कोर्ट के सख्त फैसलों से कठघरे में दो सरकारी विभाग, लोकायुक्त और PWD पर उठे सवाल
Amresh Kushwaha | Jun 16, 2026, 13:10 IST
सुप्रीम कोर्ट
मध्यप्रदेश में एक ही दिन कोर्ट के दो सख्त फैसलों ने सरकार को घेर लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त संगठन को RTI के दायरे में लाने का आदेश दिया है। वहीं हाई कोर्ट ने PWD में दागी अफसर को बड़ा प्रभार देने पर सरकार से सवाल पूछे हैं।
कोर्ट के दो फैसलों ने मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। न्यायपालिका के कड़े रुख के कारण प्रदेश के दो बड़े महकमे इस समय तीखे सवालों के घेरे में हैं। एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट ने सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है, वहीं दूसरी तरफ हाई कोर्ट ने लोक निर्माण विभाग (PWD) में दागियों को मलाईदार पदों पर बैठाने की जिद पर सख्त नाराजगी जताई है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 15 जून को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि मध्य प्रदेश का लोकायुक्त संगठन कोई खुफिया संगठन या सुरक्षा एजेंसी नहीं है। लिहाजा, इसे सूचना के अधिकार यानी आरटीआई (RTI) कानून के दायरे से बाहर रखने का कोई औचित्य नहीं बनता।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चेंदुरकर की पीठ ने राज्य सरकार के उस पुराने फैसले को पलट दिया है, जिसके जरिए भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली इस संस्था को जनता के प्रति जवाबदेही से मुक्त करने की कोशिश की गई थी।
इस कानूनी लड़ाई की जड़ें लगभग 15 साल पुरानी हैं। राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने 25 अगस्त 2011 को एक अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना के जरिए आरटीआई कानून 2005 की धारा 24 का हवाला देते हुए लोकायुक्त संगठन की स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट (SPE) को सूचना देने के दायरे से पूरी तरह बाहर कर दिया गया था।
सर्वोच्च कोर्ट ने डेढ़ दशक पुरानी इस अधिसूचना को अब सिरे से रद्द कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह नियम आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) पर भी इसी तरह लागू रहेगा। यानी अब इन दोनों ही जांच एजेंसियों को जनता द्वारा मांगी गई जानकारियां कानून के तहत देनी होंगी।
इस पूरे मामले के पीछे मध्य प्रदेश के एक पुलिस इंस्पेक्टर कामता प्रसाद मिश्रा की लंबी कानूनी लड़ाई है। इंस्पेक्टर मिश्रा ने लोकायुक्त संगठन से आरटीआई के तहत कुछ जानकारियां मांगी थीं। इसे संगठन ने देने से साफ इनकार कर दिया था। इसके खिलाफ मिश्रा ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां फैसला उनके पक्ष में आया है।
हाई कोर्ट से झटका खाने के बाद लोकायुक्त संगठन ने अपनी गोपनीयता बचाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। वहीं, देश की सबसे बड़ी कोर्ट ने भी लोकायुक्त के तर्कों को खारिज करते हुए इंस्पेक्टर मिश्रा के पक्ष में मुहर लगा दी है।
दूसरा मामला मध्यप्रदेश लोक निर्माण विभाग (PWD) से जुड़ा है, जहां ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल पर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट इस बात से नाराज थी कि वरिष्ठता को दरकिनार कर जूनियर और दागी अधिकारियों को प्रमुख अभियंता (Chief Engineer) जैसे बड़े पदों का प्रभार सौंपा जा रहा था। कोर्ट ने इसे बैक डोर एंट्री करार दिया है।
कोर्ट ने 22 जुलाई 2004 के उस पुराने सरकारी सर्कुलर पर जवाब मांगा था। इसके तहत दागी अफसरों को उच्च पदों पर बैठाया जा रहा था। इस मामले में पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव सुखवीर सिंह ने कोर्ट को जवाब नहीं दिया। ऐसे में हाई कोर्ट ने इसे कोर्ट की अवमानना और मामले को गंभीरता से न लेने का आचरण माना है।
हाई कोर्ट ने विभाग के भीतर चल रही मनमानी की परतों को खोला है। कोर्ट ने पाया कि अधिकारी पी.सी. वर्मा को कारण बताओ नोटिस देने के मात्र 3 घंटे बाद ही पद से हटा दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि इतनी हड़बड़ी में की गई यह कार्रवाई साफ बताती है कि यह सब पूर्व नियोजित (Pre-planned) था।
हाई कोर्ट ने इस मामले में बड़ा एक्शन लेते हुए चीफ इंजीनियर संजय मस्के को भोपाल जोन के प्रभार से तुरंत हटाने और पूरे मामले की जांच होने तक उन्हें अलग रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, ब्रिज जोन का प्रभार किसी बेदाग अधिकारी को सौंपने और वर्मा को किसी अन्य जोन में पदस्थ करने को कहा है।
हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले और विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए प्रमुख सचिव सुखवीर सिंह के आचरण को आड़े हाथों लिया है। साथ ही, उन्हें भविष्य के लिए सचेत किया है।
कोर्ट ने इस कड़े आदेश की एक प्रति (Copy) राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन को भी भेजी है। ताकि, प्रशासनिक स्तर पर इस तरह की मनमानियों पर लगाम कसी जा सके। कोर्ट ने चीफ इंजीनियर मस्के को प्रभार देने वाले आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है।
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लोकायुक्त पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चेंदुरकर की पीठ ने राज्य सरकार के उस पुराने फैसले को पलट दिया है, जिसके जरिए भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली इस संस्था को जनता के प्रति जवाबदेही से मुक्त करने की कोशिश की गई थी।
डेढ़ दशक पुरानी अधिसूचना रद्द
सर्वोच्च कोर्ट ने डेढ़ दशक पुरानी इस अधिसूचना को अब सिरे से रद्द कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह नियम आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) पर भी इसी तरह लागू रहेगा। यानी अब इन दोनों ही जांच एजेंसियों को जनता द्वारा मांगी गई जानकारियां कानून के तहत देनी होंगी।
एक पुलिस इंस्पेक्टर की जिद ने बदली RTI की तस्वीर
हाई कोर्ट से झटका खाने के बाद लोकायुक्त संगठन ने अपनी गोपनीयता बचाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। वहीं, देश की सबसे बड़ी कोर्ट ने भी लोकायुक्त के तर्कों को खारिज करते हुए इंस्पेक्टर मिश्रा के पक्ष में मुहर लगा दी है।
हाई कोर्ट का पीवीडब्ल्यूडी से सवाल
कोर्ट ने 22 जुलाई 2004 के उस पुराने सरकारी सर्कुलर पर जवाब मांगा था। इसके तहत दागी अफसरों को उच्च पदों पर बैठाया जा रहा था। इस मामले में पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव सुखवीर सिंह ने कोर्ट को जवाब नहीं दिया। ऐसे में हाई कोर्ट ने इसे कोर्ट की अवमानना और मामले को गंभीरता से न लेने का आचरण माना है।
तीन घंटे में हटाया, कोर्ट बोला- यह सब पहले से तय था
हाई कोर्ट ने इस मामले में बड़ा एक्शन लेते हुए चीफ इंजीनियर संजय मस्के को भोपाल जोन के प्रभार से तुरंत हटाने और पूरे मामले की जांच होने तक उन्हें अलग रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, ब्रिज जोन का प्रभार किसी बेदाग अधिकारी को सौंपने और वर्मा को किसी अन्य जोन में पदस्थ करने को कहा है।
मुख्य सचिव को भेजी आदेश की कॉपी
कोर्ट ने इस कड़े आदेश की एक प्रति (Copy) राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन को भी भेजी है। ताकि, प्रशासनिक स्तर पर इस तरह की मनमानियों पर लगाम कसी जा सके। कोर्ट ने चीफ इंजीनियर मस्के को प्रभार देने वाले आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है।
FAQ
- सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश लोकायुक्त को RTI के दायरे में क्यों लाया?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यप्रदेश का लोकायुक्त संगठन न तो खुफिया संगठन है और न सुरक्षा एजेंसी, इसलिए इसे RTI कानून 2005 के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने 25 अगस्त 2011 की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसमें लोकायुक्त को स्पेशल पुलिस एस्टेबलिशमेंट के तहत RTI से बाहर रखा गया था।
मध्यप्रदेश में देर रात 155 SAS अफसरों के तबादले, अपर कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर भी शामिल
MP में 10 RTO अधिकारियों के एक साथ तबादले, देखें पूरी लिस्ट
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