रिटायरमेंट के 15 साल बाद भी न पेंशन न ग्रेच्युटी, हाईकोर्ट ने DEO पर लगाया 10 हजार का जुर्माना

Neel Tiwari | Feb 10, 2026, 18:20 IST
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High Court imposed a fine of Rs 10 thousand on DEO
Photograph: (the sootr)

हाईकोर्ट ने रिटायरमेंट के 15 साल बाद भी पेंशन-ग्रेच्युटी नहीं मिलने पर डीईओ घनश्याम सोनी पर 10 हजार का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने इस प्रशासनिक लापरवाही पर सख्त रुख अपनाया है।

News in Short

  • रिटायरमेंट के 15 साल बाद भी पेंशन और रिटायरल देनदारियां लंबित
  • हाईकोर्ट ने जबलपुर DEO पर लगाया 10 हजार का जुर्माना लगाया
  • आदेश पालन के लिए एक सप्ताह की अंतिम मोहलत
  • जानकारी न देने पर स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को तलब करने की चेतावनी
  • याचिकाकर्ता दिव्यांग, परिवार लंबे समय से आर्थिक संकट में

Intro

रिटायरमेंट के बाद सम्मानपूर्वक जीवन जीना हर सरकारी कर्मचारी का संवैधानिक अधिकार है। जब यह अधिकार ही वर्षों तक छीना जाए, तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है।

जबलपुर के एक सेवानिवृत्त और दिव्यांग कर्मचारी को 15 साल बाद भी पेंशन और रिटायरल भुगतान नहीं मिलने पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जबलपुर हाईकोर्ट ने इस गंभीर प्रशासनिक लापरवाही पर जिला शिक्षा अधिकारी घनश्याम सोनी पर जुर्माना लगाते हुए अंतिम चेतावनी जारी की है। साथ ही प्रमुख सचिव को तलब करने की चेतावनी भी दी है।

NEWS IN DETAIL

15 साल से अटका वैधानिक अधिकार, कोर्ट ने जताई नाराजगी

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों को समय पर पेंशन और रिटायरल लाभ देना कोई उपकार नहीं, बल्कि संवैधानिक और वैधानिक दायित्व है।

जस्टिस विशाल मिश्रा की सिंगल बेंच ने पाया कि प्रकाश नारायण गुप्ता जैसे कर्मचारी को 15 वर्षों तक उसके अधिकार से वंचित रखना न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के भी विपरीत है। इसी नाराजगी के चलते अदालत ने जबलपुर के जिला शिक्षा अधिकारी घनश्याम सोनी पर 10 हजार रुपए का जुर्माना लगाया।

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आदेश पालन की आखिरी मोहलत

कोर्ट ने साफ कहा कि अब और टालमटोल बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जिला शिक्षा अधिकारी को एक सप्ताह के भीतर सभी आवश्यक जानकारियों और दस्तावेजों के साथ आदेश का पालन सुनिश्चित करना होगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि तय समय सीमा में स्थिति स्पष्ट नहीं की गई, तो स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को 17 फरवरी को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा, जिसकी जिम्मेदारी सीधे प्रशासन पर होगी।

रिटायरमेंट के बाद भी संघर्ष

याचिकाकर्ता प्रकाश नारायण गुप्ता 2010 में रिटायर हुए थे, लेकिन आज तक न तो उनकी पेंशन तय की गई और न ही रिटायरमेंट के समय दिया जाने वाला भुगतान किया गया। याचिका के अनुसार, उन्हें GPF के 65 हजार रुपए, छठे वेतन आयोग का एरियर 1 लाख 7 हजार रुपए, अवकाश नकदीकरण 1 लाख 70 हजार रुपए और ग्रेच्युटी के 3 लाख 58 हजार 121 रुपए का भुगतान अब तक नहीं मिला है। इतने वर्षों तक पेंशन निर्धारण न होना प्रशासन की गंभीर विफलता को दर्शाता है।

आर्थिक तंगी में बीता हर साल

याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह भी बताया कि वे दिव्यांग हैं और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली राशि पर ही उनका और उनके परिवार का जीवन निर्भर था। भुगतान न मिलने के कारण उन्हें इलाज, दैनिक जरूरतों और सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए भारी आर्थिक संकट झेलना पड़ा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि यह कोई दया या अनुकंपा की मांग नहीं, बल्कि दशकों की सेवा के बाद अर्जित उनका वैधानिक और नैतिक अधिकार है।

रिकॉर्ड तलाशने में भी लापरवाही

मामले की पिछली सुनवाई में यह तथ्य सामने आया था कि 7 फरवरी 2011 को जिला शिक्षा अधिकारी ने संयुक्त संचालक, लोक शिक्षण को पत्र लिखकर GPF आहरण से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की बात कही थी। कोर्ट ने इस पर गंभीर सवाल उठाया कि बीते 14 वर्षों में उन रिकॉर्ड्स को खोजने के लिए क्या ठोस प्रयास किए गए। राज्य सरकार के वकील भी इस संबंध में कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे सके, जिससे प्रशासनिक उदासीनता उजागर हुई।

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अब नहीं चलेगा कोई बहाना

मंगलवार को जस्टिस विशाल मिश्रा की सिंगल बेंच में हुई सुनवाई के दौरान जिला शिक्षा अधिकारी घनश्याम सोनी स्वयं अदालत में उपस्थित हुए, लेकिन स्पष्ट निर्देशों के बावजूद संतोषजनक जानकारी प्रस्तुत नहीं कर सके। इस पर अदालत ने 10 हजार रुपए का जुर्माना लगाते हुए आखरी मौका दिया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने प्रभावी पैरवी करते हुए कहा कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही से जुड़ा है।

यह मामला एक बार फिर बताता है कि रिटायरमेंट के बाद भी न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, और जब तक अदालत सख़्त न हो, प्रशासन हरकत में नहीं आता।





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