अवैध पटाखा फैक्ट्री: हर धमाके के बाद कार्रवाई, लेकिन मौत का कारोबार नहीं हो रहा बंद?
Ramanand Tiwari | May 27, 2026, 07:30 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. मध्यप्रदेश में अवैध पटाखा फैक्ट्रियां लगातार जान ले रही हैं। हर ब्लास्ट बाद कार्रवाई होती है, लेकिन रिहायशी इलाकों में बारूद कारोबार अब भी जारी है।
ऐसे समझें पूरा मामला...
- देवास ब्लास्ट में अब तक 8 लोगों की मौत हुई।
- हरदा विस्फोट में 11 लोगों की जान गई थी।
- पेटलावद हादसे में करीब 89 लोगों की मौत हुई।
- रिहायशी इलाकों में अवैध बारूद भंडारण लगातार जारी है।
- मजदूर बिना सुरक्षा उपकरणों के खतरनाक फैक्ट्रियों में काम करते हैं।
हर बड़े धमाके के बाद प्रशासन जांच, एफआईआर और कार्रवाई की बातें करता है, लेकिन कुछ समय बाद फिर किसी शहर से चीखों और बारूद की खबर सामने आ जाती है। देवास से हरदा, झाबुआ से इंदौर तक सवाल एक ही है, आखिर मौत का यह कारोबार किसके संरक्षण में पल रहा है?
ब्लास्ट के बाद गिरफ्तारी, लेकिन क्या यही पूरी कार्रवाई है?
क्या हर हादसे के बाद सिर्फ मालिक की गिरफ्तारी ही सिस्टम की जिम्मेदारी पूरी कर देती है? क्योंकि जिन मजदूरों ने फैक्ट्री में काम करते हुए अपनी जान गंवाई, उनके परिवारों के लिए यह कार्रवाई सिर्फ कागजी राहत बनकर रह जाती है।
रिहायशी इलाकों में कैसे बन जाते हैं ‘बारूद के अड्डे’?
देवास पटाखा फैक्ट्री : जब सड़क पर बिखरे शरीर के टुकड़े
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, सड़क पर इंसानी शरीर के टुकड़े और जले हुए अवशेष बिखरे पड़े थे। कई मजदूर बुरी तरह झुलसी हालत में बाहर भागते नजर आए। अब तक 8 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई घायल जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।
हरदा ब्लास्ट : जहां धमाके ने पूरा शहर दहला दिया
झाबुआ: प्रदेश का सबसे दर्दनाक विस्फोट
इंदौर, मुरैना, दमोह... हादसे बदलते रहे, तस्वीर नहीं
दमोह, ग्वालियर और दतिया में भी इसी तरह के हादसों ने कई परिवार खत्म कर दिए। लगातार हो रहे इन विस्फोटों ने यह साफ कर दिया है कि समस्या सिर्फ एक फैक्ट्री की नहीं, बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की है।
हर हादसे के बाद वही सवाल...
- अवैध फैक्ट्रियों को लाइसेंस कौन देता है?
- रिहायशी इलाकों में बारूद का स्टॉक कैसे पहुंचता है?
- शिकायतों के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं होती?
- हादसे से पहले प्रशासन सक्रिय क्यों नहीं दिखता?
- जांच रिपोर्टों के बाद जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती?
मजदूरों की जान सबसे सस्ती क्यों?
सुरक्षा उपकरण तक उपलब्ध नहीं होते, लेकिन मजबूरी उन्हें मौत के साये में काम करने को मजबूर करती है। जब हादसा होता है, तो कुछ लाख मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है और मामला धीरे-धीरे फाइलों में दब जाता है।
क्या सिर्फ हादसों का इंतजार करता रहेगा सिस्टम?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सिस्टम अगली त्रासदी का इंतजार करता रहेगा, या फिर अवैध पटाखा कारोबार पर स्थायी और कठोर कार्रवाई भी कभी दिखाई देगी?
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