राहुल गांधी के आयोजन में 30 शर्तें लगाने वाले डीसीपी पंडाल के लिए धमकाते नजर आए, हाईकोर्ट में पेश
Sanjay Gupta | Sootr Creatives | Oct 15, 2026, 14:44 IST
इंदौर DCP का वीडियो हाईकोर्ट पहुंचा, रहवासियों को धमकाने का आरोप
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम के लिए 30 कड़ी शर्तें लगाने वाले डीसीपी नरेंद्र सिंह रावत अब खुद हाईकोर्ट में पेश हुए हैं। मामला इंदौर के एरोड्रम इलाके में बिना मंजूरी पंडाल लगाने का है। इस मामले में डीसीपी का एक वीडियो भी हाईकोर्ट में पेश किया गया। वीडियो में वे कथित तौर पर रहवासियों को धमकाते नजर आ रहे हैं।
दरअसल, 19 सितंबर को इंदौर में राहुल गांधी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम को लेकर जमकर विवाद हुआ था। कार्यक्रम की मंजूरी देने के लिए डीसीपी नरेंद्र सिंह रावत के जोन की पुलिस ने राजीव गांधी हत्याकांड की जांच रिपोर्ट तक का हवाला दिया था। पुलिस ने कार्यक्रम के लिए 30 शर्तें रखी थीं। इनमें मौके पर स्नेक कैचर बुलाने की शर्त भी शामिल थी। वहीं, अब एरोड्रम इलाके में नेताओं ने बिना मंजूरी पंडाल लगा दिया। इस मामले में एक वीडियो सामने आया है। इसमें डीसीपी रावत पुलिस बल के साथ रहवासियों को कथित तौर पर धमकाते दिख रहे हैं। हाईकोर्ट के आदेश पर डीसीपी रावत गुरुवार को अदालत में पेश हुए।
इंदौर के एरोड्रम इलाके में मुख्य सड़क को रोककर पंडाल लगा दिया गया था। इसकी कई बार शिकायत हुई, लेकिन पंडाल नहीं हटाया गया। इसके बाद रहवासी आशीष जैन ने अधिवक्ता चर्चित शास्त्री के जरिए हाईकोर्ट में याचिका लगा दी। मामले में 13 अक्टूबर को सुनवाई हुई और कोर्ट ने जवाब मांगा। इसके अगले दिन यानी 14 अक्टूबर को पुलिस ने कोर्ट में कहा कि रहवासियों ने पंडाल लगाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी।
इस पर एमपी हाईकोर्ट ने डीसीपी नरेंद्र सिंह रावत को पेश होने के लिए कहा। जैसे ही पुलिस को इसकी जानकारी मिली, आनन-फानन में पंडाल हटवा दिया गया। साथ ही आयोजकों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कर ली गई। गुरुवार को डीसीपी रावत हाईकोर्ट पहुंचे। वे जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय पिल्लई की बेंच के सामने पेश हुए।
गुरुवार को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान डीसीपी नरेंद्र सिंह रावत ने बताया कि पंडाल हटा दिया गया है। साथ ही आयोजकों के खिलाफ केस भी दर्ज कर लिया गया है। इस पर जस्टिस सुबोध अभ्यंकर ने पंडाल का वीडियो मांगा। उन्होंने पूछा कि पंडाल कितने फीट का था और पुलिस ने क्या कार्रवाई की।
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अदित रघुवंशी ने बताया कि सितंबर में शिकायत की गई थी। इसके बाद अक्टूबर में भी शिकायत की, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। जब हाईकोर्ट में याचिका लगी, तब जाकर पुलिस ने एक्शन लिया। इस पर डीसीपी ने कहा कि रहवासियों ने लिखित में दिया था कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।
डीसीपी की इस बात पर जस्टिस अभ्यंकर ने कहा कि रहवासियों को कैसे पता होगा कि क्या प्रक्रिया होती है। अगर कोई अपनी शिकायत वापस ले लेता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि पुलिस कार्रवाई ही न करे।
इस दौरान अधिवक्ता रघुवंशी ने कहा कि राजनीतिक दबाव के चलते बार-बार सड़कें ब्लॉक की जाती हैं। इसे रोकने के लिए गाइडलाइन बननी चाहिए। इस पर हाईकोर्ट की बेंच ने कहा कि एरोड्रम के इस मामले में अब आगे किसी आदेश की जरूरत नहीं है। हालांकि, भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए गाइडलाइन तैयार करने को लेकर राज्य सरकार अपना जवाब दे।
इस मामले में 14 अक्टूबर को हाईकोर्ट में 1 मिनट 11 सेकंड का एक वीडियो भी दिया गया। यह वीडियो द सूत्र के पास भी मौजूद है। कोर्ट में बताया गया कि पुलिस ने पंडाल लगाने के लिए रहवासियों पर दबाव बनाया और उन्हें धमकाया।
वीडियो में डीसीपी नरेंद्र सिंह रावत रहवासियों से कहते नजर आ रहे हैं कि तुम्हारी कौन सी दुकान इससे बाधित हो रही है? इतनी देर से मैं प्यार से बात कर रहा हूं, तो क्या समझ लिया है मुझे?
इसके बाद डीसीपी अपने साथ मौजूद पुलिसकर्मियों से कहते हैं कि इन लोगों के नाम लिखो।
डीसीपी रावत:और कौन क्या कह रहा है? किसका रास्ता बाधित हो रहा है? मैं इसमें एंबुलेंस और आने-जाने के लिए रास्ता दूंगा।
डीसीपी रावत: ये कौन है? इसका आपराधिक रिकॉर्ड है ना? क्या नाम है तुम्हारा?
साथी पुलिस अधिकारी: इनका पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है। ये लोगों को भड़का रहा है। ये जिलाबदर में भी गया है।
रहवासी: नहीं, मेरा कुछ नहीं है।
डीसीपी रावत: तो क्या टीआई झूठ बोल रहे हैं?
क्या है एरोड्रम का मामला
इस पर एमपी हाईकोर्ट ने डीसीपी नरेंद्र सिंह रावत को पेश होने के लिए कहा। जैसे ही पुलिस को इसकी जानकारी मिली, आनन-फानन में पंडाल हटवा दिया गया। साथ ही आयोजकों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कर ली गई। गुरुवार को डीसीपी रावत हाईकोर्ट पहुंचे। वे जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय पिल्लई की बेंच के सामने पेश हुए।
हाईकोर्ट में गुरुवार को यह हुआ
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता अदित रघुवंशी ने बताया कि सितंबर में शिकायत की गई थी। इसके बाद अक्टूबर में भी शिकायत की, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। जब हाईकोर्ट में याचिका लगी, तब जाकर पुलिस ने एक्शन लिया। इस पर डीसीपी ने कहा कि रहवासियों ने लिखित में दिया था कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।
डीसीपी की इस बात पर जस्टिस अभ्यंकर ने कहा कि रहवासियों को कैसे पता होगा कि क्या प्रक्रिया होती है। अगर कोई अपनी शिकायत वापस ले लेता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि पुलिस कार्रवाई ही न करे।
इस दौरान अधिवक्ता रघुवंशी ने कहा कि राजनीतिक दबाव के चलते बार-बार सड़कें ब्लॉक की जाती हैं। इसे रोकने के लिए गाइडलाइन बननी चाहिए। इस पर हाईकोर्ट की बेंच ने कहा कि एरोड्रम के इस मामले में अब आगे किसी आदेश की जरूरत नहीं है। हालांकि, भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए गाइडलाइन तैयार करने को लेकर राज्य सरकार अपना जवाब दे।
हाईकोर्ट में 1.11 मिनट का वीडियो भी, धमकाते दिख रहे
वीडियो में डीसीपी नरेंद्र सिंह रावत रहवासियों से कहते नजर आ रहे हैं कि तुम्हारी कौन सी दुकान इससे बाधित हो रही है? इतनी देर से मैं प्यार से बात कर रहा हूं, तो क्या समझ लिया है मुझे?
इसके बाद डीसीपी अपने साथ मौजूद पुलिसकर्मियों से कहते हैं कि इन लोगों के नाम लिखो।
डीसीपी रावत:और कौन क्या कह रहा है? किसका रास्ता बाधित हो रहा है? मैं इसमें एंबुलेंस और आने-जाने के लिए रास्ता दूंगा।
डीसीपी रावत: ये कौन है? इसका आपराधिक रिकॉर्ड है ना? क्या नाम है तुम्हारा?
साथी पुलिस अधिकारी: इनका पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है। ये लोगों को भड़का रहा है। ये जिलाबदर में भी गया है।
रहवासी: नहीं, मेरा कुछ नहीं है।
डीसीपी रावत: तो क्या टीआई झूठ बोल रहे हैं?
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