मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद में 60 दिन की डेडलाइन, HC ने कमेटी को दिया जांच का आदेश

Neel Tiwari | Apr 24, 2026, 19:25 IST
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Photograph: (the sootr)

जबलपुर हाईकोर्ट ने मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद में 60 दिनों के भीतर जांच और निर्णय लेने का आदेश दिया है। देरी पर याचिका फिर से शुरू हो सकती है।

News in Short

  • मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा आदेश
  • जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस ए.के. सिंह की डिविजन बेंच में सुनवाई
  • कास्ट स्क्रूटनी कमेटी को 60 दिन में निर्णय देने का निर्देश
  • 30 अप्रैल तक आदेश की प्रति भेजने के निर्देश
  • समयसीमा में निर्णय न होने पर याचिका पुनर्जीवित करने की छूट

INTRO

जबलपुर हाईकोर्ट ने मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद में बड़ा आदेश देते हुए हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी को 60 दिनों में जांच पूरी कर फैसला देने का निर्देश दिया है। देरी होने पर याचिका फिर से शुरू की जा सकेगी।

News in Detail

हाईकोर्ट ने जांच के लिए तय की समयसीमा

जबलपुर हाईकोर्ट ने मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद में सख्त और स्पष्ट रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की डिविजनल बेंच ने कहा कि इस प्रकार के संवेदनशील मामलों में अनिश्चितकालीन देरी न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

कोर्ट ने ‘हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी’ को निर्देशित किया कि वह निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए 60 दिनों के भीतर अंतिम निर्णय पारित करे, ताकि लंबे समय से लंबित इस विवाद का निष्कर्ष सामने आ सके और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता बनी रहे।



शिकायत के निपटारे में देरी बनी याचिका का आधार

यह पूरा मामला कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार द्वारा दायर रिट पिटीशन (WP-8658-2026) से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने अपने आवेदन में यह स्पष्ट रूप से आरोप लगाया था कि उन्होंने 31 मार्च 2025 को शपथ पत्र के माध्यम से सक्षम प्राधिकारी के समक्ष मंत्री के जाति प्रमाण पत्र की वैधता को लेकर विस्तृत शिकायत प्रस्तुत की थी, लेकिन उस पर समयबद्ध कार्रवाई नहीं की गई।

उन्होंने न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि प्रशासनिक स्तर पर देरी के कारण न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और इस तरह के मामलों में शीघ्र निर्णय होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह सीधे तौर पर संवैधानिक प्रावधानों और आरक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है।

सुनवाई का मौका और निष्पक्ष जांच जरूरी - HC

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि जांच प्रक्रिया केवल औपचारिकता न रह जाए, बल्कि पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए। इसके लिए कमेटी को निर्देशित किया गया है कि वह संबंधित पक्ष, यानी प्रतिवादी मंत्री प्रतिमा बागरी को समुचित नोटिस देकर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का अवसर दे। साथ ही, सभी दस्तावेजों और साक्ष्यों की विधिवत जांच की जाए और दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर प्रदान किया जाए। कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि निर्णय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप और तथ्यों के आधार पर ही लिया जाए।

आदेश के पालन की जिम्मेदारी तय

हाईकोर्ट ने केवल निर्देश ही नहीं दिए, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदारी भी तय की है। अदालत ने याचिकाकर्ता और राज्य शासन दोनों को यह निर्देशित किया है कि वे इस आदेश की प्रमाणित प्रति 30 अप्रैल 2026 तक स्पीड पोस्ट के माध्यम से कास्ट स्क्रूटनी कमेटी तक पहुंचाएं। इस प्रक्रिया के पूरा होते ही कमेटी के पास जांच प्रारंभ करने और निर्णय देने के लिए अधिकतम 60 दिनों की समयसीमा लागू हो जाएगी, जिससे प्रशासनिक ढिलाई की कोई गुंजाइश न रहे।



देरी हुई तो फिर खुलेगा मामला

न्यायालय ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण बात जोड़ते हुए यह भी कहा है कि यदि कास्ट स्क्रूटनी कमेटी निर्धारित समयसीमा, यानी 30 जून 2026 तक कोई ठोस और अंतिम निर्णय पारित नहीं करती है, तो याचिकाकर्ता को इस रिट पिटीशन को पुनर्जीवित (Revive) करने का अधिकार रहेगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि कोर्ट ने इसे एक प्रकार से ‘कंडीशनल क्लोजर’ दिया है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि संबंधित प्राधिकरण अपनी जिम्मेदारी समय पर निभाए।

पहले याचिका वापस ले चुके हैं अहिरवार

यह विवाद पहले भी हाईकोर्ट के समक्ष आ चुका है। इससे पूर्व दायर की गई एक अन्य याचिका (WP-5948/2026) में याचिकाकर्ता अहिरवार अपने ‘लोकस स्टैंडी’ यानी सीधे प्रभावित होने के अधिकार को स्पष्ट नहीं कर पाए थे, जिसके चलते उन्होंने याचिका वापस ले ली थी। उस समय कोर्ट ने मंत्री प्रतिमा बागरी को राहत दी थी, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया था कि उचित प्रक्रिया अपनाकर भविष्य में मामला दोबारा उठाया जा सकता है। यही कारण है कि यह विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ और अब नए सिरे से कानूनी प्रक्रिया में आगे बढ़ रहा है।

क्या है पूरा विवाद: चुनाव और जाति प्रमाण पत्र पर सवाल

यह पूरा मामला सतना जिले की रैगांव (SC) आरक्षित विधानसभा सीट से जुड़ा है, जहां से प्रतिमा बागरी विधायक हैं और वर्तमान में राज्य मंत्री भी हैं। आरोप यह है कि वे जिस बागरी समुदाय से आती हैं, वह अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं है। याचिकाकर्ता प्रदीप अहिरवार ने दावा किया है कि वर्ष 2003 और 2007 के शासकीय आदेशों के अनुसार यह जाति SC वर्ग में नहीं आती, इसके बावजूद कथित रूप से फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़ा गया और जीत हासिल की गई। इस आरोप ने न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक स्तर पर भी बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।

मंत्री का पक्ष: सभी आरोप निराधार

दूसरी ओर, मंत्री प्रतिमा बागरी ने लगातार इन सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उनके पास मौजूद सभी दस्तावेज पूरी तरह वैध और कानूनी रूप से प्रमाणित हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि चुनाव के दौरान उनके नामांकन पत्र की जांच की गई थी, जिसमें कोई भी अनियमितता नहीं पाई गई। मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी भी निष्पक्ष जांच से नहीं डरतीं और यदि आवश्यक हुआ तो वे हर स्तर पर अपनी बात रखने के लिए तैयार हैं।

क्या होगा राजनीतिक और कानूनी असर

हाईकोर्ट के इस ताजा आदेश ने इस मामले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है और इसे निर्णायक मोड़ पर पहुंचा दिया है। अब पूरा ध्यान ‘हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी’ की कार्यवाही पर केंद्रित हो गया है, जो अगले 60 दिनों में इस विवाद पर अंतिम फैसला देगी। इस फैसले का असर न केवल राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के राजनीतिक भविष्य पर पड़ सकता है, बल्कि यह राज्य की राजनीति और आरक्षण व्यवस्था से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी स्थापित कर सकता है। आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक गर्माने की संभावना है।

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