MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ग्राम रोजगार सहायकों को ट्रांसफर पर मिलेगा भत्ता, सरकार को 6 महीने की मोहलत
Neel Tiwari | Sootr Assets | Oct 30, 2026, 14:57 IST
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रदेश के करीब 23 हजार ग्राम रोजगार सहायकों से जुड़े मामलों में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ट्रांसफर नीति को बरकरार रखा है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रदेश के करीब 23 हजार ग्राम रोजगार सहायकों से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ट्रांसफर नीति को बरकरार रखा है। साथ ही, दूरस्थ पंचायतों में पदस्थापना पर भत्ता देने की नीति बनाने का आदेश दिया है। इसमें ट्रांसफर भत्ता और मकान किराया भत्ता शामिल है। जस्टिस विशाल धगत ने 14 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया था।
उन्होंने रिट याचिका क्रमांक 28473/2025 पर सुनवाई की। कोर्ट ने अमित कुमार मिश्रा और अन्य की याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की है। ग्राम रोजगार सहायकों ने 24 जून 2025 को जारी नई मार्गदर्शिका को चुनौती दी थी। कर्मचारियों का कहना था कि नए नियम उनकी सेवा शर्तों को बदल रहे हैं। इससे नौकरी और भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है। इस मामले में अधिवक्ता गोपेश तिवारी ने पैरवी की।
क्यों हाईकोर्ट पहुंचे
ग्राम रोजगार सहायकों की नियुक्ति मनरेगा का काम संभालने के लिए होती है। उन्हें संबंधित ग्राम पंचायत में संविदा पर रखा जाता है। उनकी नियुक्ति स्थानीय स्तर पर होती है। पुराने अनुबंध के मुताबिक, उनका ट्रांसफर नहीं हो सकता था। उनका अनुबंध आमतौर पर एक साल का होता है। समय-समय पर इसे आगे बढ़ाया जाता है। कर्मचारियों को आकस्मिक और मेडिकल लीव की सुविधा मिलती है। महिला कर्मचारियों को मैटरनिटी लीव भी दिया जाता है।
साल 2013 के आदेश के बाद उन्हें नई जिम्मेदारी मिली थी। उन्हें ग्राम पंचायतों में सहायक सचिव की भूमिका भी दी गई थी। हालांकि, इससे वे नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं बने। कर्मचारियों का कहना था कि वे लंबे समय से काम कर रहे हैं। लेकिन नई गाइडलाइन में कई नई शर्तें जोड़ दी गईं। उनका मानना था कि इनसे उनकी नौकरी और भविष्य प्रभावित हो सकता है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता गोपेश तिवारी ने कई नियमों पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि अपील के लिए 90 दिन की समय सीमा तय की गई है। दूसरी अपील के लिए भोपाल में आयुक्त के सामने जाना पड़ता है। इससे दूर-दराज के कर्मचारियों को परेशानी हो सकती है। चयन में मेरिट के साथ ग्राम सभा की मंजूरी भी जरूरी रखी गई थी। कर्मचारियों ने इस नियम पर भी सवाल उठाए थे।
इसके अलावा हर साल 60 अंक लाने की शर्त को चुनौती दी गई थी। आपराधिक मामला दर्ज होने पर सेवा नवीनीकरण रोकने का नियम भी विवाद में था। हड़ताल में शामिल होने पर कार्रवाई के प्रावधान पर भी आपत्ति थी। पंचायत के नगरीय निकाय में शामिल होने पर सेवा खत्म करने का नियम भी चुनौती दी गई थी।
सबसे बड़ी आपत्ति तीन साल बाद ट्रांसफर के नियम को लेकर थी। इसके तहत कर्मचारी को जिले की दूसरी ग्राम पंचायत भेजा जा सकता था। कर्मचारियों का कहना था कि उनकी नियुक्ति स्थानीय निवासी होने की शर्त पर हुई थी। इसलिए उनका पद ट्रांसफर के दायरे में नहीं आना चाहिए।
राज्य सरकार ने कर्मचारियों की सभी आपत्तियों का विरोध किया है। सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि ग्राम रोजगार सहायकों की नियुक्ति संविदा पर होती है। वे नियुक्ति पत्र और सरकारी निर्देशों के मुताबिक काम करते हैं। उनकी नियुक्ति मनरेगा जैसी योजनाओं को लागू करने के लिए हुई है। इसलिए उन्हें नियमित कर्मचारियों जैसी सुविधाएं नहीं मिल सकतीं। उन्हें समान वेतन, भत्ते और दूसरी सुविधाओं का अधिकार नहीं है।
सरकार ने 60 अंकों वाले सालाना मूल्यांकन को भी जरूरी बताया। इससे कर्मचारियों के काम करने की क्षमता जांची जाती है। सरकार के मुताबिक, आपराधिक मामलों में कार्रवाई जरूरी है। हड़ताल पर रोक भी प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखने के लिए है। सरकार ने कहा कि तीन साल बाद ट्रांसफर का नियम भी जरूरी है। यह व्यवस्था जिले के भीतर प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए बनाई गई है।
जस्टिस विशाल धगत ने फैसले में ग्राम रोजगार सहायकों की नियुक्ति पर बात की। उन्होंने कहा कि इन कर्मचारियों की नियुक्ति संविदा के आधार पर होती है। आमतौर पर संविदा की शर्तों से जुड़े मामले में रिट याचिका नहीं लगाई जा सकती है। लेकिन सरकार नियमों का उल्लंघन करे, तो कर्मचारी कोर्ट जा सकते हैं। अगर सरकार अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाती, तब भी कर्मचारी हाईकोर्ट पहुंच सकते हैं। मनमाने तरीके से अधिकारों का इस्तेमाल होने पर भी याचिका लगा सकते हैं। इसी आधार पर कोर्ट ने गाइडलाइन के अलग-अलग नियमों की जांच की।
कर्मचारियों ने अपील के लिए 90 दिन की समय सीमा पर सवाल उठाए थे। उन्होंने भोपाल में आयुक्त के सामने दूसरी अपील की व्यवस्था पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना था कि दूर-दराज के गांवों से भोपाल पहुंचना मुश्किल है। कोर्ट ने कर्मचारियों की इस आपत्ति को स्वीकार नहीं किया।
हालांकि, अपील के लिए आयुक्त के सामने जाना जरूरी नहीं होगा। कर्मचारी अपने हस्ताक्षर वाली अपील डाक से भेज सकते हैं। वे ईमेल या दूसरे माध्यमों से भी अपील कर सकते हैं। कोर्ट ने इस व्यवस्था को मनमाना या असंवैधानिक नहीं माना है।
ग्राम रोजगार सहायकों के चयन में ग्राम सभा की मंजूरी पर सवाल उठे थे। कर्मचारियों का कहना था कि चयन मेरिट के आधार पर होना है। फिर ग्राम सभा की मंजूरी क्यों जरूरी है? वहीं, कोर्ट ने कहा कि पहले परीक्षा और मेरिट के आधार पर चयन होगा। इसके बाद ग्राम सभा की मंजूरी से नियुक्ति पूरी की जाएगी। ग्राम रोजगार सहायक को उसी पंचायत में योजनाओं का काम संभालना होता है। इसलिए कोर्ट ने ग्राम सभा की भूमिका को सही माना है।
नई गाइडलाइन में हर साल कर्मचारियों के काम का मूल्यांकन होगा। सेवा जारी रखने और अनुबंध बढ़ाने के लिए 60 अंक जरूरी हैं। इससे कम अंक मिलने पर सेवा खत्म की जा सकती है। कर्मचारियों ने इस नियम पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि सर्वर की समस्या से काम प्रभावित होता है। कई बार अधिकारियों से समय पर राशि भी मंजूर नहीं होती। ऐसी परेशानियों के कारण लक्ष्य पूरा करना मुश्किल हो जाता है।
कोर्ट ने कर्मचारियों की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस विशाल धगत ने कहा कि काम का मूल्यांकन करना नियोक्ता का अधिकार है। सरकारी और निजी संस्थानों में भी कर्मचारियों के काम की जांच होती है। इसलिए कोर्ट ने 60 अंक की शर्त को मनमाना नहीं माना है।
मार्गदर्शिका के खंड 6.9 में इसका प्रावधान है। लोकायुक्त या EOW के ट्रैप मामले में कर्मचारी को काम से हटाया जा सकता है। आपराधिक मामला दर्ज होने पर भी उसे काम से अलग रखा जा सकता है। भ्रष्टाचार या नैतिक पतन से जुड़े मामलों में कड़ी कार्रवाई हो सकती है।
अभियोजन की मंजूरी के बाद चालान पेश होने पर सेवा खत्म हो सकती है। 48 घंटे से ज्यादा हिरासत में रहने पर भी कार्रवाई हो सकती है। ऐसे मामलों में अनुबंध का नवीनीकरण भी रोका जा सकता है। कर्मचारियों ने इस नियम को अन्यायपूर्ण बताया था।
कोर्ट ने कहा कि रोजगार सहायकों के पास सरकारी धन से जुड़े काम होते हैं। वे महत्वपूर्ण योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। इसलिए गंभीर मामलों में उन्हें काम से दूर रखना जरूरी है। हालांकि, मुकदमे में बरी होने पर कर्मचारी दोबारा आवेदन कर सकता है। वह फिर से अनुबंध में शामिल होने की मांग कर सकता है। कोर्ट ने इस नियम को असंवैधानिक नहीं माना है।
मार्गदर्शिका के खंड 6.12 में हड़ताल पर रोक लगाई गई है। कर्मचारी अपनी सेवा से जुड़े मामलों में हड़ताल नहीं कर सकते हैं। दूसरे संविदा कर्मचारियों के समर्थन में भी प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं। हड़ताल में शामिल होने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है। कर्मचारियों ने इसे अपनी आवाज उठाने के अधिकार पर रोक बताया था।
कोर्ट ने कहा कि विरोध जताने के दूसरे तरीके भी मौजूद हैं। हड़ताल ही अपनी बात रखने का एकमात्र रास्ता नहीं है। कोर्ट के मुताबिक, हड़ताल से सरकारी योजनाओं का काम प्रभावित हो सकता है। इसलिए कोर्ट ने इस नियम को भी असंवैधानिक नहीं माना है।
मार्गदर्शिका के खंड 6.14 और 6.15 में इसकी व्यवस्था है। अगर ग्राम पंचायत का नगरीय निकाय में विलय हो जाता है, तो कर्मचारी प्रभावित होंगे। किसी दूसरे कारण से पंचायत खत्म होने पर भी यही नियम लागू होगा। ऐसी स्थिति में कर्मचारियों को पहले दूसरी पंचायत में जगह दी जाएगी।
इसके लिए उसी जिले में खाली पद होना जरूरी है। अगर कोई पद खाली नहीं है, तो संविदा खत्म हो सकती है। ऐसी स्थिति में कर्मचारी को एक महीने का मानदेय दिया जाएगा। कोर्ट ने इस व्यवस्था को सही माना है। कोर्ट के मुताबिक, ग्राम रोजगार सहायक का पद पंचायत और मनरेगा से जुड़ा है। पंचायत खत्म होने पर इस पद का आधार भी खत्म हो सकता है।
ग्राम रोजगार सहायकों के ट्रांसफर को लेकर भी विवाद था। मार्गदर्शिका के खंड 8.1, 8.2 और 8.3 में इसकी व्यवस्था है। इसके मुताबिक, तीन साल की सफल सेवा के बाद ट्रांसफर हो सकता है। कर्मचारी को उसी जिले की दूसरी ग्राम पंचायत में भेजा जा सकता है। इसके लिए कलेक्टर की मंजूरी जरूरी होगी। जिला पंचायत के CEO प्रशासनिक आधार पर प्रस्ताव तैयार करेंगे। कलेक्टर की मंजूरी के बाद ट्रांसफर का आदेश जारी होगा। कर्मचारी को सात दिन के अंदर नई पंचायत में ज्वाइन करना होगा।
कर्मचारियों का कहना था कि उनकी नियुक्ति स्थानीय निवासी होने की शर्त पर हुई थी। इसलिए उनकी नौकरी में ट्रांसफर का नियम नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि तीन साल का अनुबंध पूरा होने पर पुराना अनुबंध खत्म हो जाता है। दूसरी पंचायत में नियुक्ति होने पर नया अनुबंध किया जाता है। इसलिए पुराने अनुबंध का हवाला देकर ट्रांसफर नीति को चुनौती नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने जिले के अंदर ट्रांसफर की व्यवस्था बरकरार रखी
हाईकोर्ट ने कहा कि दूर की पंचायत में ट्रांसफर होने पर कर्मचारियों को भत्ता मिलेगा। अगर उन्हें रहने की जगह बदलनी पड़ती है, तो घर और सामान शिफ्ट करने का खर्च मिलना चाहिए। इसके अलावा एकमुश्त ट्रांसफर भत्ता और मकान किराया भत्ता भी मिलेगा।
जस्टिस विशाल धगत ने मध्य प्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद के आयुक्त को निर्देश दिया है। उन्हें आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के छह महीने के भीतर नई नीति बनानी होगी। कोर्ट ने गाइडलाइन के खंड 8.1, 8.2 और 8.3 को बरकरार रखा है। वहीं, खंड 8.7 को कर्मचारियों के कानूनी अधिकारों के खिलाफ माना है। इस नियम के तहत ब्लॉक की दूसरी पंचायत का अतिरिक्त प्रभार देने पर भत्ता नहीं मिलता था।
हाई कोर्ट ने ग्राम रोजगार सहायकों की अधिकांश आपत्तियों को खारिज करते हुए नई मार्गदर्शिका के ज्यादातर प्रावधानों को वैध माना है। हालांकि, ट्रांसफर के कारण निवास बदलने की स्थिति में आर्थिक सहायता देने का निर्देश कर्मचारियों के लिए अहम राहत है। अब मध्य प्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद को छह महीने के भीतर इस संबंध में नीति बनानी होगी। कोर्ट ने इसी आधार पर अमित कुमार मिश्रा एवं अन्य की रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया।
FAQs
क्यों हाईकोर्ट पहुंचे ग्राम रोजगार सहायक ?
साल 2013 के आदेश के बाद उन्हें नई जिम्मेदारी मिली थी। उन्हें ग्राम पंचायतों में सहायक सचिव की भूमिका भी दी गई थी। हालांकि, इससे वे नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं बने। कर्मचारियों का कहना था कि वे लंबे समय से काम कर रहे हैं। लेकिन नई गाइडलाइन में कई नई शर्तें जोड़ दी गईं। उनका मानना था कि इनसे उनकी नौकरी और भविष्य प्रभावित हो सकता है।
24 जून 2025 की गाइडलाइन के किन नियमों पर जताई थी आपत्ति?
इसके अलावा हर साल 60 अंक लाने की शर्त को चुनौती दी गई थी। आपराधिक मामला दर्ज होने पर सेवा नवीनीकरण रोकने का नियम भी विवाद में था। हड़ताल में शामिल होने पर कार्रवाई के प्रावधान पर भी आपत्ति थी। पंचायत के नगरीय निकाय में शामिल होने पर सेवा खत्म करने का नियम भी चुनौती दी गई थी।
सबसे बड़ी आपत्ति तीन साल बाद ट्रांसफर के नियम को लेकर थी। इसके तहत कर्मचारी को जिले की दूसरी ग्राम पंचायत भेजा जा सकता था। कर्मचारियों का कहना था कि उनकी नियुक्ति स्थानीय निवासी होने की शर्त पर हुई थी। इसलिए उनका पद ट्रांसफर के दायरे में नहीं आना चाहिए।
सरकार ने कहा- ग्राम रोजगार सहायक नियमित कर्मचारी नहीं, संविदा पर नियुक्त हैं
सरकार ने 60 अंकों वाले सालाना मूल्यांकन को भी जरूरी बताया। इससे कर्मचारियों के काम करने की क्षमता जांची जाती है। सरकार के मुताबिक, आपराधिक मामलों में कार्रवाई जरूरी है। हड़ताल पर रोक भी प्रशासनिक अनुशासन बनाए रखने के लिए है। सरकार ने कहा कि तीन साल बाद ट्रांसफर का नियम भी जरूरी है। यह व्यवस्था जिले के भीतर प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए बनाई गई है।
संविदा कर्मचारी भी मनमानी के खिलाफ हाईकोर्ट जा सकते हैं
डाक और ईमेल से भी कर सकते हैं अपील
हालांकि, अपील के लिए आयुक्त के सामने जाना जरूरी नहीं होगा। कर्मचारी अपने हस्ताक्षर वाली अपील डाक से भेज सकते हैं। वे ईमेल या दूसरे माध्यमों से भी अपील कर सकते हैं। कोर्ट ने इस व्यवस्था को मनमाना या असंवैधानिक नहीं माना है।
ग्राम सभा की मंजूरी जरूरी, चयन में नहीं मानी गई मनमानी
हर साल 60 अंक लाने होंगे, कम अंक पर सेवा समाप्ति का नियम बरकरार
कोर्ट ने कर्मचारियों की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस विशाल धगत ने कहा कि काम का मूल्यांकन करना नियोक्ता का अधिकार है। सरकारी और निजी संस्थानों में भी कर्मचारियों के काम की जांच होती है। इसलिए कोर्ट ने 60 अंक की शर्त को मनमाना नहीं माना है।
आपराधिक मामला दर्ज होने पर सेवा नवीनीकरण रोकने का नियम भी सही
अभियोजन की मंजूरी के बाद चालान पेश होने पर सेवा खत्म हो सकती है। 48 घंटे से ज्यादा हिरासत में रहने पर भी कार्रवाई हो सकती है। ऐसे मामलों में अनुबंध का नवीनीकरण भी रोका जा सकता है। कर्मचारियों ने इस नियम को अन्यायपूर्ण बताया था।
कोर्ट ने कहा कि रोजगार सहायकों के पास सरकारी धन से जुड़े काम होते हैं। वे महत्वपूर्ण योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। इसलिए गंभीर मामलों में उन्हें काम से दूर रखना जरूरी है। हालांकि, मुकदमे में बरी होने पर कर्मचारी दोबारा आवेदन कर सकता है। वह फिर से अनुबंध में शामिल होने की मांग कर सकता है। कोर्ट ने इस नियम को असंवैधानिक नहीं माना है।
हड़ताल पर रोक को भी हाईकोर्ट ने सही माना
कोर्ट ने कहा कि विरोध जताने के दूसरे तरीके भी मौजूद हैं। हड़ताल ही अपनी बात रखने का एकमात्र रास्ता नहीं है। कोर्ट के मुताबिक, हड़ताल से सरकारी योजनाओं का काम प्रभावित हो सकता है। इसलिए कोर्ट ने इस नियम को भी असंवैधानिक नहीं माना है।
ग्राम पंचायत खत्म हुई तो पहले दूसरी पंचायत में जगह मिलेगी
इसके लिए उसी जिले में खाली पद होना जरूरी है। अगर कोई पद खाली नहीं है, तो संविदा खत्म हो सकती है। ऐसी स्थिति में कर्मचारी को एक महीने का मानदेय दिया जाएगा। कोर्ट ने इस व्यवस्था को सही माना है। कोर्ट के मुताबिक, ग्राम रोजगार सहायक का पद पंचायत और मनरेगा से जुड़ा है। पंचायत खत्म होने पर इस पद का आधार भी खत्म हो सकता है।
तीन साल बाद जिले में ट्रांसफर का अधिकार सरकार के पास रहेगा
कर्मचारियों का कहना था कि उनकी नियुक्ति स्थानीय निवासी होने की शर्त पर हुई थी। इसलिए उनकी नौकरी में ट्रांसफर का नियम नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि तीन साल का अनुबंध पूरा होने पर पुराना अनुबंध खत्म हो जाता है। दूसरी पंचायत में नियुक्ति होने पर नया अनुबंध किया जाता है। इसलिए पुराने अनुबंध का हवाला देकर ट्रांसफर नीति को चुनौती नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने जिले के अंदर ट्रांसफर की व्यवस्था बरकरार रखी
दूर की पंचायत में ट्रांसफर किया तो देना होगा भत्ता, मकान किराया भी मिलेगा
छह महीने में नई नीति बनानी होगी, 8.7 के प्रावधान पर भी सवाल
याचिका आंशिक रूप से स्वीकार
FAQs
- ग्राम रोजगार सहायकों ने हाईकोर्ट में याचिका क्यों दायर की?
ग्राम रोजगार सहायकों ने नई मार्गदर्शिका को चुनौती देने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की, क्योंकि उनका कहना था कि नए नियम उनकी सेवा शर्तों को बदल रहे हैं, जिससे उनकी नौकरी और भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है। - नई मार्गदर्शिका में कौन-कौन से प्रमुख नियम शामिल हैं जो विरोध का कारण बने?
नई मार्गदर्शिका में प्रमुख नियमों में अपील के लिए 90 दिन की समय सीमा, ग्रामसभा की मंजूरी की आवश्यकता, हर साल 60 अंक लाने की शर्त, आपराधिक मामलों में सेवा नवीनीकरण रोकने का प्रावधान, और हड़ताल पर रोक जैसे नियम शामिल हैं। - कोर्ट ने ग्राम रोजगार सहायकों के अधिकारों के मुद्दे पर क्या निर्णय लिया?
कोर्ट ने अधिकांश कर्मचारियों की आपत्तियों को खारिज कर दिया, लेकिन ट्रांसफर के कारण निवास बदलने की स्थिति में आर्थिक सहायता देने का निर्देश दिया। साथ ही, यह स्पष्ट किया कि ग्राम रोजगार सहायकों की नियुक्ति संविदा पर होती है और उन्हें नियमित कर्मचारियों जैसी सुविधाएं नहीं मिल सकतीं।
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