं पहुंच पाया है। हाईकोर्टकर्मी अरविंद दुबे और किशन पिल्लई सहित 108 कर्मचारियों ने साल 2016 में वेतनवृद्धि के लिए याचिका दायर की थी। जिनके पक्ष में कोर्ट ने साल 2017 में आदेश पारित किया था।
कोर्ट ने उन्हें वेतन वृद्धि और एरियर का लाभ देने के निर्देश दिए थे। लेकिन इसके बाद भी आदेश का कभी पालन नहीं हो सका। फिर कर्मचारियों ने साल 2018 में कंटेंप्ट पिटिशन दायर की। जिसमें हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कई बार सख्त टिप्पणी की, लेकिन इसी बीच सरकार के प्रमुख सचिव बदलते रहे और मामला अलग-अलग कारणों से आगे बढ़ता रहा।
मामले में हाईकोर्ट ने 28 अप्रैल 2017 को डब्ल्यू पी क्रमांक 7058/2016 (किशन पिल्लई एवं अन्य विरुद्ध मध्य प्रदेश शासन) में आदेश देते हुए कहा था कि जिन कर्मचारियों को 1 अप्रैल 2003 से पहले 3600 रुपए से कम ग्रेड पे पर कार्यरत थे, उन्हें एक अतिरिक्त वेतन वृद्धि और 3600 रुपए ग्रेड पे वाले कर्मचारियों को दो अतिरिक्त वेतन वृद्धियों का लाभ दिया जाए।
साथ ही एरियर का भुगतान भी करने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने यह भी कहा था कि उच्च न्यायालय कर्मचारियों के वेतनमान और भत्तों से जुड़ी सिफारिशों को राज्य सरकार चार महीने के भीतर अंतिम रूप दे।
आदेश का पालन नहीं होने पर कर्मचारियों ने वर्ष 2018 में अवमानना याचिका क्रमांक 3350/2018 दायर की। इस मामले में हाई कोर्ट ने कई बार राज्य सरकार को समय दिया।
5 सितंबर 2019 के आदेश में कोर्ट ने गतिरोध दूर करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके बाद भी जब स्थिति नहीं बदली तो 4 जुलाई 2024 के आदेश में हाई कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि 28 अप्रैल 2017 के आदेश के बाद पिछले सात वर्षों से और 5 सितंबर 2019 के आदेश के बाद पांच वर्षों से राज्य सरकार इस मामले में चुप बैठी है।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि अवमानना याचिका को किसी न किसी बहाने से लगातार टाला गया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा संविधान के अनुच्छेद 229(2) के तहत की गई वेतनमान संबंधी सिफारिशों पर राज्य सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए था। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल आर्थिक बोझ या वित्तीय कमी का हवाला देकर इन सिफारिशों को रोका नहीं जा सकता।
इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के कई प्रमुख सचिव और मुख्य सचिव बदल गए। दिसंबर 2021 में हाई कोर्ट ने तत्कालीन मुख्य सचिव को पक्षकार बनाया था और कहा था कि आदेश के पालन के लिए उनकी उपस्थिति आवश्यक है।
इसके बाद तत्कालीन मुख्य सचिव वीरा राणा को कोर्ट के सामने उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। कोर्ट ने जुलाई 2024 में उन्हें अंतिम अवसर देते हुए कहा था कि राज्य सरकार मामले को गंभीरता से हल करे।
इसके बाद मुख्य सचिव पद पर अनुराग जैन आए। हाई कोर्ट ने 26 मार्च 2026 के आदेश में कहा कि मुख्य सचिव अनुराग जैन को आदेश के पालन में असफल रहने के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए व्यक्तिगत उपस्थिति के निर्देश दिए गए थे।
हालांकि, इसी दौरान उनका कार्यकाल समाप्त हो गया और उन्हें नीति आयोग के सीईओ के रूप में नियुक्त कर दिया गया। अब उनकी जगह अशोक बर्णवाल को मुख्य सचिव बनाया गया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पद बदलने या नया दायित्व मिलने से अवमानना की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होगी।
कंटेंप्ट कोर्ट ने 26 मार्च 2026 के आदेश में कहा था कि 2017 के मूल आदेश का आज तक पालन नहीं हुआ है। कोर्ट ने यह भी माना कि राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत अनुपालन रिपोर्ट पूर्ण अनुपालन नहीं मानी जा सकती।
हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार ने पहले वापस ली गई दलीलों को ही दोबारा प्रस्तुत कर दिया और उसमें वास्तविक विवेकपूर्ण विचार का अभाव दिखाई देता है।
इसी आदेश के खिलाफ मध्य प्रदेश सरकार ने रिट अपील क्रमांक 1356/2026 दायर कर दी। 17 जून 2026 को मामले में सुनवाई हुई, लेकिन पीठ के अधिकार क्षेत्र को लेकर मामला दूसरी पीठ के समक्ष भेजने का निर्णय हुआ।
24 जून 2026 को हाई कोर्ट ने सुनवाई आगे बढ़ाते हुए मुख्य सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति से फिलहाल छूट दी और अवमानना कार्यवाही स्थगित रखी।
इसके बाद 28 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई में महाधिवक्ता ने बताया कि अनुराग जैन का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नए मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल नियुक्त हुए हैं। कोर्ट ने साफ किया कि केवल पद परिवर्तन से जिम्मेदारी खत्म नहीं होगी और मामले की सुनवाई आगे के लिए टाल दी गई।
करीब दस साल पहले शुरू हुआ यह विवाद अब भी अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहा है। हाईकोर्ट के आदेश, कंटेंप्ट कार्यवाही, मुख्य सचिवों की पेशी, सरकार की समितियां और अब रिट अपील के कारण कर्मचारियों को मिलने वाला वेतन लाभ लंबित है।
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने अपने आदेशों में बार-बार यह सवाल उठाया है कि जब देश के कई अन्य उच्च न्यायालयों में कर्मचारियों को समान लाभ दिए जा चुके हैं, तो मध्य प्रदेश में इसे लागू करने में इतनी देरी क्यों हो रही है।
अब 28 जुलाई 2026 के बाद मामले की अगली सुनवाई में यह तय होना है कि सरकार की अपील पर क्या रुख अपनाया जाता है और 2017 के आदेश का पालन कब तक हो पाएगा।
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सरकार ने नहीं किया अनुपालन
कोर्ट ने उन्हें वेतन वृद्धि और एरियर का लाभ देने के निर्देश दिए थे। लेकिन इसके बाद भी आदेश का कभी पालन नहीं हो सका। फिर कर्मचारियों ने साल 2018 में कंटेंप्ट पिटिशन दायर की। जिसमें हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कई बार सख्त टिप्पणी की, लेकिन इसी बीच सरकार के प्रमुख सचिव बदलते रहे और मामला अलग-अलग कारणों से आगे बढ़ता रहा।
10 सालों से चल रही लड़ाई
साथ ही एरियर का भुगतान भी करने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने यह भी कहा था कि उच्च न्यायालय कर्मचारियों के वेतनमान और भत्तों से जुड़ी सिफारिशों को राज्य सरकार चार महीने के भीतर अंतिम रूप दे।
सालों से चुप बैठी है सरकार
5 सितंबर 2019 के आदेश में कोर्ट ने गतिरोध दूर करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके बाद भी जब स्थिति नहीं बदली तो 4 जुलाई 2024 के आदेश में हाई कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि 28 अप्रैल 2017 के आदेश के बाद पिछले सात वर्षों से और 5 सितंबर 2019 के आदेश के बाद पांच वर्षों से राज्य सरकार इस मामले में चुप बैठी है।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि अवमानना याचिका को किसी न किसी बहाने से लगातार टाला गया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा संविधान के अनुच्छेद 229(2) के तहत की गई वेतनमान संबंधी सिफारिशों पर राज्य सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए था। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल आर्थिक बोझ या वित्तीय कमी का हवाला देकर इन सिफारिशों को रोका नहीं जा सकता।
बैंस से बर्णवाल तक पहुंचा विवाद
इसके बाद तत्कालीन मुख्य सचिव वीरा राणा को कोर्ट के सामने उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। कोर्ट ने जुलाई 2024 में उन्हें अंतिम अवसर देते हुए कहा था कि राज्य सरकार मामले को गंभीरता से हल करे।
इसके बाद मुख्य सचिव पद पर अनुराग जैन आए। हाई कोर्ट ने 26 मार्च 2026 के आदेश में कहा कि मुख्य सचिव अनुराग जैन को आदेश के पालन में असफल रहने के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए व्यक्तिगत उपस्थिति के निर्देश दिए गए थे।
हालांकि, इसी दौरान उनका कार्यकाल समाप्त हो गया और उन्हें नीति आयोग के सीईओ के रूप में नियुक्त कर दिया गया। अब उनकी जगह अशोक बर्णवाल को मुख्य सचिव बनाया गया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पद बदलने या नया दायित्व मिलने से अवमानना की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होगी।
कोर्ट के सख्त रुख के बाद अपील
हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार ने पहले वापस ली गई दलीलों को ही दोबारा प्रस्तुत कर दिया और उसमें वास्तविक विवेकपूर्ण विचार का अभाव दिखाई देता है।
इसी आदेश के खिलाफ मध्य प्रदेश सरकार ने रिट अपील क्रमांक 1356/2026 दायर कर दी। 17 जून 2026 को मामले में सुनवाई हुई, लेकिन पीठ के अधिकार क्षेत्र को लेकर मामला दूसरी पीठ के समक्ष भेजने का निर्णय हुआ।
24 जून 2026 को हाई कोर्ट ने सुनवाई आगे बढ़ाते हुए मुख्य सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति से फिलहाल छूट दी और अवमानना कार्यवाही स्थगित रखी।
इसके बाद 28 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई में महाधिवक्ता ने बताया कि अनुराग जैन का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नए मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल नियुक्त हुए हैं। कोर्ट ने साफ किया कि केवल पद परिवर्तन से जिम्मेदारी खत्म नहीं होगी और मामले की सुनवाई आगे के लिए टाल दी गई।
HC के आदेश और सरकार के बीच कानूनी लड़ाई
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने अपने आदेशों में बार-बार यह सवाल उठाया है कि जब देश के कई अन्य उच्च न्यायालयों में कर्मचारियों को समान लाभ दिए जा चुके हैं, तो मध्य प्रदेश में इसे लागू करने में इतनी देरी क्यों हो रही है।
अब 28 जुलाई 2026 के बाद मामले की अगली सुनवाई में यह तय होना है कि सरकार की अपील पर क्या रुख अपनाया जाता है और 2017 के आदेश का पालन कब तक हो पाएगा।
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