MP में दिग्विजय सिंह और फिर कमलनाथ ने किया 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण, सोमवार से अंतिम सुनवाई
Sanjay Gupta | Apr 26, 2026, 13:21 IST
mp obc reservation high court hearing digvijay kamalnath formula
मप्र में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) को सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण का केस अब अंतिम चरण में आ गया है। सोमवार 27 अप्रैल से इस पर चीफ जस्टिस जबलपुर की बेंच सुनवाई करेगी। केस लिस्ट हो गया है। तीन दिन तक अंतिम सुनवाई होगी।
मध्यप्रदेश में भले ही नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर 27 अप्रैल को विधानसभा का विशेष सत्र हो रहा है, लेकिन नजरें अब हाईकोर्ट पर होंगी। साल 2019 से ओबीसी आरक्षण केस की चल रही लड़ाई अब अंतिम मोड़ पर आ गई है।
इसी के साथ सितंबर 2022 में लगाए गए 87-13 फीसदी जैसे नासूर बन चुके फॉर्मूले का भी निराकरण होगा। इससे होल्ड 13 फीसदी का रिजल्ट और भर्ती दोनों को हरी झंडी मिलेगी। केस 26वें नंबर पर लिस्ट है और कुल 86 याचिकाएं लिंक हैं। सुनवाई का समय दोपहर साढ़े 12 बजे तय किया गया है।
इस मामले में एक साथ 86 केस लिंक हुए हैं। इसमें याचिकाकर्ताओं से लेकर शासन पक्ष और ओबीसी वेलफेयर कमेटी तीन अहम पक्षकार हैं। इन्होंने अपने लिखित जवाब पहले ही हाईकोर्ट में लगा दिए हैं, जिस पर अब सुनवाई होगी। चीफ जस्टिस की बेंच ने 27 अप्रैल को दोपहर 12.30 बजे का समय नियत किया है।
माना जा रहा है कि इसी दिन तय होगा कि याचिकाकर्ताओं में पहले कौन पक्ष रखेगा और फिर बेंच किस क्रम से मौका देगी। फिलहाल सुनवाई के लिए तीन दिन लगातार समय देने की बात कही गई है। इस केस में 19 मई के पहले फैसला संभव है।
पहले
इस आरक्षण केस को लेकर द सूत्र ने हाईकोर्ट में जमा हुए 10 हजार से ज्यादा पन्नों को पढ़ा। इसकी कॉपी द सूत्र के पास मौजूद है। ओबीसी आरक्षण को लेकर बीजेपी भले ही दावे करे, लेकिन कागजों के अनुसार सबसे पहले 30 जून 2003 को तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी किया था। तब भी इंदिरा साहनी केस का हवाला देकर याचिका लगी और इस पर स्टे हो गया। यह आरक्षण फिर नहीं मिला।
बीजेपी सरकार शांत रही,
इसी साल के अंत में दिग्विजय सिंह सरकार बाहर हो गई और बीजेपी की सरकार आ गई। बीजेपी सरकार लगातार दिसंबर 2018 तक 15 साल रही, लेकिन ओबीसी आरक्षण मामला ठंडा रहा।
सरकार द्वारा किए गए आरक्षण के हिसाब से मप्र में एसटी को 20 फीसदी, एससी को 16 फीसदी, ओबीसी को 27 फीसदी और ईडब्ल्यूएस कैटेगरी को 10 फीसदी, इस तरह कुल 73 फीसदी आरक्षण है। बाकी 27 फीसदी अनारक्षित के लिए हैं।
इंदिरा साहनी 1992 के सबसे चर्चित केस में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने अधिकतम आरक्षण सीमा 50 फीसदी तय की है। हालांकि अपवाद है कि विशेष/ असाधारण परिस्थितियों में इस सीमा को पार किया जा सकता है। जैसे कि ईडब्ल्यूएस वर्ग को 10 फीसदी मिला है।
मध्यप्रदेश सरकार ने ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने के पक्ष में हजारों पन्ने हाईकोर्ट के पटल पर रखे हैं। इसमें मुख्य रूप से मप्र पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट है।
इसमें 1983 के रामजी महाजन की रिपोर्ट से लेकर आयोग की विविध रिपोर्ट, खासकर 1996-97, 2000-01, 2007-08 की रिपोर्ट और साल 2022 में गौरीशंकर बिसेन की अध्यक्षता वाले आयोग की रिपोर्ट है। साथ ही साल 1953 में ओबीसी को लेकर बने काका कालेलकर और 1977 के बीपी मंडल आयोग की रिपोर्ट भी इसमें शामिल है।
वहीं अनारक्षित वर्ग की बात करें तो उन्होंने अपने पक्ष में दो अहम तर्क दिए हैं। पहला तर्क तो संवैधानिक बेंच सुप्रीम कोर्ट का इंदिरा साहनी केस का है, जिसमें आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता है।
वहीं उन्होंने पीएससी और ईएसबी द्वारा बीते सालों में की गई भर्तियों के आंकड़ों से बताया है कि अनारक्षित कैटेगरी के जो 27 फीसदी पद हैं, इसमें भी ओबीसी, एसटी और एससी के उम्मीदवार चयनित हो रहे हैं। ऐसे में उनके पास बहुत कम पद बचते हैं।
वहीं ओबीसी वेलफेयर कमेटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर हैं। इनके द्वारा ओबीसी को प्रदेश की जनसंख्या अनुपात में ही आरक्षण देने, विधानसभा से एक्ट पास होने के बाद उसे लागू करने की मांग रखी गई है।
तर्क है कि एक्ट को नहीं रोका जा सकता है। साथ ही होल्ड पदों को अनहोल्ड कर ओबीसी को देने की मांग रखी है। तर्क दिए हैं कि चयनित उम्मीदवार 6 साल से परेशान हैं।
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इसी के साथ सितंबर 2022 में लगाए गए 87-13 फीसदी जैसे नासूर बन चुके फॉर्मूले का भी निराकरण होगा। इससे होल्ड 13 फीसदी का रिजल्ट और भर्ती दोनों को हरी झंडी मिलेगी। केस 26वें नंबर पर लिस्ट है और कुल 86 याचिकाएं लिंक हैं। सुनवाई का समय दोपहर साढ़े 12 बजे तय किया गया है।
सभी ने हाईकोर्ट में दे दिए हैं लिखित जवाब
माना जा रहा है कि इसी दिन तय होगा कि याचिकाकर्ताओं में पहले कौन पक्ष रखेगा और फिर बेंच किस क्रम से मौका देगी। फिलहाल सुनवाई के लिए तीन दिन लगातार समय देने की बात कही गई है। इस केस में 19 मई के पहले फैसला संभव है।
पहले दिग्विजय सिंह ने दिया था 27 फीसदी आरक्षण
बीजेपी सरकार शांत रही, कमलनाथ ने फिर दिया
- वहीं, जब कांग्रेस की कमलनाथ सरकार आई तो उन्होंने 08 मार्च 2019 को अध्यादेश जारी कर यह आरक्षण फिर 27 फीसदी कर दिया।
- लेकिन इस पर सबसे पहले आशिता दुबे की याचिका 5901/2019 लगी और 19 मार्च 2019 को स्टे हो गया।
- वहीं कमलनाथ सरकार ने 14 अगस्त 2019 को मप्र लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) अधिनियम 1994 का संशोधन विधानसभा से पास कराया और ओबीसी आरक्षण 27 फीसदी कर दिया।
- इसे लागू करने के लिए 24 दिसंबर 2019 को नोटिफिकेशन जारी किया। लेकिन फिर हाईकोर्ट में एक के बाद एक केस लग गए और नोटिफिकेशन पर स्टे हो गया।
- उधर भर्ती और रिजल्ट होल्ड देखते हुए सरकार ने 29 सितंबर 2022 को सामान्य प्रशासन विभाग ने 87-13 फीसदी फॉर्मूला लागू कर दिया। इसके तहत 87 फीसदी को मूल रिजल्ट माना और इसमें 14 फीसदी ओबीसी को आरक्षण रखा। बाकी 13 फीसदी ओबीसी और अनारक्षित दोनों के लिए रख दिए। साथ ही इन्हें होल्ड कर दिया कि जब ओबीसी आरक्षण पर फैसला होगा तो जिसके पक्ष में आदेश आएग, उन्हें यह पद दे दिए जाएंगे।
- इसके बाद से ही यह लड़ाई हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चलती रही और विविध याचिकाएं लगती रहीं। आखिर में सुप्रीम कोर्ट ने 19 फरवरी को सभी याचिकाएं यह कहते हुए हाईकोर्ट भेजीं कि आरक्षण को लेकर प्रदेश की क्या जनसंख्या व अन्य स्थितियां हैं, यह हाईकोर्ट ही देख सकता है। हाईकोर्ट तीन माह में इस केस को सुनकर निराकृत करे।
- अब इसमें सुनवाई हो रही है।
अभी मप्र में किस कैटेगरी को कितना आरक्षण-
ओबीसी आरक्षण में सबसे बड़ी बाधा
मप्र शासन ने हाईकोर्ट में यह रखे हैं दस्तावेज
इसमें 1983 के रामजी महाजन की रिपोर्ट से लेकर आयोग की विविध रिपोर्ट, खासकर 1996-97, 2000-01, 2007-08 की रिपोर्ट और साल 2022 में गौरीशंकर बिसेन की अध्यक्षता वाले आयोग की रिपोर्ट है। साथ ही साल 1953 में ओबीसी को लेकर बने काका कालेलकर और 1977 के बीपी मंडल आयोग की रिपोर्ट भी इसमें शामिल है।
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शासन की रिपोर्ट में यह बातें
- सभी रिपोर्टों में ओबीसी की सामाजिक, शैक्षणिक स्थितियों का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया कि इनकी स्थिति ठीक नहीं है और आरक्षण की जरूरत है। रामजी महाजन ने तो मप्र में आबादी के हिसाब से 35 फीसदी ओबीसी आरक्षण की बात कही।
- वहीं सभी राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने मप्र में ओबीसी की आबादी 52 फीसदी बताते हुए नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण देने की बात कही है।
- ताजा रिपोर्ट गौरीशंकर बिसेन की लगी है। इसमें कहा गया है कि मप्र में 38 जिले ऐसे हैं जहां पर ओबीसी की जनसंख्या 35 फीसदी से अधिक है। केवल दो ही जिले ऐसे हैं जहां इनकी जनसंख्या 14 फीसदी से कम है। मप्र ओबीसी बाहुल्य वाला प्रदेश है।
- इसके साथ ही शासन ने विविध सर्वे रिपोर्ट भी लगाई है। इसमें ओबीसी वर्ग ने कहा है कि आज भी उनके साथ जातिगत भेदभाव होता है और उनकी जाति को कमतर आंका जाता है। उच्च जाति के लोग उनके साथ भेदभाव करते हैं।
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अनारक्षित वर्ग के अपने पक्ष में यह दो अहम तर्क
वहीं उन्होंने पीएससी और ईएसबी द्वारा बीते सालों में की गई भर्तियों के आंकड़ों से बताया है कि अनारक्षित कैटेगरी के जो 27 फीसदी पद हैं, इसमें भी ओबीसी, एसटी और एससी के उम्मीदवार चयनित हो रहे हैं। ऐसे में उनके पास बहुत कम पद बचते हैं।
- ईएसबी की सिपाही भर्ती 2023, वन रक्षक 2023, ग्रुप वन सब ग्रुप 1, ग्रुप 2 सबग्रुप 1 2023, आईटीआई भर्ती 2023 व पर्यवेक्षक भर्ती में कुल मिलाकर 11876 पद थे, इसमें 3287 पद अनारक्षित कैटेगरी के थे। इसमें 1613 पद मेरिट के आधार पर ओबीसी, 151 एससी और 70 एसटी उम्मीदवार को मिले। यानी 55 फीसदी (आधे से ज्यादा) पद अन्य कैटेगरी वालों के पास मेरिट से गए।
- इसी तरह पीएससी की विविध परीक्षाओं को लेकर भी आंकड़े दिए गए हैं। इसमें राज्य सेवा परीक्षा 2021, एडीपीओ 2021, डीएसपी रेडियो 2021, असिस्टेंट डायरेक्टर एग्रीकल्चर 2022 व अन्य परीक्षाओं के आंकड़े दिए गए हैं। इनमें कुल 1479 पद थे जिसमें अनारक्षित के 391 पद थे। इसमें 120 ओबीसी, 14 एससी और 4 एसटी चयनित हुए। अनारक्षित में अन्य कैटेगरी के 35 फीसदी उम्मीदवार चयनित हुए।
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ओबीसी वेलफेयर कमेटी के तर्क
तर्क है कि एक्ट को नहीं रोका जा सकता है। साथ ही होल्ड पदों को अनहोल्ड कर ओबीसी को देने की मांग रखी है। तर्क दिए हैं कि चयनित उम्मीदवार 6 साल से परेशान हैं।
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