GAD पोर्टल पर 56 अफसरों ने छिपाई अचल संपत्ति, IPR में खाली फॉर्म का खेल
Sanjay Sharma | Jun 04, 2026, 16:51 IST
Mp officers ipr property disclosure gad
MP में 56 सरकारी अफसरों ने अचल संपत्ति रिटर्न (IPR) नहीं भरा। GAD पोर्टल पर खाली फॉर्म अपलोड कर खानापूर्ति की जा रही है। विजिलेंस यूनिट मौन है, कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
समझें क्या है मामला...
- मध्यप्रदेश में हर सरकारी अफसर को हर साल 31 जनवरी तक अचल संपत्ति का ब्योरा देना होता है।
- दिसंबर 2025 तक 23 प्रशासनिक, 29 मंत्रालयी और 4 आबकारी अफसरों ने IPR जमा नहीं किया है।
- जिन्होंने फॉर्म भरा, उन्होंने भी कीमत, क्षेत्रफल और बेचने वाले का नाम नहीं लिखा है।
- कई अफसरों ने तो सिर्फ नाम और साइन कर खाली फॉर्म अपलोड कर दिया है।
- GAD की विजिलेंस यूनिट ने न कोई नोटिस दिया, न कोई कार्रवाई की।
MP के अफसरों की संपत्ति राज
राज्य सरकार का नियम साफ है। हर साल 31 जनवरी तक सभी श्रेणी के लोकसेवकों को अपनी अचल संपत्ति का ब्योरा देना होता है। यह ब्योरा GAD (General Administration Department) के पोर्टल mpsparrow.gov.in पर डालना होता है।
वहीं, द सूत्र की पड़ताल में जो सामने आया, वो चौंकाने वाला है।
कौन नहीं भर रहा IPR?
वहीं 2024 में यह संख्या 2022 के मुकाबले करीब तीन गुना यानी 34 हो गई। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार द्वारा ऐसे अधिकारियों पर सख्ती नहीं दिखाई जा रही है। यही वजह है कि अधिकारी एक-दूसरे को देखकर अचल संपत्ति की जानकारी देने से बच रहे हैं।
दिसंबर 2025 तक के आंकड़े देखें, तो राज्य प्रशासनिक सेवा के 459 अफसरों में से 23 ने IPR (Immovable Property Return) ही नहीं भरा है। इनमें डिप्टी कलेक्टर, DSP (Deputy Superintendent of Police) और तहसीलदार स्तर के अफसर शामिल हैं।
मंत्रालय में भी यही हाल है। 73 अफसरों में से 29 ने फॉर्म ही नहीं भरा। आबकारी विभाग के 26 प्रथम श्रेणी (क्लास-1) अफसरों में से 4 को भी यह याद नहीं रहा।
कुल मिलाकर 56 से ज्यादा अफसरों ने IPR अपलोड नहीं किया है।
2021 के IPR जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
2022 के IPR जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
2023 के IPR जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
2025 के IPR जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
2025 तक IPR जमा न करने वाले प्रशासनिक सेवा के अधिकारी
2025 तक IPR जमा न करने वाले आबकारी अधिकारी
2025 तक आईपीआर जमा न करने वाले मंत्रालयीन सेवा के अधिकारी
फॉर्म में क्या पूछा जाता है?
अफसर को शहर का नाम लिखना होता है। प्लॉट, मकान या खेत बताना होता है। क्षेत्रफल दर्ज करना होता है। कब खरीदा, कितने में खरीदा और अब बाजार में क्या कीमत है, यह भी बताना होता है।
संपत्ति किसके नाम पर है, वह खरीदी गई है, गिफ्ट में मिली है या पुश्तैनी है, यह भी पूछा जाता है। बेचने वाले का नाम और सालाना कमाई भी मांगी जाती है।
वहीं, इतने सवालों के बाद भी साहब लोग संक्षेप में निपटा देते हैं।
तीन तरह के खेल
पहला- जिन्होंने IPR भरा ही नहीं। दूसरा- जिन्होंने आधी-अधूरी जानकारी दी और तीसरा- जिन्होंने सिर्फ खाली फॉर्म अपलोड कर दिया।
मजे की बात यह है कि ये तीनों ही श्रेणियों के अफसर कार्रवाई से बचे हुए हैं। न निलंबन, न विभागीय जांच, न ही वेतन रोका गया।
किस कॉलम में सबसे ज्यादा धोखा?
संपत्ति की खरीद कीमत और मौजूदा बाजार भाव दोनों गायब रहते हैं। बेचने वाले का नाम भी नहीं लिखते। सालाना कमाई पर पूरी चुप्पी रहती है।
यानी प्रॉपर्टी है, लेकिन उससे कमाई होती है या नहीं, यह बताना साहब को 'निजता का हनन' लगता है।
नियम तो है, पर चलता नहीं
कागज पर डंडा बहुत सख्त है।
लेकिन जमीन पर? GAD की विजिलेंस यूनिट ने आज तक किसी का प्रमोशन नहीं रोका और न ही किसी को नोटिस दिया। इसीलिए अफसरों को भी डर नहीं है।
नतीजा यह है कि IPR भरना या न भरना, सब बराबर है।
GAD की विजिलेंस खुद निगरानी से बाहर
वहीं, यह यूनिट खुद ही निगरानी के दायरे से बाहर बैठी है। न हिदायत जारी होती है, न रिमाइंडर और न ही कोई रिपोर्ट सार्वजनिक होती है।
नतीजा- नियम किताब में है, अफसर आराम में हैं।
ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन
पोर्टल कब से शुरू हुआ, पहले क्या व्यवस्था थी
अब ये काम SPARROW (स्मार्ट परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट रिकॉर्डिंग ऑनलाइन विंडो) के जरिए सीधे ऑनलाइन किया जाता है। इससे सभी रिकॉर्ड सीधे पोर्टल पर अपलोड हो जाते हैं और सार्वजनिक देखने के लिए उपलब्ध रहते हैं।
CMO का इस पर क्या रुख है?
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क्यों जरूरी है IPR?
यदि कोई अफसर हर साल 5-10 लाख तनख्वाह पाता है, लेकिन उसकी संपत्ति करोड़ों में है, तो सवाल उठता है कि वह पैसा आया कहां से?
यही पकड़ने के लिए IPR बना था। लेकिन जब IPR ही खाली या अधूरा होगा, तो जांच का आधार ही नहीं बचता।
यह सिर्फ फॉर्म का मामला नहीं
GAD का पक्ष
MP-CG-RJ कनेक्शन
राजस्थान में भी अफसरों को हर साल संपत्ति की घोषणा देनी होती है, पर वहां भी इसे लागू करने की व्यवस्था कमजोर है। छत्तीसगढ़ में भी रायपुर और बिलासपुर के आईएएस अधिकारियों पर कई बार संपत्ति छिपाने के आरोप लगे हैं।
MP में इस मामले की पड़ताल बताती है कि तीनों राज्यों में एक जैसा ढांचा है- नियम सख्त, अमल लापरवाह।
रेफरेंस:
- mpsparrow.gov.in - GAD पोर्टल
- म.प्र. सिविल सेवा आचरण नियम, 1965 - नियम 19
- द सूत्र की मूल पड़ताल रिपोर्ट
FAQ
- IPR क्या होता है और इसे कौन भरता है?
IPR यानी Immovable Property Return (अचल संपत्ति रिटर्न)। मध्यप्रदेश में प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी के सभी सरकारी कर्मचारियों को हर साल 31 जनवरी तक GAD के पोर्टल mpsparrow.gov.in पर अपनी अचल संपत्ति का पूरा ब्यौरा देना जरूरी है। इसका मकसद यह जांचना है कि अफसर की संपत्ति उसकी आय के हिसाब से सही है या नहीं। - IPR में क्या-क्या जानकारी देनी होती है?
IPR फॉर्म में अफसर का नाम, पद, वेतन, संपत्ति का शहर, प्लॉट या मकान या खेत का क्षेत्रफल, खरीद का साल, कीमत, मौजूदा बाजार भाव, संपत्ति किसके नाम पर है, खरीदी है या गिफ्ट में मिली है या पुश्तैनी है, बेचने वाले का नाम और सालाना कमाई - ये सब बताना होता है। इतनी जानकारी के बावजूद ज्यादातर कॉलम खाली छोड़ दिए जाते हैं। - IPR न भरने पर क्या सजा का प्रावधान है?
म.प्र. सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के नियम 19 के मुताबिक IPR न भरने पर प्रमोशन रोका जा सकता है, इंक्रीमेंट बंद किया जा सकता है, विभागीय जांच हो सकती है और विजिलेंस क्लीयरेंस नहीं मिलती। लेकिन व्यवहार में GAD ने आज तक किसी भी अफसर पर यह कार्रवाई नहीं की।
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