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भोपाल. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों में शामिल, नल-जल योजना मध्य प्रदेश में अफसरशाही की खींचतान की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। गांव-गांव, घर-घर पानी पहुंचाने के लिए अरबों रुपए खर्च कर पाइपलाइन तो बिछा दी गई, पर अब सवाल यह है कि इस पूरी व्यवस्था को चलाएगा कौन? संभालेगा कौन और पैसा देगा कौन?
यही सवाल आज तीन सीनियर IAS अफसरों को आमने-सामने ले आया है। अब नतीजा यह है कि मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव की अध्यक्षता में लिया गया फैसला भी छह महीने से ठंडे बस्ते में पड़ा है।
पाइपलाइन बिछ गई, पर नीति नहीं
प्रदेश में एकल ग्राम (सिंगल विलेज) नल-जल योजनाओं के तहत करीब 28 हजार गांवों में घर-घर नल तो लग गए, लेकिन इनका संचालन और रखरखाव कैसे होगा। इसकी ठोस नीति सरकार आज तक लागू नहीं कर पाई है। हैरानी की बात यह है कि नीति का प्रारूप तैयार हो चुका है। मुख्यमंत्री की बैठक में मंजूरी भी मिल चुकी है। फिर भी मामला कैबिनेट तक नहीं पहुंच पाया है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अफसरों की आपसी खींचतान है।
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तीन विभाग, तीन अफसर, तीन राय
विभाग 1: पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग
विभाग 2: लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE)
विभाग 3: वित्त विभाग
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की अपर मुख्य सचिव आईएएस दीपाली रस्तोगी चाहती हैं कि योजना का संचालन और रखरखाव उनके विभाग के पास रहे।
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वहीं, PHE के प्रमुख सचिव आईएएस पी नरहरि ने मुख्य सचिव को कहा कि पिछले अनुभव बताते हैं, पंचायत विभाग यह जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा पाया। उन्होंने उदाहरण के तौर पर बुंदेलखंड पैकेज में हुई गड़बड़ियों का हवाला भी दिया है। इसके इतर वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव मनीष रस्तोगी हैं, जो पूरे प्रस्ताव की सबसे बड़ी दीवार बनकर खड़े हैं।
सीएम ने यह दिए थे निर्देश
विवाद बढ़ने पर 21 अगस्त 2025 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई थी। बैठक में दोनों विभागों के तर्क सुने गए और इसके बाद मुख्यमंत्री ने कहा ​था कि वर्ष 2028 तक यानी तीन साल नल-जल योजना का संचालन और रखरखाव PHE विभाग ही करेगा। इसके तहत हर साल 800 करोड़ रुपए, यानी तीन साल में कुल 2400 करोड़ रुपए PHE को दिए जाएंगे। इस फैसले के मिनट्स तैयार हुए। फाइल पर मुख्यमंत्री डॉ.यादव के साइन भी हो गए और तय हुआ कि ड्राफ्ट को कैबिनेट में लाया जाएगा।
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कैबिनेट से पहले ही फाइल पर ब्रेक
अब यहीं पेंच फंस गया। तय कार्यक्रम के अनुसार यह नीति 9 दिसंबर 2025 को खजुराहो में हुई कैबिनेट बैठक में आनी थी। PHE ने नीति का पूरा मसौदा तैयार कर वित्त विभाग की मंजूरी के लिए भेजा, लेकिन मामला यहीं अटक गया। वित्त विभाग ने न सिर्फ प्रस्ताव मानने से इनकार कर दिया, बल्कि पंचायत विभाग की अपर मुख्य सचिव ने भी इस पर खुलकर असहमति दर्ज करा दी।
विवाद की असली जड़ 2400 करोड़
वित्त विभाग के अपर प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी ने द सूत्र से बातचीत में कहा कि मुख्यमंत्री की बैठक में यह तय नहीं हुआ था कि PHE को तीन साल के लिए 2400 करोड़ रुपए अलग से दिए जाएंगे। उनका तर्क है कि 'वीबी-जी राम जी' (मनरेगा के स्थान पर नई योजना) के नए एक्ट के तहत पंचायतों को पहले से ही नल-जल योजना के संचालन और रखरखाव के लिए पैसा मिलता है। यदि PHE यह काम करना चाहता है तो पंचायत से पैसा ले, लेकिन अलग से बजट नहीं दिया जाएगा। यहीं से विवाद गहरा गया है।
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मंत्री ने कहा- फैसला मुख्यमंत्री ही करेंगे
इस मामले में पीएचई मंत्री संपतिया उइके का कहना है कि, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग इस योजना को ठीक से नहीं चला पा रहा था। लगातार शिकायतें आ रही थीं। इसी वजह से मुख्यमंत्री की बैठक में तय हुआ कि अगले तीन साल तक PHE यह जिम्मेदारी संभालेगा। अब अगर वित्त विभाग के अफसर इस फैसले से सहमत नहीं हैं तो आखिरी निर्णय मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ही करेंगे।
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समझिए...ये नीति क्यों जरूरी है?
केंद्र सरकार नल-जल योजना के तहत राज्यों को हजारों करोड़ रुपए का बजट दे रही है, ताकि हर घर तक पानी पहुंचे। योजना पूरी होने के बाद आमतौर पर PHE इसे पंचायत विभाग को सौंप देता है, लेकिन मध्यप्रदेश में यह व्यवस्था फेल होती दिख रही है।
मुख्यमंत्री की बैठक में यह साफ तौर पर सामने आया था कि अगर 2028 के चुनाव तक गांवों में पानी की आपूर्ति सुधरनी है, तो अगले तीन साल PHE को ही यह जिम्मेदारी निभानी होगी। इसी सोच के तहत संचालन और रखरखाव की अलग नीति तैयार की गई थी।
नल-जल योजना को भी जान लीजिए...
दरअसल, नल जल योजना दो तरह की है-
1. मल्टीविलेज स्कीम
इसमें जल निगम ने टेंडर के साथ ही 10 साल का मेंटेनेंस ठेका दे रखा है। वहां जिम्मेदारी साफ है।
2. सिंगल विलेज स्कीम
प्रदेश के 28 हजार गांव इसी श्रेणी में आते हैं। यहीं पूरी व्यवस्था उलझी हुई है। योजना बन गई, नल लग गए, लेकिन चलाने वाला कोई तय नहीं है।
और हकीकत यह है...
कागजों में योजना चालू है, लेकिन हकीकत यह है कि किसी गांव में बिजली बिल जमा नहीं होने से कनेक्शन कट जाता है तो कहीं पाइपलाइन फूट जाती है। कहीं मरम्मत के लिए महीनों तक कोई नहीं आता। अब इसका नतीजा यह है कि सीएम हेल्पलाइन पर लगातार शिकायतें हो रही हैं। गांव वालों को पीने के पानी के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।
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