इंदौर हाईकोर्ट में बताई 4, भागीरथपुरा कांड में हुई 16 मौत, अब घर-घर जाकर जुटा रहे इलाज के सबूत
Rahul Dave | Jan 03, 2026, 15:39 IST
indore high court bhagirathpura water deathsfacts
भागीरथपुरा कांड में दूषित पानी से हुई मौतों पर शासन ने हाईकोर्ट में गलत आंकड़े पेश किए। मौतों की संख्या को लेकर झूठ बोला गया, अब मामले की जांच जारी है।
Indore. भागीरथपुरा कांड अब सिर्फ दूषित पानी से हुई मौतों का मामला नहीं रहा। यह आंकड़ों की हेराफेरी, जवाबदेही से बचने और हाईकोर्ट को गुमराह करने की एक गंभीर प्रशासनिक साजिश की शक्ल ले चुका है। दूषित पेयजल से मौतों के मामले में जब जनहित याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। तब शासन ने हलफनामे में दावा किया कि सिर्फ चार लोगों की मौत हुई है। यहीं से पूरे झूठ के खेल की परतें खुलनी शुरू होती हैं।
हाई कोर्ट में झूठे आंकड़े पेश करने के बाद हर जगह शासन प्रशासन की किरकिरी होने लगी। तब जाकर नींद में जागे जिम्मेदार और अब सभी उन घरों में जा रहे हैं जहां मौत हुई है। वहां से उपचार के दस्तावेज व अन्य जानकारी ले रहे हैं। उसके बाद औपचारिक तौर पर मौैत के आंकड़े फिर क्लियर करेंगे।
सरकार ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट में सबसे बड़ा झूठ यही कहा कि दूषित पानी से सिर्फ चार लोगों की मौत हुई है। इससे सरकार की असल मंशा साफ दिखती है, जो ये बताती है कि जनता की मौत पर इतना भ्रम फैला दो कि सही आंकड़ा किसी को भी न पता चले। इस झूठ का असली पता इससे चलता है कि शासन और प्रशासन कितनी सच्चाई छुपा रहे हैं।
1) क्षेत्रीय पार्षद 15 से अधिक मौतों की पुष्टि कर चुके है।
2) महापौर पुष्यमित्र भार्गव सार्वजनिक रूप से 10 मौतों की बात कह चुके थे।
3) कलेक्टर शिवम वर्मा खुद 5 मौतों की पुष्टि कर चुके थे।
सवाल: अगर मौतें चार ही थीं, तो शासन के अपने अधिकारी और जनप्रतिनिधि अलग-अलग आंकड़े क्यों बता रहे हैं?
स्टेटस रिपोर्ट में सरकार की ओर से कहा गया कि 29 दिसंबर को भागीरथ पुरा में उल्टी-दस्त के मामले सामने आए। इस पर जिला प्रशासन ने तुरंत संज्ञान लिया। यह भी एक झूठ है, क्योंकि इसके पहले 24 दिसंबर को और उससे भी पहले लगातार उल्टी-दस्त के मामले सामने आने लगे थे। ये हम नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग ने दावा किया था।
भागीरथपुरा की जनता पहले से ही कह रही थी कि पानी में बदबू है। 29 दिसंबर से पहले, 24 दिसंबर को ही मौतें शुरू हो चुकी थीं। सरकार ने 29 दिसंबर तक कुछ नहीं किया। फिर हाईकोर्ट में यह झूठ बोला गया कि तुरंत संज्ञान लिया गया। असल में यह तुरंत संज्ञान नहीं था, बल्कि घटना के बाद बचाव की एक कोशिश थी।
सरकार ने इंदौर हाईकोर्ट की बेंच को यह बताया कि भागीरथपुरा मामले को आपातकालीन चिकित्सा स्थिति के रूप में देखा जा रहा है, न कि सामान्य चिकित्सा के रूप में। सरकार का कहना है कि यह प्रतिक्रिया राज्य सरकार का मानवीय और कल्याणकारी दृष्टिकोण दिखाती है। लेकिन ये भी एक झूठ है, जिसे सच छिपाने के लिए बोला गया है।
1) महीनों से दूषित पानी की शिकायतें अनसुनी रही
2) प्रदूषण विभाग ने चार साल पहले ही रिपोर्ट में खुलासा किया था कि यह दूषित पानी आ रहा है। इतना ही नहीं तीन बार निगम को पत्र लिखकर चेताया भी था।
3 ) मौतों के बाद ही टेंडर और फाइलें चलने लगी
4) पहले लापरवाही, फिर मानवता की दुहाई
5) यह मानवीय दृष्टिकोण नहीं, डैमेज कंट्रोल है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि हाईकोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था के सामने शासन ने अधूरी या गलत जानकारी दी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि, अगर कोर्ट को वास्तविक मौतों की संख्या बताई जाती, तो जवाबदेही तय होती और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई संभव होती।
वहीं कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि यह साबित होता है कि शासन ने जानबूझकर मौतों की संख्या कम बताई है। तब यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि कोर्ट की अवमानना के दायरे में भी आ सकता है।
भागीरथपुरा कांड से जुड़ी खबर पढ़िए...
भागीरथपुरा कांड: दूषित पानी से 16 मौतें, हाईकोर्ट में 4 का दावा
एक ओर हाईकोर्ट में शासन के वकील यह कह रहे हैं कि दूषित पानी से सिर्फ चार मौतें हुई हैं। वहीं दूसरी ओर इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा सार्वजनिक रूप से पांच मौतों की पुष्टि कर चुके हैं।
इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि खुद क्षेत्रीय पार्षद 15 से अधिक मौतों की बात स्वीकार कर चुके हैं। जबकि महापौर पुष्यमित्र भार्गव दूषित जल से 10 मौतें होने की बात कह रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर मौतें चार ही थीं, तो कलेक्टर पांच और पार्षद 15 व महापौर 10 मौतों की बात क्यों कर रहे हैं? क्या शासन के पास मौतों की कोई एकीकृत और सत्यापित सूची नहीं है, या फिर जानबूझकर आंकड़ों को दबाया जा रहा है?
यह भी आरोप है कि जिन मौतों को प्रशासन ने स्वीकार किया, केवल उन्हीं मामलों में कागजी कार्रवाई की गई है। बाकी जिन परिवारों ने मुश्किलें झेली, वो अब भी मुआवजे और न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अब यह देखना होगा कि उन्हें मुआवजा मिलेगा या नहीं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
भागीरथपुरा क्षेत्र में कई दिनों तक लोगों को नलों से गंदा, बदबूदार और मटमैला पानी सप्लाई होता रहा। लोगों ने शुरुआत में इसे नजरअंदाज किया, लेकिन जल्द ही उल्टी-दस्त, पेट दर्द और तेज बुखार के मामले बढने लगे। सैकड़ों लोग अस्पतालों में भर्ती हुए और कई मरीजों की इलाज के दौरान मौत हो गई।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मौतों को अलग-अलग कारणों से जोडकर दूषित पानी की जिम्मेदारी से प्रशासन बचने की कोशिश कर रहा है। किसी की मौत को हार्ट अटैक बताया गया, किसी को पुरानी बीमारी से जोड़ दिया गया। जबकि परिजनों का कहना है कि सभी मृतकों की तबीयत पानी पीने के बाद ही बिगड़ी थी।
मौतों के आंकड़ों को लेकर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का कहना है कि, जो लोग डिस्पेंसरी के जरिए हॉस्पिटल में गए हैं, उनके आंकड़े हैं, पर कुछ लोग डायरेक्ट चले गए थे। हम उन्हें कन्फर्म कर रहे हैं। पार्षद ने मुझे बताया है कि 14-15 मौत हुई है। अधिकारियों को हमने निर्देश दिए हैं।
पूरी घटना में यह भी सामने आया कि भागीरथपुरा कांड से जुड़ी कई फाइलें महीनों तक दबाकर रखी गईं। टेंडर प्रक्रिया, पाइपलाइन सुधार और जल आपूर्ति से जुड़े निर्णय घटना के बाद तेजी से लिए गए। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि अगर पहले ही व्यवस्था दुरुस्त होती तो क्या ये मौतें रोकी जा सकती थीं?
मौत के वास्तविक आकंड़े बताने के लिए अब प्रशासन ने स्वास्थ्य विभाग को आदेश दिए हैं। इसके तहत अब घर-घर जाकर जो मृतक है उनके यहां से उपचार के दस्तावेज लिए जा रहे हैं। जिससे साबित हो कि यह मौत भी डायरिया से हुई है।
उपचार के दस्तावेज नहीं होने पर आसपास के बयान व अन्य सबूत जुटाए जाएंगे। इससे साबित होगा कि मौत इसी वजह से हुई या अन्य कारण से। इसके बाद औपचारिक तौर पर मौत का आंकड़ा जारी होगा। वहीं पांच माह के बच्चे की मौत में विभाग को सबूत मिला है कि उसका निजी डाक्टर के पास उपचार हुआ था, उसे भी अब डायरिया में माना जाएगा।
सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी का बयान- कलेक्टर के निर्देश पर सभी घरों में जा रहे हैं और जहां मौत हुई है उनके उपचार के दस्तावेज व अन्य जानकारी ले रहे हैं। इसके बाद औपचारिक तौर पर मौैत के आंकड़े बता सकेंग। भागीरथपुरा में दूषित पानी की सप्लाई | इंदौर महापौर पुष्यमित्र
हाई कोर्ट में झूठे आंकड़े पेश करने के बाद हर जगह शासन प्रशासन की किरकिरी होने लगी। तब जाकर नींद में जागे जिम्मेदार और अब सभी उन घरों में जा रहे हैं जहां मौत हुई है। वहां से उपचार के दस्तावेज व अन्य जानकारी ले रहे हैं। उसके बाद औपचारिक तौर पर मौैत के आंकड़े फिर क्लियर करेंगे।
झूठ नंबर–1| मौतें सिर्फ चार
1) क्षेत्रीय पार्षद 15 से अधिक मौतों की पुष्टि कर चुके है।
2) महापौर पुष्यमित्र भार्गव सार्वजनिक रूप से 10 मौतों की बात कह चुके थे।
3) कलेक्टर शिवम वर्मा खुद 5 मौतों की पुष्टि कर चुके थे।
सवाल: अगर मौतें चार ही थीं, तो शासन के अपने अधिकारी और जनप्रतिनिधि अलग-अलग आंकड़े क्यों बता रहे हैं?
झूठ नंबर–2 | 29 दिसंबर को संज्ञान?
भागीरथपुरा की जनता पहले से ही कह रही थी कि पानी में बदबू है। 29 दिसंबर से पहले, 24 दिसंबर को ही मौतें शुरू हो चुकी थीं। सरकार ने 29 दिसंबर तक कुछ नहीं किया। फिर हाईकोर्ट में यह झूठ बोला गया कि तुरंत संज्ञान लिया गया। असल में यह तुरंत संज्ञान नहीं था, बल्कि घटना के बाद बचाव की एक कोशिश थी।
झूठ नंबर–3 | आपातकालीन चिकित्सा या कागजी मानवता?
हकीकत
2) प्रदूषण विभाग ने चार साल पहले ही रिपोर्ट में खुलासा किया था कि यह दूषित पानी आ रहा है। इतना ही नहीं तीन बार निगम को पत्र लिखकर चेताया भी था।
3 ) मौतों के बाद ही टेंडर और फाइलें चलने लगी
4) पहले लापरवाही, फिर मानवता की दुहाई
5) यह मानवीय दृष्टिकोण नहीं, डैमेज कंट्रोल है।
हाईकोर्ट में अधूरी या गलत जानकारी
वहीं कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि यह साबित होता है कि शासन ने जानबूझकर मौतों की संख्या कम बताई है। तब यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि कोर्ट की अवमानना के दायरे में भी आ सकता है।
भागीरथपुरा कांड से जुड़ी खबर पढ़िए...
भागीरथपुरा कांड: दूषित पानी से 16 मौतें, हाईकोर्ट में 4 का दावा
मौतों के अलग-अलग आंकड़े
इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि खुद क्षेत्रीय पार्षद 15 से अधिक मौतों की बात स्वीकार कर चुके हैं। जबकि महापौर पुष्यमित्र भार्गव दूषित जल से 10 मौतें होने की बात कह रहे हैं।
क्या जानबूझकर आंकड़ों को दबाया जा रहा ?
मुआवजे का खेल तो नहीं
एक-एक कर सामने आईं मौतें
स्थानीय लोगों का आरोप है कि मौतों को अलग-अलग कारणों से जोडकर दूषित पानी की जिम्मेदारी से प्रशासन बचने की कोशिश कर रहा है। किसी की मौत को हार्ट अटैक बताया गया, किसी को पुरानी बीमारी से जोड़ दिया गया। जबकि परिजनों का कहना है कि सभी मृतकों की तबीयत पानी पीने के बाद ही बिगड़ी थी।
मंत्री बोले- हम कंफर्म कर रहे हैं
मौत के बाद भी फाइलों में खेल
मौत के वास्तविक आकंड़े बताने के लिए अब प्रशासन ने स्वास्थ्य विभाग को आदेश दिए हैं। इसके तहत अब घर-घर जाकर जो मृतक है उनके यहां से उपचार के दस्तावेज लिए जा रहे हैं। जिससे साबित हो कि यह मौत भी डायरिया से हुई है।
उपचार के दस्तावेज नहीं होने पर आसपास के बयान व अन्य सबूत जुटाए जाएंगे। इससे साबित होगा कि मौत इसी वजह से हुई या अन्य कारण से। इसके बाद औपचारिक तौर पर मौत का आंकड़ा जारी होगा। वहीं पांच माह के बच्चे की मौत में विभाग को सबूत मिला है कि उसका निजी डाक्टर के पास उपचार हुआ था, उसे भी अब डायरिया में माना जाएगा।
सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी का बयान- कलेक्टर के निर्देश पर सभी घरों में जा रहे हैं और जहां मौत हुई है उनके उपचार के दस्तावेज व अन्य जानकारी ले रहे हैं। इसके बाद औपचारिक तौर पर मौैत के आंकड़े बता सकेंग। भागीरथपुरा में दूषित पानी की सप्लाई | इंदौर महापौर पुष्यमित्र
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