सिया विवाद मामले में अब जांच के घेरे में IAS श्रीमन शुक्ला, फैक्ट फाइडिंग कमेटी ने किया दिल्ली तलब
Dablu Kumar | Oct 01, 2025, 09:46 IST
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एमपी सिया की ओर से 237 पर्यावरणीय मंजूरी गैर-कानूनी तरीके से जारी करने का मामला चर्चा में था। अब इस मामले में आईएएस अधिकारी श्रीमन शुक्ला को दिल्ली तलब किया गया है।
Bhopal. मध्यप्रदेश स्टेट एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट अथॉरिटी (MP-SEIAA) की ओर से 237 पर्यावरणीय मंजूरी गैर-कानूनी तरीके से जारी करने का मामला चर्चा में था। अब इस मामले में आईएएस अधिकारी श्रीमन शुक्ला भी जांच के दायरे में आ गए हैं। श्रीमन शुक्ला वर्तमान में जनजातीय कार्य विभाग में कमिश्नर के पद पर कार्यरत हैं, लेकिन जब ये विवादित मंजूरियां जारी की गई थीं।
केंद्र सरकार ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव डॉ. अमनदीप गर्ग की अध्यक्षता में एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन किया है। यह कमेटी शिव नारायण सिंह चौहान द्वारा किए गए चार शिकायती पत्रों और सुप्रीम कोर्ट में लंबित रिट याचिका के संबंध में जवाब दाखिल करने के लिए बनाई गई है।
कमेटी की पहली बैठक 1 अक्टूबर को दिल्ली स्थित पर्यावरण भवन में आयोजित होगी। 25 सितंबर को इस कमेटी ने मध्य प्रदेश पर्यावरण विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत मोहन कोठारी और एसआईए की तत्कालीन मेंबर सेक्रेटरी आर. उमा महेश्वरी को दिल्ली बुलाकर उनका पक्ष सुना था। कमेटी अब मामले की जांच में और अधिक जानकारी जुटाने के लिए अन्य संबंधित व्यक्तियों को भी तलब कर सकती है।
इसके अलावा राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण के चेयरमैन शिवनारायण सिंह चौहान और सदस्य सुनंदा सिंह रघुवंशी को भी कमेटी ने तलब किया था। मंगलवार को कमेटी ने एक और नोटिस जारी करते हुए एसआईए के प्रभारी मेंबर सेक्रेटरी के रूप में 237 पर्यावरणीय मंजूरियों पर हस्ताक्षर करने वाले आईएएस अधिकारी श्रीमन शुक्ला को आरोपी मानते हुए दिल्ली बुला लिया है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के इन्वेस्टिगेशन एंड एडमिनिस्ट्रेटिव डिवीजन की डायरेक्टर श्रुति राय भारद्वाज ने इस मामले में राज्य सरकार को पत्र भेजकर जानकारी दी है। मध्य प्रदेश पर्यावरण विभाग के मौजूदा अतिरिक्त मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल और राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण के वर्तमान मेंबर सेक्रेटरी दीपक आर्य भी दिल्ली जाकर कमेटी के समक्ष स्थिति स्पष्ट करेंगे।
यह ध्यान देने वाली बात यह है कि 7 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई होनी है, जिसमें केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा की जा रही है। इस प्रकार, फैक्ट फाइंडिंग कमेटी को 7 अक्टूबर से पहले अपनी जांच रिपोर्ट तैयार कर सुप्रीम कोर्ट में पेश करनी होगी।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने मध्य प्रदेश के एनवायरोमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) से जुड़े विवाद की जांच करने के लिए एक नई कमेटी बनाई है। ये कमेटी सिया के कामकाज में जो भी गलतियां या अनियमितताएं हैं, उनकी जांच करेगी। जब ये जांच पूरी हो जाएगी, तो कमेटी अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करेगी।
SEIAA का काम भारत में चल रही विकास परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव को जांचना होता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इन परियोजनाओं से पर्यावरण को कोई नुकसान न हो। लेकिन पिछले कुछ महीनों में, मध्य प्रदेश के SEIAA के कामकाज को लेकर कई शिकायतें आई हैं। इनमें पर्यावरणीय मंजूरी में गड़बड़ियां, मंजूरी देने की प्रक्रिया में हेराफेरी और फैसले लेने में पारदर्शिता की कमी जैसी बातें सामने आई हैं।
यह कमेटी अपनी पहली बैठक 1 अक्टूबर को नई दिल्ली में करने वाली है। मंत्रालय ने सिया से जुड़े कुछ अहम लोगों को इस बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली बुलाया है। इनमें सिया के अध्यक्ष शिवनारायण सिंह चौहान, सदस्य सुनंदा सिंह रघुवंशी, पूर्व प्रमुख सचिव आईएएस नवनीत मोहन कोठारी, और सदस्य सचिव आईएएस उमा महेश्वरी आरशामिल होंगे।
कमेटी का मुख्य काम सिया में जो भी गड़बड़ियां और गलत काम हुए हैं, उनकी जांच करना है। इसके अलावा, यह कमेटी यह भी देखेगी कि जो पर्यावरणीय मंजूरी दी गई हैं, वो सही हैं या नहीं, और क्या वे भारत के पर्यावरण कानूनों और नीतियों के मुताबिक हैं। जब जांच पूरी हो जाएगी, तो कमेटी अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को देगी, जिससे आगे की कार्रवाई का रास्ता तय होगा।
SEIAA के पर्यावरणीय प्रकरणों में अनुमति देने के विवाद को लेकर पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था। इसके बाद, राज्य सरकार ने एप्को के आयुक्त नवनीत कोठारी और कार्यकारी संचालक उमा महेश्वरी को उनके पदों से हटा दिया था।
दरअसल पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 के तहत 8 प्रकार के प्रोजेक्ट में पर्यावरणीय मंजूरी लेना अनिवार्य है। इनमें खनन, सिंचाई, सड़क-हाईवे आदि हैं। बता दें कि 250 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल के प्रोजेक्ट में ईसी जारी करने के अधिकार केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और 250 हेक्टेयर से कम के प्रोजेक्ट में सिया के पास है। ऑफ द रिकार्ड सभी मानते हैं कि खनन, सिंचाई, सड़क-हाईवे आदि प्रोजेक्ट अरबों की लागत वाले होते हैं। इसलिए 25-50 लाख की दान- दक्षिणा के बिना कोई भी अनुमति इन प्रोजेक्ट को मिलती ही नहीं है। thesootr किसी भी तरह का आरोप नहीं लगा रहा है, मगर नीचे ग्राफ से समझेंगे तो संदेह अपने आप नजर आ ही जाएगा…
सिया चेयरमैन शिवनारायण चौहान का कहना है कि अथॉरिटी के अलावा किसी और को ईसी जारी करने का अधिकार नहीं है। फिर अस्थायी प्रभार संभालने के सिर्फ एक दिन बाद ही श्रीमन शुक्ला को अनुमतियां जारी करने की ऐसी कौन सी जल्दी थी?
आरोप है कि बिना तकनीकी मूल्यांकन, बिना चर्चा, बिना जरूरी दस्तावेजों के, परियोजनाओं को हरी झंडी मिल गई। कई मामलों में खनिज के नाम और मात्रा तक बदल दी गई।
राज्य सरकार के अधिकारियों ने केंद्र सरकार के आदेशों का पालन करने के बजाय SEIAA को कमजोर करने, उस पर दबाव बनाने और ब्लैकमेल करने का प्रयास किया।
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सदस्य सचिव, SEIAA:
SEIAA को स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करने दिया, बल्कि उस पर दबाव बनाया।
खनन माफिया और दलाल:
मंजूरी देने के बदले कथित तौर पर आर्थिक लाभ लिए गए।
पर्यावरण को होगा भारी नुकसान
आपको बता दें कि Thesootr के पास इस भ्रष्टाचार से जुड़े मामले के सभी दस्तावेज मौजूद हैं। जिन प्रोजेक्ट को आंख बंद करके अनुमति दी गई हैं, उनमें से कई ऐसे हैं जो पर्यावरण के लिए गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल मुख्य सचिव के सामने भी है कि इस मामले की जानकारी के बाद क्या वे कोई ठोस कार्यवाही करेंगे? क्या ये अनुमतियां रद्द की जाएंगी या फिर इस मामले में चांज बैठाई जाएगी?
इधर सिया चेयरमैन शिवनारायण चौहान ने 26 मई को केंद्र को इस मामले की रिपोर्ट भेज दी है। उसके मुताबिक, 17 मार्च से 15 मई के बीच उन्होंने 10 बार मेंबर सेक्रेटरी को नोटशीट लिखी। इसके अलावा, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव को भी 22 पत्र भेजे। इन पत्रों में मेंबर सेक्रेटरी की मनमानी और बैठक न बुलाने की शिकायत की गई थी। इसके बावजूद कोई कार्यवाही नहीं हुई। चौहान का कहना है कि बिना बैठक के ईसी जारी करना नियमों के खिलाफ है।
इस खेल में अवैध खनन परियोजनाओं को मंजूरी दिलाई गई। जिन कंपनियों को नियमों के तहत मंजूरी नहीं मिल सकती थी, उन्हें भी फायदा पहुंचाया गया।
1. सदस्य सचिव, SEIAA: बिना सामूहिक निर्णय के, अकेले ही सैकड़ों मंजूरियां जारी कीं।
2. प्रमुख सचिव, पर्यावरण विभाग, म.प्र. शासन: अवैध फैसलों को स्वीकृति दी, केंद्र सरकार के आदेशों की अनदेखी की।
3. SEIAA के अन्य अधिकारी: बैठक बुलाने के अनुरोध को नजरअंदाज किया, उच्च अधिकारियों के दबाव में काम किया।
4. खनन माफिया और दलाल: अधिकारियों से सांठगांठ कर अवैध मंजूरी दिलाई।
SEIAA में बिना बैठक, बिना सामूहिक निर्णय, अकेले ही सैकड़ों परियोजनाओं को मंजूरी देकर करोड़ों का घोटाला किया गया। इसमें सदस्य सचिव, प्रमुख सचिव, अन्य अधिकारी और खनन माफिया की मिलीभगत स्पष्ट है। पर्यावरणीय सुरक्षा और कानून की धज्जियां उड़ाई गईं। अब इस मामले में तत्काल जांच, दोषियों पर कार्रवाई और सभी अवैध मंजूरियों को निरस्त करने की मांग उठ रही है।
स्टेट एनवायरोमेंट इम्पेक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) भारत सरकार द्वारा स्थापित एक राज्य स्तरीय निकाय है, जिसका मुख्य कार्य राज्यों में विभिन्न विकास परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance - EC) देना है। इसका गठन पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और EIA (Environmental Impact Assessment) अधिसूचना, 2006 के तहत किया गया है।
पर्यावरणीय मंजूरी देना:
SEIAA का मुख्य कार्य राज्य के भीतर आने वाली 'Category B' परियोजनाओं (जैसे छोटे-बड़े उद्योग, खनन, निर्माण, सड़क, पावर प्लांट आदि) को पर्यावरणीय मंजूरी देना है।
SEAC से सलाह लेना:
SEIAA के निर्णय लेने से पहले, राज्य पर्यावरण मूल्यांकन समिति (SEAC) तकनीकी मूल्यांकन करती है और अपनी सिफारिश देती है। SEIAA अंतिम मंजूरी देती है या अस्वीकार करती है।
जन सुनवाई और पारदर्शिता:
परियोजना क्षेत्र में जन सुनवाई आयोजित कराई जाती है, जिसमें स्थानीय लोगों की आपत्तियों और सुझावों को शामिल किया जाता है।
पर्यावरणीय शर्तों की निगरानी:
मंजूरी मिलने के बाद, परियोजना प्राधिकरण को हर छह महीने में अनुपालन रिपोर्ट देनी होती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पर्यावरणीय शर्तों का पालन हो रहा है।
श्रीमन शुक्ला दिल्ली तलब
उस वक्त आर. उमा महेश्वरी के छुट्टी पर जाने के कारण श्रीमन शुक्ला एमपी-एसआईए के प्रभारी मेंबर सेक्रेटरी थे। उनके हस्ताक्षर से ही ये मंजूरियां जारी हुई थीं। इस मामले की जांच के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने बुधवार को आईएएस श्रीमन शुक्ला को दिल्ली तलब कर लिया है। यानी आज वह अपना पक्ष फैक्ट फाइंडिंग कमेटी के सामने अपना पक्ष रखेंगे।
25 सितंबर को उमा मेहश्वरी से हुई पूछताछ
कमेटी की पहली बैठक 1 अक्टूबर को दिल्ली स्थित पर्यावरण भवन में आयोजित होगी। 25 सितंबर को इस कमेटी ने मध्य प्रदेश पर्यावरण विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत मोहन कोठारी और एसआईए की तत्कालीन मेंबर सेक्रेटरी आर. उमा महेश्वरी को दिल्ली बुलाकर उनका पक्ष सुना था। कमेटी अब मामले की जांच में और अधिक जानकारी जुटाने के लिए अन्य संबंधित व्यक्तियों को भी तलब कर सकती है।
कमेटी ने जारी किया नोटिस
अशोक बर्णवाल और दीपक आर्य पेश करेंगे रिपोर्ट
यह ध्यान देने वाली बात यह है कि 7 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई होनी है, जिसमें केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा की जा रही है। इस प्रकार, फैक्ट फाइंडिंग कमेटी को 7 अक्टूबर से पहले अपनी जांच रिपोर्ट तैयार कर सुप्रीम कोर्ट में पेश करनी होगी।
जानें पूरा मामला
SEIAA के कामकाज को लेकर कई शिकायतें आई
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी करेगी जांच
केंद्र सरकार ने इस विवाद की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन किया है। यह कमेटी मध्य प्रदेश में SEIAA के कामकाज में हुई संभावित अनियमितताओं और आरोपित गलत कार्यों की जांच करेगी। जांच पूरी होने के बाद, कमेटी अपनी तथ्यात्मक रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करेगी। इस कमेटी की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव अमनदीप गर्ग करेंगे। कमेटी में सतीश वाटे को सदस्य और मंत्रालय के संयुक्त सचिव रजत अग्रवाल को संयोजक के रूप में नियुक्त किया गया है।
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की पहली बैठक
क्यों बनाई कमेटी
SEIAA विवाद एमपी को लेकर SC ने कही थी ये बात
जानें क्या है सिया का मतलब...सिया चेयरमैन एसएस चौहान ने बताया कि सिया का मतलब स्टेट एनवायरनमेंट इंपैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी है। यह संस्था पर्यावरण के लिए जरूरी अनुमतियां देती है। भारत सरकार के तय नियमों के अनुसार, राज्य स्तर पर सिया को शक्तियां दी गई हैं। बड़ी परियोजनाओं के लिए मंजूरी भारत सरकार देती है (कैटेगरी ए), जबकि छोटे राज्यों के मामलों में सिया को अनुमति देने का अधिकार होता है (कैटेगरी बी)। इस प्रक्रिया में परीक्षण जरूरी है, बिना जांच के किसी भी परियोजना की अनुमति नहीं दी जा सकती। |
कोठारी और उमा महेश्वरी की एप्को से छुट्टी
चलिए विस्तार से समझते हैं कैसे हुआ भ्रष्टाचार?
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सारा खेल 45 दिनों के नियम से किया…
दरअसल इस मामले में भारत सरकार के EIA Notification 2006 के तहत, हर परियोजना की मंजूरी SEIAA की सामूहिक बैठक में होनी चाहिए थी। लेकिन जानबूझकर बैठकें ही नहीं बुलाई गईं, जिससे फाइलें लंबित रहीं। फाइलें लंबित रखने के पीछे “45 दिनों का नियम” था। दरअसल नियम के मुताबिक, अगर 45 दिनों में किसी फाइल पर फैसला नहीं होता, तो EC (पर्यावरण मंजूरी) अपने आप मान ली जाती है। इसी का फायदा उठाकर, सचिव स्तर से अकेले ही सैकड़ों मंजूरियां जारी कर दी गईं।
फर्जी अनुमोदन कराया
बड़ा सवाल : आखिर गड़बड़ियां कैसे हुईं?
नियमों की अनदेखी और प्रक्रिया का दुरुपयोग
- EIA Notification 2006 के मुताबिक, हर परियोजना की मंजूरी SEIAA की सामूहिक बैठक में होनी चाहिए थी।
- अधिकारियों ने जानबूझकर बैठकें नहीं बुलाईं, जिससे फाइलें लंबित रहीं।
- 45 दिन की समयसीमा पूरी होते ही, सदस्य सचिव ने अकेले ही सैकड़ों परियोजनाओं को मंजूरी दे दी, जो पूरी तरह अवैध है।
- तकनीकी मूल्यांकन, जनसुनवाई और सामूहिक निर्णय जैसी अनिवार्य प्रक्रियाओं को दरकिनार किया गया।
- कई मामलों में खनिज के नाम और मात्रा तक बदल दी गई।
- फाइलों में जरूरी जानकारी छुपाई गई या बदल दी गई, जिससे अवैध खनन को कानूनी जामा पहनाया गया।
राज्य सरकार के अधिकारियों ने केंद्र सरकार के आदेशों का पालन करने के बजाय SEIAA को कमजोर करने, उस पर दबाव बनाने और ब्लैकमेल करने का प्रयास किया।
SEIAA से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें...
किन अफसरों ने लापरवाही या मिलीभगत बरती?
- बिना बैठक और सामूहिक निर्णय के, अकेले ही सैकड़ों पर्यावरणीय मंजूरियां जारी कीं।
- अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर फैसले लिए।
- सदस्य सचिव के अवैध फैसलों को स्वीकृति दी।
- केंद्र सरकार के स्पष्ट आदेशों की अनदेखी की।
- बार-बार बैठक बुलाने के अनुरोध को नजरअंदाज किया।
- उच्च अधिकारियों के दबाव में काम किया या चुप्पी साधे रखी।
SEIAA को स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करने दिया, बल्कि उस पर दबाव बनाया।
किसको फायदा दिलाने की कोशिश हुई?
- अवैध खनन परियोजनाओं को बिना वैध प्रक्रिया के मंजूरी दिलाई गई।
- जिन कंपनियों को नियमों के तहत मंजूरी नहीं मिल सकती थी, उन्हें भी फायदा पहुंचाया गया।
- करोड़ों रुपये की रिश्वत और दलाली के आरोप।
मंजूरी देने के बदले कथित तौर पर आर्थिक लाभ लिए गए।
पर्यावरण को होगा भारी नुकसान
आपको बता दें कि Thesootr के पास इस भ्रष्टाचार से जुड़े मामले के सभी दस्तावेज मौजूद हैं। जिन प्रोजेक्ट को आंख बंद करके अनुमति दी गई हैं, उनमें से कई ऐसे हैं जो पर्यावरण के लिए गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल मुख्य सचिव के सामने भी है कि इस मामले की जानकारी के बाद क्या वे कोई ठोस कार्यवाही करेंगे? क्या ये अनुमतियां रद्द की जाएंगी या फिर इस मामले में चांज बैठाई जाएगी?
खुद चेयरमैन का बनना पड़ा व्हिसल ब्लोअर
किसको फायदा दिलाने की कोशिश हुई?
खनन माफिया और दलाल
इन योजनाओं को श्रीमन शुक्ला द्वारा दे दी गई डीम्ड परमिशन (PDF देखें...)
जिम्मेदार कौन हैं?
2. प्रमुख सचिव, पर्यावरण विभाग, म.प्र. शासन: अवैध फैसलों को स्वीकृति दी, केंद्र सरकार के आदेशों की अनदेखी की।
3. SEIAA के अन्य अधिकारी: बैठक बुलाने के अनुरोध को नजरअंदाज किया, उच्च अधिकारियों के दबाव में काम किया।
4. खनन माफिया और दलाल: अधिकारियों से सांठगांठ कर अवैध मंजूरी दिलाई।
उड़ा दी नियमों की धज्जियां
स्टेट एनवायरोमेंट इम्पेक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) क्या है?
SEIAA की संरचना
- अध्यक्ष: राज्य सरकार द्वारा नामित वरिष्ठ अधिकारी।
- सदस्य: पर्यावरण, वन, जलवायु, खनन, भूगोल, रसायन, सामाजिक विज्ञान आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञ।
- सदस्य सचिव: आमतौर पर राज्य सरकार का कोई वरिष्ठ अधिकारी, जो प्रशासनिक कार्य देखता है।
सिया के मुख्य कार्य और जिम्मेदारियां
SEIAA का मुख्य कार्य राज्य के भीतर आने वाली 'Category B' परियोजनाओं (जैसे छोटे-बड़े उद्योग, खनन, निर्माण, सड़क, पावर प्लांट आदि) को पर्यावरणीय मंजूरी देना है।
SEAC से सलाह लेना:
SEIAA के निर्णय लेने से पहले, राज्य पर्यावरण मूल्यांकन समिति (SEAC) तकनीकी मूल्यांकन करती है और अपनी सिफारिश देती है। SEIAA अंतिम मंजूरी देती है या अस्वीकार करती है।
जन सुनवाई और पारदर्शिता:
परियोजना क्षेत्र में जन सुनवाई आयोजित कराई जाती है, जिसमें स्थानीय लोगों की आपत्तियों और सुझावों को शामिल किया जाता है।
पर्यावरणीय शर्तों की निगरानी:
मंजूरी मिलने के बाद, परियोजना प्राधिकरण को हर छह महीने में अनुपालन रिपोर्ट देनी होती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पर्यावरणीय शर्तों का पालन हो रहा है।
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