एमपी में 15 लाख छात्रों को साइबर सुरक्षा का पाठ पढ़ाएगी पुलिस, अभियान की सफलता पर सवाल!
Ramanand Tiwari | Aug 09, 2026, 22:16 IST
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मध्यप्रदेश पुलिस स्कूलों में जाकर 15 लाख छात्रों को साइबर सुरक्षा, कानून और अधिकारों की जानकारी देगी। सृजन संवाद अभियान 18 जिलों से शुरू हुआ है।
मध्यप्रदेश पुलिस 15 लाख विद्यार्थियों तक पहुंचने की तैयारी कर रही है। स्कूलों में संवाद होगा, साइबर सुरक्षा समझाई जाएगी और छात्रों को पुलिस थाने तक ले जाकर व्यवस्था दिखाई जाएगी। सुनने में पहल बड़ी और सकारात्मक है, लेकिन असली सवाल इससे आगे का है। क्या यह अभियान छात्रों की सोच और व्यवहार में बदलाव लाएगा या कुछ समय बाद सरकारी कार्यक्रमों की लंबी सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगा?
‘सृजन संवाद’ के तहत 11वीं और 12वीं के विद्यार्थियों को कानून, अधिकार, कर्तव्य, साइबर सुरक्षा और सामाजिक जिम्मेदारियों की जानकारी देने की योजना है। पुलिस, स्कूल शिक्षा विभाग और यूएनएफपीए के सहयोग से शुरू हुए इस अभियान का लक्ष्य चरणबद्ध तरीके से करीब 15 लाख विद्यार्थियों तक पहुंचना है।
लेकिन इतने बड़े लक्ष्य के साथ सबसे बड़ा सवाल भी उतना ही बड़ा है-आखिर इस संवाद के बाद छात्रों के स्तर पर क्या बदलेगा और उसे मापा कैसे जाएगा?
विद्यार्थियों को पुलिस थाने दिखाना निश्चित रूप से सामान्य स्कूल लेक्चर से अलग प्रयोग है। छात्र शिकायत व्यवस्था, जांच प्रक्रिया, महिला एवं बाल सुरक्षा और आपातकालीन सेवाओं को करीब से समझ सकेंगे।
लेकिन थाने की एक यात्रा और एक संवाद के बाद क्या छात्र वास्तव में जरूरत पड़ने पर पुलिस पर भरोसा करेगा? यही इस पहल की असली कसौटी होगी।
अगर अभियान का फोकस सिर्फ जानकारी देने और कार्यक्रम पूरा करने तक रहा, तो इसका असर सीमित रह सकता है।
हर शनिवार संवाद कराने की योजना है। यही व्यवस्था अभियान को लगातार चलाने का अवसर भी देती है और उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती है।
अगर हर शनिवार अधिकारी आए, भाषण हुआ, कुछ सवाल पूछे गए, फोटो खिंची और कार्यक्रम खत्म हो गया, तो कुछ महीनों बाद यह भी सामान्य सरकारी गतिविधि जैसा दिखने लग सकता है।
अभियान को सफल बनाने के लिए जरूरी होगा कि हर संवाद के बाद यह देखा जाए कि छात्रों ने क्या समझा और उसके बाद उनके व्यवहार में क्या बदलाव आया।
पुलिस ने करीब 15 लाख विद्यार्थियों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। यह संख्या अपने आप में प्रभावशाली है। लेकिन केवल विद्यार्थियों की संख्या गिनने से अभियान की सफलता साबित नहीं होगी।
असल सवाल यह होना चाहिए कि कितने छात्रों ने साइबर अपराध से बचने की आदत अपनाई? कितनों को अपने अधिकार और जिम्मेदारियों की जानकारी हुई? कितने विद्यार्थी जरूरत पड़ने पर सही पुलिस सेवा तक पहुंच पाए? यानी आउटरीच का आंकड़ा नहीं, आउटपुट और असर महत्वपूर्ण होगा।
अब तक पुलिस आमतौर पर विद्यार्थियों को कानून और सुरक्षा की जानकारी देती रही है। इस अभियान में पहली बार छात्रों को पुलिस व्यवस्था को करीब से देखने का अवसर मिलेगा।
इसका मतलब यह भी है कि अब विद्यार्थी सिर्फ पुलिस की बात नहीं सुनेंगे, बल्कि पुलिस के कामकाज को अपने नजरिए से देखेंगे।
अगर संवाद खुला रहा तो पुलिस को छात्रों की वास्तविक समस्याओं और धारणाओं का पता चलेगा। लेकिन अगर सवालों की जगह सिर्फ तैयार भाषण रहे, तो संवाद का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।
11वीं और 12वीं के विद्यार्थी ऐसी पीढ़ी का हिस्सा हैं जो किसी भी अनुभव को तुरंत सोशल मीडिया पर साझा कर सकती है। इसलिए पुलिस के लिए यह अभियान केवल जागरूकता कार्यक्रम नहीं, बल्कि इमेज टेस्ट भी है।
एक सकारात्मक अनुभव पुलिस के प्रति भरोसा बढ़ा सकता है। वहीं कोई खराब या असहज अनुभव पूरे अभियान की धारणा को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि स्कूल में पुलिस की एंट्री जितनी बड़ी पहल है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है।
कार्यक्रम में प्रशिक्षित शिक्षक और पुलिस अधिकारी विद्यार्थियों के साथ संवाद करेंगे। यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षक विद्यार्थियों की भाषा, व्यवहार और स्थानीय समस्याओं को बेहतर तरीके से समझते हैं।
अगर शिक्षक केवल कार्यक्रम के संचालन तक सीमित न रहकर बाद में भी छात्रों की प्रतिक्रिया और समस्याओं को सामने लाएं, तो अभियान ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
यह उम्र स्कूल से निकलकर कॉलेज, रोजगार और सामाजिक जीवन की ओर बढ़ने की होती है। इसी दौर में साइबर दुनिया का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ता है और कानून से जुड़े कई फैसले विद्यार्थी खुद लेने लगते हैं।
इसलिए इस आयु वर्ग को कानून और नागरिक जिम्मेदारियों से जोड़ने की रणनीति व्यावहारिक नजर आती है।
‘सृजन संवाद’ का पहला चरण 5 अगस्त से 18 जिलों में शुरू किया गया है। भोपाल में इसका औपचारिक शुभारंभ 11 अगस्त को और इंदौर में 10 अगस्त को किया जाएगा।
शुरुआत में पीएम श्री, सांदीपनि और एक्सीलेंस स्कूलों को जोड़ा जा रहा है। बाद में पायलट चरण के अनुभव के आधार पर इसे अन्य स्कूलों तक विस्तार देने की योजना है।
यहां भी सवाल यही है कि पायलट चरण से क्या सीखा जाएगा और उस सीख को पूरे प्रदेश में लागू करने का सिस्टम कितना मजबूत होगा?
अगर सरकार वास्तव में इस अभियान को प्रभावी बनाना चाहती है तो विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है।
छात्रों से यह पूछा जाना चाहिए कि उन्हें पुलिस के बारे में क्या समझ आया, कौन सी जानकारी उपयोगी लगी और पुलिस व्यवस्था को लेकर उनकी कौन सी धारणा बदली।
अगर इन प्रतिक्रियाओं को रिकॉर्ड करके आगे की रणनीति में इस्तेमाल किया जाता है, तभी ‘सृजन संवाद’ वास्तविक संवाद बन पाएगा।
पुलिस का स्कूलों तक पहुंचना निश्चित रूप से सकारात्मक पहल है। कानून और सुरक्षा की जानकारी छात्रों को कम उम्र में मिलना भविष्य के लिए उपयोगी हो सकता है।
लेकिन बड़े सरकारी अभियान अक्सर अपने शुरुआती उत्साह के बाद कमजोर पड़ जाते हैं। इसलिए ‘सृजन संवाद’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती शुरुआत करना नहीं, लगातार असर बनाए रखना है। असली सवाल पुलिस की एंट्री नहीं, एग्जिट के बाद का असर स्कूल में पुलिस अधिकारी आएंगे, छात्र उनसे मिलेंगे और थाने भी जाएंगे।
क्या छह महीने बाद यह जांचा जाएगा कि छात्रों की साइबर सुरक्षा संबंधी समझ कितनी बढ़ी? क्या वे पुलिस की हेल्पलाइन और सेवाओं का सही इस्तेमाल कर पा रहे हैं? क्या पुलिस के प्रति उनका भरोसा बढ़ा? अगर इन सवालों के जवाब तलाशे गए तो अभियान की दिशा मजबूत होगी। वरना 15 लाख छात्रों का लक्ष्य सिर्फ एक बड़ा आंकड़ा बनकर रह सकता है।
‘सृजन संवाद’ को केवल पुलिस का स्कूल आउटरीच प्रोग्राम मानना आसान होगा। लेकिन इसके पीछे नई पीढ़ी के साथ पुलिस का रिश्ता बदलने की बड़ी कोशिश भी दिखाई देती है।
फिर भी सफलता 15 लाख छात्रों तक पहुंचने से तय नहीं होगी। सफलता तब मानी जाएगी जब कोई विद्यार्थी साइबर ठगी से बच सके, जरूरत पड़ने पर पुलिस से मदद मांगने में न झिझके और कानून को डर नहीं बल्कि जिम्मेदारी के रूप में समझे। यानी पुलिस स्कूल में पहुंच गई है। अब असली सवाल यह है-क्या उसका संवाद छात्रों के जीवन तक भी पहुंचेगा, या सिर्फ शनिवार की एक और गतिविधि बनकर रह जाएगा?
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‘सृजन संवाद’ के तहत 11वीं और 12वीं के विद्यार्थियों को कानून, अधिकार, कर्तव्य, साइबर सुरक्षा और सामाजिक जिम्मेदारियों की जानकारी देने की योजना है। पुलिस, स्कूल शिक्षा विभाग और यूएनएफपीए के सहयोग से शुरू हुए इस अभियान का लक्ष्य चरणबद्ध तरीके से करीब 15 लाख विद्यार्थियों तक पहुंचना है।
लेकिन इतने बड़े लक्ष्य के साथ सबसे बड़ा सवाल भी उतना ही बड़ा है-आखिर इस संवाद के बाद छात्रों के स्तर पर क्या बदलेगा और उसे मापा कैसे जाएगा?
सिर्फ थाने की सैर से नहीं बदलेगी तस्वीर
लेकिन थाने की एक यात्रा और एक संवाद के बाद क्या छात्र वास्तव में जरूरत पड़ने पर पुलिस पर भरोसा करेगा? यही इस पहल की असली कसौटी होगी।
अगर अभियान का फोकस सिर्फ जानकारी देने और कार्यक्रम पूरा करने तक रहा, तो इसका असर सीमित रह सकता है।
सबसे बड़ा खतरा-शनिवार का कार्यक्रम बन जाना
अगर हर शनिवार अधिकारी आए, भाषण हुआ, कुछ सवाल पूछे गए, फोटो खिंची और कार्यक्रम खत्म हो गया, तो कुछ महीनों बाद यह भी सामान्य सरकारी गतिविधि जैसा दिखने लग सकता है।
अभियान को सफल बनाने के लिए जरूरी होगा कि हर संवाद के बाद यह देखा जाए कि छात्रों ने क्या समझा और उसके बाद उनके व्यवहार में क्या बदलाव आया।
15 लाख का आंकड़ा बड़ा, लेकिन असर का आंकड़ा कहां?
असल सवाल यह होना चाहिए कि कितने छात्रों ने साइबर अपराध से बचने की आदत अपनाई? कितनों को अपने अधिकार और जिम्मेदारियों की जानकारी हुई? कितने विद्यार्थी जरूरत पड़ने पर सही पुलिस सेवा तक पहुंच पाए? यानी आउटरीच का आंकड़ा नहीं, आउटपुट और असर महत्वपूर्ण होगा।
पुलिस के सामने भी ‘रिवर्स टेस्ट’
इसका मतलब यह भी है कि अब विद्यार्थी सिर्फ पुलिस की बात नहीं सुनेंगे, बल्कि पुलिस के कामकाज को अपने नजरिए से देखेंगे।
अगर संवाद खुला रहा तो पुलिस को छात्रों की वास्तविक समस्याओं और धारणाओं का पता चलेगा। लेकिन अगर सवालों की जगह सिर्फ तैयार भाषण रहे, तो संवाद का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।
सोशल मीडिया वाली पीढ़ी के सामने बड़ी चुनौती
एक सकारात्मक अनुभव पुलिस के प्रति भरोसा बढ़ा सकता है। वहीं कोई खराब या असहज अनुभव पूरे अभियान की धारणा को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि स्कूल में पुलिस की एंट्री जितनी बड़ी पहल है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी है।
छात्रों को क्या मिलेगा?
इस अभियान में विद्यार्थियों को कई व्यावहारिक विषयों से जोड़ा जाएगा-
- साइबर अपराध और ऑनलाइन सुरक्षा की जानकारी।
- पुलिस से मदद लेने की प्रक्रिया।
- महिला एवं बाल सुरक्षा से जुड़े प्रावधान।
- नागरिक अधिकार और जिम्मेदारियां।
- आपातकालीन सेवाओं की जानकारी।
- शिकायत और जांच प्रक्रिया की बुनियादी समझ।
- पुलिस की विभिन्न शाखाओं और उनकी भूमिका की जानकारी।
शिक्षकों की भूमिका भी होगी अहम
अगर शिक्षक केवल कार्यक्रम के संचालन तक सीमित न रहकर बाद में भी छात्रों की प्रतिक्रिया और समस्याओं को सामने लाएं, तो अभियान ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
11वीं-12वीं पर ही फोकस क्यों?-
इसलिए इस आयु वर्ग को कानून और नागरिक जिम्मेदारियों से जोड़ने की रणनीति व्यावहारिक नजर आती है।
18 जिलों से शुरुआत, आगे बड़ा विस्तार
शुरुआत में पीएम श्री, सांदीपनि और एक्सीलेंस स्कूलों को जोड़ा जा रहा है। बाद में पायलट चरण के अनुभव के आधार पर इसे अन्य स्कूलों तक विस्तार देने की योजना है।
यहां भी सवाल यही है कि पायलट चरण से क्या सीखा जाएगा और उस सीख को पूरे प्रदेश में लागू करने का सिस्टम कितना मजबूत होगा?
सबसे जरूरी सवाल-फीडबैक का क्या होगा?-
छात्रों से यह पूछा जाना चाहिए कि उन्हें पुलिस के बारे में क्या समझ आया, कौन सी जानकारी उपयोगी लगी और पुलिस व्यवस्था को लेकर उनकी कौन सी धारणा बदली।
अगर इन प्रतिक्रियाओं को रिकॉर्ड करके आगे की रणनीति में इस्तेमाल किया जाता है, तभी ‘सृजन संवाद’ वास्तविक संवाद बन पाएगा।
पॉजिटिव पहल, लेकिन निगरानी जरूरी
लेकिन बड़े सरकारी अभियान अक्सर अपने शुरुआती उत्साह के बाद कमजोर पड़ जाते हैं। इसलिए ‘सृजन संवाद’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती शुरुआत करना नहीं, लगातार असर बनाए रखना है। असली सवाल पुलिस की एंट्री नहीं, एग्जिट के बाद का असर स्कूल में पुलिस अधिकारी आएंगे, छात्र उनसे मिलेंगे और थाने भी जाएंगे।
लेकिन कार्यक्रम खत्म होने के बाद क्या होगा?
‘सृजन संवाद’ की असली परीक्षा अब शुरू
फिर भी सफलता 15 लाख छात्रों तक पहुंचने से तय नहीं होगी। सफलता तब मानी जाएगी जब कोई विद्यार्थी साइबर ठगी से बच सके, जरूरत पड़ने पर पुलिस से मदद मांगने में न झिझके और कानून को डर नहीं बल्कि जिम्मेदारी के रूप में समझे। यानी पुलिस स्कूल में पहुंच गई है। अब असली सवाल यह है-क्या उसका संवाद छात्रों के जीवन तक भी पहुंचेगा, या सिर्फ शनिवार की एक और गतिविधि बनकर रह जाएगा?
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